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   घमण्ड का समाधान

सुनो, तुम जो यह कहते हो, ‘आओ, हम आज या कल अमुक नगर में जाकर वहाँ एक वर्ष बिताएंगे और व्यापार करके लाभ उठाएंगे”- फिर भी यह नहीं जानते कि कल तुम्हारे जीवन का क्या होगा। तुम तो भाप के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती और फिर अदृश्य हो जाती है। पर इसके विपरीत तुम्हें यह कहना चाहिए, “यदि प्रभु की इच्छा हो तो हम जीवित रहेंगे और यह अथवा वह काम भी करेंगे।” पर अब तुम अपनी धृष्टता पर डींग मारते हो, और ऐसी डींगे मारना बुरा है। इसलिए जो कोई उचित काम करना जानता है और नहीं करता, उसके लिए यह पाप है। (याकूब 4:13-16)

यहाँ याकूब घमण्ड और धृष्टता के विषय में बात कर रहा है कि वे कैसे सूक्ष्म रीतियों से हमारे जीवन में दिखाई देते हैं। “पर अब तुम अपनी धृष्टता पर डींग मारते हो, और ऐसी डींगे मारना बुरा है।”

जब आप आत्म-निर्भर जीवन के लिए प्रलोभित करने वाली तीन श्रेणियों को लेते हैं — अर्थात् ज्ञान, शक्ति और धन — तो हम पाते हैं कि यह तीनों मिलकर एक सामर्थी प्रलोभन बन कर घमण्ड के चरम रूप की ओर बढ़ते हैं जिसे हम नास्तिकतावाद कहते हैं। हमारे लिए अपनी स्वयं की दृष्टि में सर्वोच्च बने रहने का सबसे सुरक्षित उपाय यह है कि हम अपने ऊपर से किसी भी अधिकार को नकार दें।

यही कारण है कि घमण्डी लोग दूसरों को नीची दृष्टि से देखने में स्वयं को व्यस्त रखते हैं। सी एस लुईस ने कहा था, “एक घमण्डी व्यक्ति सदैव अन्य वस्तुओं और लोगों को नीचा देखता है: और निश्चित रूप से, जब तक आप नीचा देख रहे होते हैं, तब तक आप अपने से ऊपर कुछ भी नहीं देख पाते हैं।”

परन्तु घमण्ड को बनाए रखने के लिए, यह घोषणा करना सरल होगा कि ऊपर तो देखने के लिए कुछ है ही नहीं। “दुष्ट अपने अभिमान के कारण परमेश्वर की खोज नहीं करता; उसका तो पूरा विचार है कि, ‘कोई परमेश्वर है ही नहीं’”(भजन 10:4)। अन्तत: अवश्य ही, घमण्डियों द्वारा स्वयं को यह विश्वास दिलाना होगा कि परमेश्वर है ही नहीं। 

इसका एक कारण यह है कि परमेश्वर की वास्तविकता का हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यापक हस्तक्षेप है। घमण्ड तो संसार को संचालित करने में परमेश्वर की घनिष्ठ भागीदारी को सहन नहीं कर सकता है, जीवन की विस्तृत, सामान्य दिनचर्या की तो बात ही छोड़ दीजिए।

घमण्ड को परमेश्वर की सम्प्रभुता नहीं भाती है। इसलिए घमण्ड को परमेश्वर का अस्तित्व  नहीं भाता है, क्योंकि परमेश्वर तो सम्प्रभु है। घमण्ड इसे यह कहकर व्यक्त कर सकता है कि, “कोई परमेश्वर नहीं है।” या इसे यह कहकर भी व्यक्त किया जा सकता है कि, “मैं बड़े दिन के लिए आगरा जा रहा हूँ।”

याकूब कहता है कि, “इतनी निश्चयता से यह मत कहो।” इसके स्थान पर आपको यह कहना चाहिए कि, “यदि प्रभु चाहे तो हम जीवित रहेंगे, और हम बड़े दिन के लिए आगरा पहुँचेंगे।”

याकूब का कहना है कि परमेश्वर का इस बात पर नियन्त्रण है कि आप आगरा पहुँचेंगे भी या नहीं, और या आप इस भक्तिमय लेख के अन्त तक पहुँचने से पहले जीवित भी रहेंगे या नहीं। यह घमण्ड की आत्मनिर्भरता के लिए अत्यन्त अपमानजनक है कि — आपका नियन्त्रण इस बात पर भी नहीं है कि बिना किसी आघात के आप भक्तिमय लेख के अन्त तक पहुँच पाएँगे या नहीं!

याकूब का कहना है कि अपनी भविष्य की बातों के लिए परमेश्वर के सम्प्रभु अधिकारों में विश्वास नहीं करना घमण्ड है।

इस अहँकार से लड़ने का मार्ग यह है कि हम जीवन के सभी क्षेत्रों में परमेश्वर की सम्प्रभुता के सामने झुकेंगे और उसकी अचूक प्रतिज्ञाओं में अपने विश्राम को पाएँगे जिससे कि वह हमारी ओर से स्वयं के सामर्थ्य को प्रकट करे (2 इतिहास 16:9), परमेश्वर की भलाई और करुणा प्रतिदिन हमारे साथ बनी रहे (भजन 23:6), वह उन सब के लिए कार्य करता रहा जो उसकी बाट जोहते हैं (यशायाह 64:4), और उसकी महिमा के लिए जीने हेतु हमें वह सब प्रदान करें जिसकी हमें आवश्यकता है (इब्रानियों 13:21)।  

दूसरे शब्दों में, घमण्ड का समाधान परमेश्वर द्वारा भविष्य में प्राप्त होने वाले सम्प्रभु अनुग्रह में दृढ़ विश्वास है।


फ्यूचर ग्रेस, पृष्ठ 90 से भक्तिमय अंश

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जॉन पाइपर
जॉन पाइपर

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।

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