“आओ, हम और कहीं आस-पास की बस्तियों में जाएं, कि मैं वहां भी प्रचार कर सकूं; क्योंकि मैं इसीलिए निकला हूँ ” (मरकुस 1:38)। यीशु के ये शब्द हमें उसकी सेवकाई में प्रचार करने के महत्व को दिखाते हैं। और प्रेरित पौलुस के पास भी प्रचार करने के लिए एक उसी तरह जुनून था: वह रोम में सुसमाचार का प्रचार करने के लिए उत्सुक था, क्योंकि वह सुसमाचार और उसके उद्धार लाने वाली सामर्थ्य से लज्जित नहीं होता था (रोमियों 1:15-17)। प्रेरितों ने परमेश्वर के वचन की घोषणा करने के इस कार्य को कलीसिया के अगुवों की अगली पीढ़ी को सौंपा: “वचन का प्रचार कर, समय और असमय तैयार रह, बड़े धैर्य से शिक्षा देते हुए ताड़ना दे, डांट और समझा ” (2 तीमुथियुस 4:2)।

ऐसे पुरुष होने के नाते जिनको परमेश्वर के झुण्ड की अगुवाई का काम दिया गया है, हमारे पास भी प्रचार के लिए वही बोझ और दर्शन होना चाहिए। अतः एक प्रचारक के रूप में अपने काम के बारे में सोचते हुए ध्यान देने वाली ये पाँच बातें हैं:

1. परमेश्वर के वचन के लिए प्रेम
जो पुरुष परमेश्वर के वचन का प्रचार करना चाहता है, उसे परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने में आनन्दित होना चाहिए। वह अध्ययन इसलिए नहीं करता है क्योंकि उसके पास अपने समय के साथ करने के लिए और कुछ नहीं है, परन्तु इसलिए क्योंकि उसका हृदय महिमामय सुसमाचार और इसके सत्य से मोहित है। “उसका आनन्द यहोवा की व्यवस्था में है और वह उसकी व्यवस्था पर रात-दिन मनन करता रहता है ” (भजन 1:2; 119; 16)। वह अनुभव से जानता है कि पवित्रशास्त्र “सोने से, हां, बहुत से ताए हुए सोने से भी अधिक मनभावने हैं; वे तो मधु से, यहां तक कि टपकने वाले छत्ते से भी मधुर हैं ” (भजन 19:10)। परमेश्वर के वचन के लिए यह प्रेम प्रचारक को उसके अध्ययन के लिए प्रेरित करता है।

2. सीखने का स्वभाव
प्रचारक अपने शिक्षा देने के कार्य को कठिन परिश्रम और नम्रता में होकर करता है। वह “अपने आपको परमेश्वर को ग्रहणयोग्य ऐसा कार्य करनेवाला ठहराने का प्रयत्न करता है जिससे लज्जित होना न पड़े, और जो सत्य के वचन को ठीक-ठीक काम में लाए ” (2 तीमुथियुस 2:15)। परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने के लिए एक आकस्मिक और आलसी रवैया किसी को भी लाभ नहीं देगा। इसके स्थान पर, जो कोई प्रचार करने की इच्छा रखता है, उसे कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार होना चाहिए और अपने झुण्ड में इसे लागू करने के प्रयास करने से पहले अपने जीवन में पवित्रशास्त्र को सीखने और लागू करने के लिए तैयार होना चाहिए।

जो कोई प्रचार करने की इच्छा रखता है, उसे कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार होना चाहिए और अपने झुण्ड में इसे लागू करने के प्रयास करने से पहले अपने जीवन में पवित्रशास्त्र को सीखने और लागू करने के लिए तैयार होना चाहिए।

3. प्रचारक का जीवन
परमेश्वर के वचन के प्रचारकों को बाइबल का अध्ययन केवल प्रचार करने या बौद्धिक जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने के उद्देश्य से करने के खतरे से सावधान रहना चाहिए। हमें एज्रा जैसा पुरुष होना चाहिए, जिसने “यहोवा की व्यवस्था का अध्ययन करने, उस पर चलने और इस्राएल में उसकी विधि और नियम सिखाने में अपना मन लगाया ” (एज्रा 7:10)। हम प्रचारकों को परमेश्वर द्वारा उपयोग में लाए जाने वाला पवित्र पात्र होना चाहिए (2 तीमुथियुस 2:20-22)। और इसलिए, हमें पवित्रता में बढ़ने के लिए पाप के साथ प्रतिदिन युद्ध में संलग्न होने की आवश्यकता है। एक प्रचारक जिसने स्वयं को परमेश्वर की महिमा हेतु जीने के लिए समर्पित किया है, उसके जीवन में पाप से लड़ने और पवित्रता में बढ़ने की इच्छा दिखाई देनी चाहिए। ऐसा प्रचारक अपनी इच्छा परमेश्वर को समर्पित करता है और जानता है कि वह हमारे प्रधान रखवाले, अर्थात् मसीह के अधीन है (1 पतरस 5:1-4)।

परमेश्वर के वचन के प्रचारकों को बाइबल का अध्ययन केवल प्रचार करने या बौद्धिक जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने के उद्देश्य से करने के खतरे से सावधान रहना चाहिए।

4. बिना मिलावट का सन्देश
प्रेरितों ने सामग्री से समझौता किए बिना सुसमाचार का प्रचार किया (1 थिस्सलुनिकियों 2:5)। और पौलुस ने कहा “यदि हम या कोई स्वर्गदूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हमने तुम को सुनाया है, कोई अन्य सुसमाचार तुम्हें सुनाए तो शापित हो ” (गलातियों 1:8)। जिस प्रकार जब यहूदी चिन्ह मांग रहे थे और यूनानी ज्ञान चाहते थे, तब पौलुस क्रूस ने पर चढ़ाए गए मसीह का प्रचार किया (1 कुरिन्थियों 2:2), हमें भी एक ऐसे संसार में जो कान की खुजलाहट चाहता है, बाइबल के सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए (2 तीमुथियुस 4: 3)। हमारे व्यक्तिगत अनुभव रुचिकर हो सकते हैं, लेकिन बिना मिलावट के केवल एक ही सुसमाचार में “प्रत्येक विश्वास करने वाले के लिए उद्धार की सामर्थ्य है ” (रोमियों 1:27)।

5. प्रचार का उद्देश्य
हमारे संदेश में खराई के साथ-साथ, हमारा उद्देश्य भी स्पष्ट होना चाहिए। जब हम सुसमाचार का प्रचार करते हैं, तब हम व्यक्तिगत प्रसिद्धि, एक विरासत छोड़कर जाने, या शहर में सबसे बड़ी मण्डली बनाने जैसी बातों के प्रलोभन में पड़ सकते हैं। ऐसे समय में जब “कुछ तो ईर्ष्या और द्वेष के कारण मसीह का प्रचार करते हैं…कुछ स्वार्थमय अभिलाषा से ” (फिलिप्पियों 1: 15,17), प्रेरितों ने विश्वासयोग्यता से सुसमाचार का प्रचार किया। पौलुस द्वारा वर्णित सेवकाई के उद्देश्य से सीखने में हमारी भलाई है, जब वह कहता है “हम [मसीह] का प्रचार करते हैं, हर एक मनुष्य को चिता देते हैं और समस्त ज्ञान से हर एक को सिखाते हैं, जिससे कि प्रत्येक व्यक्ति को मसीह में सिद्ध करके उपस्थित कर सकें ” (कुलुस्सियों 1:28)।

हमारे संदेश में खराई के साथ-साथ, हमारा उद्देश्य भी स्पष्ट होना चाहिए।

परमेश्वर के वचन का प्रचार करना एक महान बुलाहट और महान सौभाग्य है। हमें योद्धाओं के समान—अपने काम पर ध्यान केन्द्रित करने वाले, पहलवानों के समान—अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वयं को अनुशासित करने वाले, तथा किसानों के समान—कठिन परिश्रम करके प्रतिफल के लिए परमेश्वर पर भरोसा रखने वाले होने चाहिए (2 तीमुथियुस 2:4-6)। जैसे-जैसे हम परमेश्वर के वचन से प्रेम करते हैं, मेहनत से अध्ययन करते हैं, अपने उत्तरदायित्व को पूरा करते हैं, अपने हृदय की चौकसी करते हैं, अपने जीवन को जाँचते हैं, और मसीह की कलीसिया की सेवा करते हैं, काश हम उस दिन की चाह करें जब परमेश्वर के अनुग्रह से हम इन शब्दों को सुनें “शाबाश, अच्छे और विश्वासयोग्य दास ” (मत्ती 25:23)।