सेवा का मुख्य उद्देश्य

सेवा का मुख्य उद्देश्य

हम उनमें से नहीं जो नाश होने के लिए पीछे हटते हैं, पर उनमें से हैं, जो प्राणों की रक्षा के लिए विश्वास रखते हैं। (इब्रानियों 10:39)

प्रेम के अस्थायी मूल्य पर ध्यान मत दीजिए, और परमेश्वर की असीम श्रेष्ठ प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखने से संकुचाएं नहीं। यदि आप पीछे हटते हैं, तो आप केवल प्रतिज्ञाओं को ही नहीं खोएंगे, वरन आप नाश हो जाएंगे।

नरक दांव पर लगा है चाहे हम पीछे हटें या दृढ़ता से बने रहें। यह मात्र तुला के पलड़ों में लटके हुए कुछ अतिरिक्त उपहारों की हानि नहीं है। इब्रानियों 10:39 कहता है, “हम उनमें से नहीं जो नाश होने के लिए पीछे हटते हैं।” वह अनन्त न्याय है। 

इसलिए, हम एक दूसरे को चेतावनी देते हैं: भटक मत जाइए। संसार से प्रेम मत करिए। यह मत सोचना आरम्भ कर दीजिए कि कुछ भी बड़ा दांव पर नहीं लगा है। आप उस भयानक सम्भावना से भय खाएं कि कहीं परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से अधिक पाप की प्रतिज्ञाओं को स्नेह से संजोने लगें। जैसा कि इब्रानियों 3:13-14 में कहता है, “जब तक आज का दिन कहलाता है, तुम दिन प्रतिदिन एक दूसरे को प्रोत्साहित करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम में से कोई व्यक्ति पाप के छल में पड़कर कठोर हो जाए। यदि हम अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहते हैं तो हम मसीह के भागीदार बन गए हैं।”

परन्तु मुख्यतः हमें प्रतिज्ञाओं की अनमोलता पर ध्यान देना चाहिए और सबसे बढ़कर उस महान पुरस्कार को महत्व देने में एक दूसरे की सहायता करें जिसे मसीह ने हमारे लिए मोल लिया है। हमें निश्चय ही एक दूसरे से वही कहना चाहिए जो इब्रानियों 10:35 कहता है, “अपना भरोसा मत छोड़ो, जिसका महान प्रतिफल है।” और तब हमें उस प्रतिफल की महानता को देखने के लिए एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए। 

प्रचार का यही मुख्य कार्य है, तथा छोटे समूहों और कलीसिया की सभी सेवाओं का मुख्य उद्देश्य है: कि लोगों की सहायता करें ताकि वे उस महानता को देखें जिसे मसीह ने उन सब के लिए मोल लिया है जो संसार से बढ़कर इसे महत्व देंगे। इसे देखने और इसके रसास्वादन में लोगों की सहायता करें, जिससे कि परमेश्वर का श्रेष्ठ मूल्य उनकी सन्तुष्टि में और ऐसे हृदय से उत्पन्न होने वाले बलिदानों में स्पष्टता से प्रकट हो सके।

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