ख्रीष्टीयों को गीत क्यों गाने चाहिए?

ख्रीष्टीय बुलाए गए हैं कि वे परमेश्वर के लिए गीत गाएँ। परमेश्वर के लोग, उसकी प्रजा परमेश्वर के गुणों को सराहते हुए गीत गाते हैं। आरम्भिक कलीसिया में जब विश्वासी इकट्ठे होते थे तो वे परमेश्वर की महिमा के लिए गीत गाते थे। आज जब कलीसिया में हम लोग भी आराधना के लिए इकट्ठे होते हैं तो हम प्रभु की महिमा गीतों के द्वारा करते हैं। आइये, हम ध्यान दें कि परमेश्वर के लोग क्यों गीत गाते हैं!

परमेश्वर की प्रशंसा करने के लिए – हम पुराने नियम में देखे तो पाते हैं कि जब परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिस्र से निकाला और लाल समुद्र को दो भागो में विभाजित करके मिस्री घुड़सवारों को मार डाला तब मूसा और इस्राएलियों ने यहोवा के लिए गीत गया (निर्गमन 15:1-21)। परमेश्वर को हमें सम्पूर्ण हृदय से भजना है। उसमें आनन्दित होना है। उसके अद्भुत कार्यों का वर्णन करना है। वाद्य-यन्त्रों के साथ भजन गाना है। उसके भक्तों के साथ उसकी स्तुति करना है  (भजन 5, 9:1-2, 147:7, 149:1) हम गीत में वचन के आधार पर परमेश्वर के गुणों को सराहते हैं। सम्पूर्ण बाइबल परमेश्वर के चरित्र एवं गुणों से भरपूर है। परमेश्वर का वचन हमें परमेश्वर की आराधना का कारण देता है। परमेश्वर अनुग्रहकारी, प्रेमी, करुणामयी, सर्वसामर्थ्यी, सर्वज्ञानी, सर्व-उपस्थित, पवित्र और न्यायी है। बाइबल का परमेश्वर अपने लोगों से अपनी आराधना चाहता है। इसीलिए हम कुछ गीतों को गाते हैं जिसमें प्रभु के गुण दिखते हैं: ‘अनुग्रहकारी प्रिय प्रभु जी…, आदि और अन्त तू ही है.., तेरी स्तुति हम करें आराधना करें सच्चाई से…‘आओ हम यहोवा के लिए, ऊँचे स्वर से गाएँ, अपनी मुक्ति की चट्टान का जयजयकार करें..।’ परमेश्वर ने हमें आवाज़ दी है ताकि हम उसके लिए गीत गाएँ।  

परमेश्वर से अपने पापों की क्षमा याचना के लिए: हम गीत के माध्यम से न केवल परमेश्वर के गुणों का वर्णन करते हैं किन्तु हम अपनी वास्तविक स्थिति को परमेश्वर के सम्मुख रखते हैं। हम अपनी पापमय स्थिति, दुष्टता, मन व शब्दों से किए गए पापों को भजन के माध्यम से गाते हैं। हम अपने पापों का अंगीकार करते हैं और परमेश्वर से याचना करते हैं कि वह हमारे पापों को क्षमा करे। भजन संहिता में पाप अंगीकार सम्बन्धित बहुत से भजन हैं जिनको इस्राएली गाते थे। वर्तमान में हम अपने गीतों के माध्यम से अपनी पापमय स्थिति को प्रभु के सामने खोल कर रखते हैं और विनती करते हैं, “मेरा मन धो देना प्रभु विनती करुँ बारम्बार…।” 

परमेश्वर को धन्यवाद देने के लिए: हमारे गीत के सामग्री में परमेश्वर द्वारा हमारे जीवन में किए गए उपकार भी सम्मिलित होते हैं। नए नियम में प्रेरित पौलुस विश्वासियों को उत्साहित करता है कि वे विश्वासियों/सन्तों के साथ गीत के माध्यम से परमेश्वर को धन्यवाद दें। यह परमेश्वर को भाता है कि उसके लोग आपस में भजन, स्तुति-गान व आत्मिक गीत गाएँ और सदैव सब बातों के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम में परमेश्वर पिता को धन्यवाद दें (इफिसियों 5:19, कुलुस्सियों 3:16)। मैंने है पाया तुझसे प्रभु जी… विश्वासयोग्य मेरे प्रभु.. तुम याद करो सब भक्तों प्रभु ने क्या-क्या किया..।’ परमेश्वर इस योग्य है कि हम उसके लिए अपना मुँह खोलें और उसके उपकारों के लिए उसे धन्यवाद दें। 

परमेश्वर से विनती करने के लिए: हमारे गीत में विनती, प्रार्थना, निवेदन एवं याचनाएँ होती हैं जो हम प्रभु के सम्मुख लेकर आते हैं। जैसे: दिखा हमें मसीह को, हे प्रभु दिखा अपनी महिमा, अपने वचन के द्वारा… कुछ गीतों में हम विनती करते हैं कि हमें यीशु जैसा बनाइये, अपनी सेवा कराइये, अपनी राह पर चलाइये, ‘सम्भाल प्रभु जी, जीवन के हर पल में, अभी तक हमको सम्भाला तूने आगे भी अगुवाई कर..। स्वर्ग से उण्डेल प्रभु अग्नि सा जीवन..।’ हम अपने जीवन में विभिन्न कठिन परिस्थितियों में से होकर जाते हैं, कभी निराशा, परीक्षाएँ, सताव, दुख, शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक पीड़ाओं के मध्य हम वचन आधारित गीत गाते हैं और प्रभु के सामने अपनी व्यथा को बताते हैं। यदि हम भजन संहिता में देखें तो दाऊद भी गीत के माध्यम से अपनी विनतियों को परमेश्वर के सम्मुख रखता है। अपने परमेश्वर का भजन गाना अच्छा है। यह मनभावना है और उसकी स्तुति करना उचित है (भजन 147:1)।  

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नीरज मैथ्यू
नीरज मैथ्यू
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