ख्रीष्ट (हमारे) साधन और लक्ष्य के रूप में

मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ। अब मैं जीवित नहीं रहा, परन्तु ख्रीष्ट मुझ में जीवित है, और अब मैं जो शरीर में जीवित हूँ, तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझ से प्रेम किया और मेरे लिए अपने आप को दे दिया। (गलातियों 2:20)

परमेश्वर ने विश्व को क्यों सृजा? और क्यों वह इस प्रकार से इसका संचालन कर रहा है? परमेश्वर क्या उपलब्धि प्राप्त कर रहा है? क्या यीशु ख्रीष्ट इस उपलब्धि-को-प्राप्त करने का साधन है या इस प्राप्त-उपलब्धि का लक्ष्य है?

यीशु ख्रीष्ट परमेश्वर का सर्वोच्च प्रकाशन है। वह मानव रूप में परमेश्वर है। और यह मानव रूप तो लक्ष्य है, न कि साधन। 

इस विश्व का अर्थ ही है परमेश्वर की महिमा का प्रकटीकरण करना। इसी बात की उपलब्धि परमेश्वर प्राप्त कर रहा है। आकाश और संसार का इतिहास दोनों “परमेश्वर की महिमा का वर्णन कर रहे हैं।”

किन्तु यीशु ख्रीष्ट को कुछ ऐसा कार्य पूरा करने के लिए भेजा गया था जिसे किए जाने की आवश्यकता थी। वह पतन का निवारण करने आया था। वह पापियों को उनके पाप के कारण निश्चित् विनाश से बचाने के लिए आया था। ये बचाए गए लोग अनन्त आनन्द के साथ परमेश्वर की महिमा को देखेंगे और उसका रसास्वादन करेंगे और उसको प्रदर्शित करेंगे। 

जबकि अन्य लोग परमेश्वर की महिमा का अपमान करते रहेंगे। इसलिए, यीशु ख्रीष्ट वह साधन है जिसे परमेश्वर ने अपने लोगों के आनन्द के लिए अपनी महिमा के प्रकटीकरण में प्राप्त करने की इच्छा की थी। कोई भी ख्रीष्ट द्वारा किए गए उद्धार के कार्य के बिना न तो परमेश्वर की महिमा को देखेगा, न उसका रसास्वादन करेगा और न ही उसका उत्सव मनाएगा। विश्व का जो लक्ष्य है वह नष्ट हो जाएगा। इसलिए, ख्रीष्ट ही एक साधन  है। 

परन्तु क्रूस पर उस उपलब्धि को प्राप्त करने की प्रक्रिया में जब वह पापियों के लिए मर रहा था, तो ख्रीष्ट ने पिता के प्रेम और धार्मिकता को सर्वोच्च रूप से प्रकट  किया। यह परमेश्वर की महिमा के प्रकाशन की पराकाष्ठा थी — अर्थात् उसके अनुग्रह की महिमा। 

इसलिए, परमेश्वर के उद्देश्य के साधन  के रूप में अपने सिद्ध कार्य के समय ही, यीशु उस उद्देश्य का लक्ष्य  भी बन गया। पापियों के स्थान पर अपनी मृत्यु और उनके जीवन हेतु अपने पुनरुत्थान में, वह परमेश्वर की महिमा का केन्द्रीय और सर्वोच्च प्रकाशन  बन गया। 

इसलिए क्रूस पर चढ़ाया गया ख्रीष्ट विश्व में परमेश्वर के उद्देश्य का साधन और लक्ष्य दोनों है। 

उसके कार्य के बिना, वह लक्ष्य — अर्थात् परमेश्वर के लोगों के आनन्द के लिए परमेश्वर की महिमा की परिपूर्णता को प्रकट करना — पूर्ण नहीं हुआ होता। 

और उसी साधन में – वह कार्य जिसमें वह अन्त भी बन गया — वह जो सदा-सर्वदा के लिए हमारी आराधना का केन्द्र होगा और हम अनन्तकाल का समय उस बात को अधिक से अधिक देखने और रसास्वादन करने में व्यतीत करेंगे जिसे उसने परमेश्वर के विषय में तब प्रकट किया था जब वह हमारे लिए अभिशाप बना था। 

यीशु वह लक्ष्य है जिसके लिए विश्व को बनाया गया था, और वह साधन भी है जो धर्मी ठहराए गए पापियों द्वारा उस लक्ष्य का आनन्द उठाना सम्भव बनाता है।   

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जॉन पाइपर
जॉन पाइपर

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।

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