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विचारों के परिणाम होते हैं

इस आदेश का अभिप्राय यह है कि प्रेम उत्पन्न हो। (1 तीमुथियुस 1:5)

विक्टर फ्रैंकल को द्वितीय विश्व युद्ध के समय ऑशविट्ज़ (Auschwitz) और डाचौ (Dachau)  के नाज़ी बन्दी शिविर (Nazi concentration camps) में बन्दी बना कर रखा गया था। तंत्रिका-विज्ञान और मनोचिकित्सा के यहूदी प्राध्यापक होने के कारण वह अपनी पुस्तक, मैन्स सर्च फॉर मीनिंग (Man’s Search for Meaning), के कारण विश्व विख्यात हो गए थे, इसकी अस्सी लाख से अधिक प्रतियों की बिक्री हुई थी।

इस पुस्तक में वह अपने दर्शनशास्त्र के सार के विषय में बताते हैं जिसे बाद में लॉगोथेरेपी (Logotherapy) के नाम से जाना जाने लगा — जिसका साराँश यह था कि मनुष्य का सबसे आधारभूत उद्देश्य है जीवन में अर्थ को ढूँढ़ना। उन्होंने इस बन्दी शिविर की वीभत्सता में यह देखा कि मनुष्य जीवन में किसी भी “कैसे” को अर्थात् परिस्थिति को सह सकता है, यदि उसके पास एक “क्यों” अर्थात् उत्तर है। परन्तु हाल ही में जिस वाक्य ने मुझे झकझोर कर रख दिया वह यह है:

मुझे इस बात का दृढ़ निश्चय है कि ऑशविट्ज़, ट्रेब्लिंका और मेडन के गैस चैम्बर्स, बर्लिन के किसी सचिवालय में नहीं बनाए गए थे, वरन् शून्यवादी (nihilistic) वैज्ञानिकों और दर्शनशास्त्रियों की मेजों और कक्षाओं के कमरों में बनाए गए होंगे।  (“विक्टर फ्रैंकल एट नयन्टी: एन इंटरव्यू,” इन फर्स्ट थिंग्स, अप्रैल 1995, पृष्ट 41।)

दूसरे शब्दों में, विचारों के परिणाम होते हैं — परिणाम जो या तो सुखी बनाते हैं या नाश कर देते हैं। लोगों का व्यवहार — भला या बुरा — ऐसे ही कहीं से भी नहीं आ जाता है। यह वास्तविकता के विषय में प्रबल विचारों के द्वारा उत्पन्न होता है जिन्होंने हमारे मन में जड़ पकड़ रखी है तथा भलाई या बुराई को उत्पन्न करती हैं। 

बाइबल इस सत्य को ऐसी बातें कहने के द्वारा इस रीति से स्पष्ट करती है कि विचारों के व्यावहारिक परिणाम होते हैं कि, “पूर्व-काल में जो कुछ लिखा गया था वह हमारी ही शिक्षा के लिए लिखा गया था [जिस से] . . .  हम आशा रखें”  (रोमियों 15:4)। जो विचार पवित्रशास्त्र में प्रस्तुत किये गए हैं वे हमारे लिए आशा का व्यावहारिक परिणाम उत्पन्न करते हैं। 

पौलुस पुनः कहता है कि, “इस आदेश का अभिप्राय यह है कि प्रेम उत्पन्न हो” (1 तीमुथियुस 1:5)। एक “आदेश” या “निर्देश” के द्वारा विचारों का दिया जाना प्रेम उत्पन्न करता है।

आशा और प्रेम ऐसे ही कहीं से नहीं आ जाते हैं। यह विचारों से निकलते हैं — वास्तविकता के विषय में हमारे विचार — जिन्हें पवित्रशास्त्र में प्रकट किया गया है।

एक अन्य रीति जिसके द्वारा पवित्रशास्त्र हमें दिखाता है कि विचारों के परिणाम होते हैं वह है “इसलिए” और “अतः” जैसे शब्दों का उपयोग करने के द्वारा। उदाहरण के लिए, “इसलिए विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाकर परमेश्वर से हमारा मेल अपने प्रभु यीशु ख्रीष्ट के द्वारा है” (रोमियों 5:1)। या “अतः अब उन पर जो ख्रीष्ट यीशु में हैं, दण्ड की आज्ञा नहीं” (रोमियों 8:1)। या “इसलिए कल की चिन्ता न करो” (मत्ती 6:34)।

यदि हम इन व्यावहारिक “इसलिए” और “अतः” जैसे शब्दों की सामर्थ्य में जीना चाहते हैं, तो हमें उन विचारों को थामे रहना होगा — वास्तविकता के विषय में हमारे विचार — जो इन शब्दों के साथ आते हैं और इनके साथ बने रहते हैं। विचारों के परिणाम होते हैं । तो आइए, अपने सभी विचारों को परमेश्वर के वचन के अधिकार की अधीनता में लाएँ।

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जॉन पाइपर
जॉन पाइपर

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।

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