जो कुछ वह चाहता है, करता है

परन्तु हमारा परमेश्वर तो स्वर्ग में है; जो कुछ वह चाहता है, करता है। (भजन 115:3)

यह पद सिखाता है कि जब भी परमेश्वर कार्य करता है, वह इस रीति से कार्य करता है जैसे वह चाहता है। 

परमेश्वर कभी भी ऐसे कार्य को करने के लिए बाध्य नहीं होता है जिससे वह घृणा करता है। वह कभी भी किसी ऐसी स्थिति में घेरा नहीं जा सकता है जिससे निकलने का केवल अब एक ही उपाय हो कि वह उस कार्य को करे जिसे करने से उसको घृणा है।

वह जो कुछ चाहता है, करता है। और इसलिए, एक अर्थ में, वह जो कुछ भी करता है उसमें वह आनन्द पाता है।

इस शिक्षा से हमें प्रेरित होना चाहिए की हम परमेश्वर के सम्मुख झुकें तथा उसकी सम्प्रभु स्वतंत्रता की स्तुति करें — कि एक अर्थ में वह सदैव अपनी “भली इच्छा” के अनुसार, अपने स्वयं के हर्ष के द्वारा निर्देशित होकर स्वतंत्रता के साथ कार्य करता है।

परमेश्वर कभी भी परिस्थतियों में फँस नहीं जाता है। उस पर किसी भी परिस्थिति में यह दवाब नहीं बनाया जा सकता है कि उसे कुछ ऐसा करना पड़े जिससे वह आनन्दित न हो। वह ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता है। वह कभी फँसता नहीं है या घेरा नहीं जाता या बाध्य नहीं किया जाता है।

यहाँ तक कि इतिहास के उस समय में भी जो एक अर्थ में परमेश्वर के लिए सबसे कठिन कार्य था, अर्थात् “अपने पुत्र को भी नहीं रख छोड़ने” का कार्य (रोमियों 8:32), उस समय भी परमेश्वर स्वतन्त्र था और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य कर रहा था। पौलुस कहता है कि मृत्यु में यीशु का आत्म-बलिदान “परमेश्वर के सम्मुख सुखदायक सुगन्ध तथा बलिदान” था (इफिसियों 5:2)। सबसे बड़ा पाप और सबसे बड़ी मृत्यु और करने के लिए सबसे कठिन कार्य भी आश्चर्यजनक रूप से परमेश्वर पिता के लिए प्रसन्नता की बात थी।

और कलवरी की ओर जाते समय, स्वयं यीशु के पास स्वर्गदूतों की कई टुकड़ियाँ थी जो उसके द्वारा उपयोग किए जाने के लिए तैयार थीं। “कोई उसे (मेरा प्राण) मुझ से नहीं छीनता, किन्तु मैं उसे अपने आप ही देता हूँ” (यूहन्ना 10:18) — अपने स्वयं की भली इच्छा के अनुसार — “उस आनन्द के कारण जो उसके सम्मुख रखा हुआ है,” जैसा कि इब्रानियों 12:2 कहता है। संसार के इतिहास के एक समय में जब ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यीशु फँस गया है, उस समय भी वह जो चाह रहा था उसे करने के लिए पूर्णतः नियन्त्रण में था अर्थात् मुझ और आप जैसे अधर्मी को धर्मी ठहराने के द्वारा अपने पिता की महिमा के लिए मरने में।

तो आइए हम भय और विस्मय से खड़े हो जाएँ। और आइए हम इस विचार से थरथराएँ कि न केवल परमेश्वर की सम्प्रभुता की स्तुति, किन्तु ख्रीष्ट की मृत्यु के द्वारा हमारा उद्धार भी इस विचार पर टिका हुआ है: “परन्तु हमारा परमेश्वर तो स्वर्ग में है; जो कुछ वह चाहता है, करता है।”

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जॉन पाइपर
जॉन पाइपर

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।

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