बाइबल को कण्ठस्थ करने के लाभ

“आज मैं जिन वचनों की आज्ञा तुझे दे रहा हूँ वे तेरे मन में बनी रहें। और तू उनको यत्नपूर्वक अपने बाल-बच्चों को सिखाना, तथा अपने घर में बैठे, मार्ग पर चलते, और लेटते तथा उठते समय उनकी चर्चा किया करना।” (व्यवस्थाविवरण 6:6-7)

परमेश्वर का वचन सिद्ध, त्रुटिहीन और कभी न परिवर्तित होने वाला है। यह परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है (2 तीमुथियुस 3:16)। वचन हमें परमेश्वर को और अधिक जानने और ख्रीष्ट के समान बनने में हमारी सहायता करता है। परमेश्वर ने हमें अपना वचन दिया है कि हम उसे पढ़ें, मनन करें और अपने जीवन में लागू करें। केवल इतना ही नहीं परन्तु उसको कंठस्थ भी करें। ऐसा करने से हम अपने मनों को परमेश्वर के वचनों से भरते हैं। आइए इस लेख में हम वचन को कंठस्थ या मुखाग्र करने के 5 लाभों के विषय में चर्चा करें। 

यह परमेश्वर की आज्ञा है

परमेश्वर का वचन हमारे पास है कि हम उसे मुखाग्र कर सकें और अपने मन में बसाएँ। और इसलिए कुलुस्सियों 3:16  में पौलुस विश्वासियों को यह कहते हुए उत्साहित करता है कि “ख्रीष्ट के वचन को अपने हृदय में बहुतायत से बसने दो”। बसने देने का अर्थ है घर करने दो या समा ने दो। और कितना बसने देना है अधिक – ढे़र सारा, कमी नहीं होनी चाहिए। यह है परमेश्वर की इच्छा और आज्ञा विश्वासियों के लिए कि वह परमेश्वर के वचन को अपने अन्दर ले लें और उसके अनुसार जीवन जीएँ।   

यह हमें परमेश्वर के चरित्र और गुणों को जानने में सहायता करता है। 

परमेश्वर बाइबल का मुख्य नायक है। सब कुछ उसके विषय में है। इसलिए जब हम वचन को मुखाग्र करने में समय व्यतीत करते हैं और अलग-अलग पदों और खण्डों को मुखाग्र करते हैं तो हम परमेश्वर के गुणों और चरित्र को और अधिक देखने और समझने लगते हैं। वचन को मुखाग्र करने की प्रक्रिया में हम उसके साथ समय व्यतीत कर पाते हैं जो परमेश्वर के प्रति हमारी समझ को बढ़ाता है। भजन 119:137 कहता है, “हे यहोवा, तू धर्मी है, और तेरे नियम खरे हैं।” यह उसका वचन ही जो हमें बताता है कि वह कौन है इसलिए हम उसमें (वचन में) समय व्यतीत करते हैं। 

यह हमारी पवित्रता में बढ़ने में सहायता करता है। 

भजन 119:9-11, “जवान अपनी चाल को कैसे शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार चलने से… तेरे वचन को मैंने अपने हृदय में संचित किया है, कि तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।” परमेश्वर पवित्र है और वह हमसे पवित्रता की माँग करता है। और हम यह तब कर पाएँगे जब हम परमेश्वर के वचन के अनुसार जीएँगे। उसके लिए हमें उसे कंठस्थ करना पड़ेगा। 11 पद के अनुसार मैंने तेरे वचन को अपने हृदय में संचित किया है अर्थात् मुखाग्र किया है, छिपा के रखा है। न केवल परमेश्वर का वचन हमें पाप से बचने में सहायता करता है। परन्तु वह तो दो धारी तलवार के समान है, जो हमें पापों के विरूद्ध चिताता भी है (इब्रानियों 4:12)। इस प्रकार वचन को मुखाग्र करना हमें ख्रीष्ट के समान पवित्र बनने मे सहायता करता है।   

यह हमारी प्रार्थना को वचन के अनुरूप करता है।

1 यूहन्ना 5:14 … यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगें, तो वह हमारी सुनता है। जब हम परमेश्वर के वचनों को मुखाग्र करते रहते हैं तो वह न केवल हमारे हृदय में बसते हैं परन्तु साथ ही साथ वह हमारे विचारों, शब्दों और प्रार्थनाओं पर प्रभाव डालते हैं। तो फिर हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वचन के अनुरूप होती चली जाती हैं। हम समझते हैं कि परमेश्वर की इच्छा क्या है और उसी के अनुरूप हम प्रार्थाना करते हैं। हम एक ही बात को बार-बार दोहराते नहीं रहते हैं। परन्तु उसकी इच्छा के अनुसार स्वयं के और दूसरे विश्वासियों के लिए प्रार्थाना करते हैं।    

यह हमारी आशा को दृढ़ करता है। 

जितना अधिक हम परमेश्वर के वचनों को मुखाग्र करते रहेंगे वह हमारी आशा को दृढ़ करता रहेगा। हम संसार में हैं, परन्तु संसार के नहीं हैं। इसलिए परमेश्वर का वचन जब हमारे मन में बसा रहेगा। तो हम संसार और संसार की वस्तुओं के प्रति नहीं परन्तु उन बातों के लिए आकर्षित होंगे जो परमेश्वर ने हमारे लिए अनन्तकाल के लिए रखी हुई हैं। परमेश्वर का वचन हमें स्मरण दिलाता रहेगा कि हम स्वर्गीय नागरिक हैं और यह परमेश्वर के वचन में लिखा हुआ है। तो हम इन बात में और अधिक दृढ़ होंगे, जब ख्रीष्ट प्रकट होगा तो हम भी उसके साथ महिमा में प्रकट किए जाएँगे (कुलुस्सियों 3:4), वह हमारी दीन-हीन देह का रूप परिवर्तित करके, अपनी महिमामय देह के अनुरूप बना देगा (फिलिप्पियों 3:21), हमारी जीवित आशा अविनाशी, निष्कलंक और अमिट है (1 पतरस 1:3-4)। 

यह हमारे लिए परमेश्वर की दया है कि उसका वचन हमारे हाथों में है। इसलिए इस वचन को लीजिए, पढ़िए, मनन करिए, कंठस्थ कीजिए और लागू करिए। मेरी प्रार्थना है कि परमेश्वर मेरे भीतर और आपके भीतर परमेश्वर के वचन को और अधिक मुखाग्र करने की इच्छा और क्षमता दे। 

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आइज़क सौरभ सिंह
आइज़क सौरभ सिंह

सत्य वचन कलीसिया में वचन की शिक्षा देने और प्रचार करने की सेवा में सम्मिलित हैं।

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