May 29, 2026

दुःख के बीच जीवित आशा

हम सभी ऐसे संसार में रहते हैं जहाँ दुःख, बीमारी, निराशा और मृत्यु जीवन का भाग हैं। चाहे किसी प्रियजन की मृत्यु हो, किसी बच्चे की बीमारी, आर्थिक संघर्ष, या किसी सम्बन्घ का टूट जाना—दुःख किसी न किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को स्पर्श करता है। ऐसे समय में हमारे मन में अनेक प्रश्न उठते हैं। हम सोचते हैं, “यदि परमेश्वर मुझसे प्रेम करता है, तो वह यह सब क्यों होने देता है?” या “क्या मेरी पीड़ा में परमेश्वर वास्तव में मेरे साथ है?”

पवित्रशास्त्र इन प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ता। वह हमें केवल दुःख की वास्तविकता ही नहीं दिखाता, वरन् उसके बीच जीवित आशा भी प्रदान करता है। यही आशा हमें निराशा में डूबने से बचाती है और हमें विश्वास में स्थिर रहने की सामर्थ्य देती है।

1. जब मृत्यु हमारे द्वार पर दस्तक देती है

कभी-कभी जीवन हमें ऐसे अनुभवों से गुजरने देता है जिनके लिए हम तैयार नहीं होते। कुछ महीने पहले हमारी कलीसिया में एक युवा दम्पति ने अपनी 28 सप्ताह की शिशु पुत्री को खो दिया। उस नन्ही-सी देह को कब्र में उतारते समय, भजन गाते हुए, और उन टूटे हुए माता-पिता को देखते हुए, हम सबने मृत्यु की कठोर वास्तविकता को गहराई से महसूस किया।

हम ख्रीष्ट में विश्वास रखने वाले लोग हैं, और हम जानते हैं कि मृत्यु अन्त नहीं है। फिर भी उसका डंक हमारे हृदय को घायल कर देता है। पवित्रशास्त्र स्पष्ट करता है कि यह संसार पतन के अधीन है, जहाँ बीमारी, पीड़ा और मृत्यु वास्तविक हैं। यही कारण है कि दुःख हमें अस्थिर कर देता है; यह हमें स्मरण दिलाता है कि संसार वैसा नहीं है जैसा परमेश्वर ने मूल रूप से रचा था।

मृत्यु हमें हमारी सीमाओं का भी बोध कराती है। यह हमें दिखाती है कि मनुष्य कितना भी सामर्थी क्यों न हो, वह जीवन और मृत्यु पर नियन्त्रण नहीं रखता। ऐसे क्षणों में हमें अपने जीवन की नश्वरता और परमेश्वर पर अपनी निर्भरता का आभास होता है।

2. हमारे आँसुओं में हमारे साथ खड़ा ख्रीष्ट

दुःख के बीच पवित्रशास्त्र हमें एक अद्भुत सांत्वना देता है—हमारा उद्धारकर्ता हमारे दुःखों से अपरिचित नहीं है। यीशु ख्रीष्ट ने स्वयं इस संसार की पीड़ाओं का अनुभव किया। उसने अस्वीकृति सही, विश्वासघात सहा, उपहास झेला और क्रूस पर मृत्यु का सामना किया।

जब लाज़र की मृत्यु हुई, तब यीशु रोया। यह हमें दिखाता है कि वह केवल शिक्षा देने वाला गुरु नहीं, वरन् हमारे दुःखों में सहभागी होने वाला प्रभु है। जब हमारा हृदय टूटता है, तब वह हमारे निकट होता है। जब हमारी शक्ति चूक जाती है, तब वह हमें सम्भालता है।

ख्रीष्टीय जीवन में शोक और विश्वास विरोधी नहीं हैं। विश्वासी रो सकता है, दुःखी हो सकता है और अपने दुःख को स्वीकार कर सकता है। परन्तु उसका शोक निराशा से भरा नहीं होता, क्योंकि उसकी आशा ख्रीष्ट में स्थिर रहती है। हम जानते हैं कि परमेश्वर हमारे दुःखों के बीच भी कार्य कर रहा है और हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढाल रहा है।

3. कब्र से परे दिखाई देने वाली आशा

ख्रीष्टीय आशा केवल वर्तमान सांत्वना तक सीमित नहीं है। यह भविष्य की निश्चित प्रतिज्ञा पर आधारित है। जब हम किसी प्रियजन को खोते हैं, तब हम केवल अपनी हानि को नहीं देखते, परन्तु उस दिन की ओर भी दृष्टि लगाते हैं जब परमेश्वर सब कुछ नया कर देगा।

प्रकाशितवाक्य 21:4 हमें यह अद्भुत प्रतिज्ञा देता है: “वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और न मृत्यु रहेगी, न शोक, न विलाप, न पीड़ा।”

यह केवल एक सुन्दर विचार नहीं है; यह परमेश्वर का अटल वचन है। ख्रीष्ट का पुनरुत्थान हमें यह भरोसा देता है कि मृत्यु अन्तिम सत्य नहीं है। जिस प्रभु ने कब्र पर विजय प्राप्त की, वही एक दिन अपने लोगों को भी पुनरुत्थान की महिमा में सहभागी करेगा। इसलिए विश्वासी की आशा केवल इस जीवन के सुधर जाने में नहीं, वरन् उस अनन्त राज्य में है जहाँ धार्मिकता, आनन्द और परमेश्वर की उपस्थिति पूर्ण रूप से प्रकट होगी।

4. दुःख में कलीसिया: परमेश्वर के प्रेम का दृश्यमान रूप

दुःख के समय में परमेश्वर ने हमें अकेला नहीं छोड़ा है। उसने हमें कलीसिया दी है—एक ऐसा आत्मिक परिवार जहाँ हम एक-दूसरे के बोझ उठाते हैं। जब कोई भाई या बहन टूटता है, तब हम उसके साथ खड़े होते हैं; जब कोई रोता है, तब हम उसके साथ रोते हैं।

बहुधा दुःखी व्यक्ति को उत्तरों से अधिक उपस्थिति की आवश्यकता होती है। एक प्रार्थना, एक सन्देश, भेंट करना या चुपचाप साथ बैठ जाना भी परमेश्वर के अनुग्रह का साधन बन सकता है। कलीसिया का यही प्रेम संसार के सामने ख्रीष्ट के प्रेम को प्रकट करता है।

परमेश्वर अनेक बार अपनी सांत्वना अपने लोगों के माध्यम से पहुँचाता है। इसलिए दुःख के समय विश्वासियों की सहभागिता अत्यन्त मूल्यवान होती है।

5. जब राह कठिन हो, तब भी विश्वास में स्थिर रहो

पवित्रशास्त्र हमें केवल सांत्वना ही नहीं देता, वरन् एक पुकार भी देता है—विश्वास में स्थिर रहने की। दुःख का मार्ग कठिन हो सकता है, और कभी-कभी बहुत लंबा भी प्रतीत हो सकता है, परन्तु यह व्यर्थ नहीं है।

सम्भव है कि आज आप ऐसे प्रश्नों से जूझ रहे हों जिनका उत्तर आपको नहीं मिला। सम्भव है कि आपकी प्रार्थनाएँ अभी तक पूरी न हुई हों। फिर भी परमेश्वर आपको नहीं छोड़ रहा। वह आपको थामे हुए है, भले ही आप स्वयं को दुर्बल और असहाय अनुभव करते हों।

विश्वास का अर्थ हर उत्तर जान लेना नहीं है। विश्वास का अर्थ उस परमेश्वर पर भरोसा रखना है जो हर उत्तर जानता है। यही विश्वास हमें दुःख के अन्धकार में भी आगे बढ़ने की सामर्थ्य देता है।

अनुशंसित पुस्तक

यदि आप दुःख, पीड़ा और परमेश्वर की प्रभुता के विषय में और गहराई से समझ प्राप्त करना चाहते हैं, तो डॉ. आर. सी. स्प्रोल द्वारा लिखित पुस्तक “दुःख द्वारा अचम्भित” अवश्य पढ़ें। इस पुस्तक में लेखक बाइबल के प्रकाश में दुःख के कठिन प्रश्नों पर विचार करते हैं और विश्वासियों को ख्रीष्ट में मिलने वाली आशा की ओर ले जाते हैं।

यह पुस्तक मार्ग सत्य जीवन द्वारा हिन्दी में प्रकाशित की गई है और इसे यहाँ से प्राप्त किया जा सकता है:https://margsatyajeevan.com/book/surprised-by-suffering/

निष्कर्ष

दुःख हमारे जीवन की सबसे कठिन वास्तविकताओं में से एक है, परन्तु यह हमारी कहानी का अंतिम अध्याय नहीं है। ख्रीष्ट में हमें ऐसी आशा मिली है जो कब्र से भी आगे जाती है। जब हमारे आँसू बहते हैं, तब भी परमेश्वर हमें नहीं छोड़ता; जब हमारे प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं, तब भी उसकी प्रतिज्ञाएँ अटल रहती हैं।

यदि आज आप किसी शोक, पीड़ा या कठिन परिस्थिति से गुजर रहे हैं, तो यह स्मरण रखिए कि आपका उद्धारकर्ता आपके दुःख को जानता है। वह आपके साथ चल रहा है, आपको थामे हुए है, और उस दिन की ओर ले जा रहा है जब दुःख, मृत्यु और आँसू सदा के लिए समाप्त हो जाएँगे।

दृष्टि को ख्रीष्ट पर लगाए रखिए। मृत्यु ने अंतिम शब्द नहीं कहा है। दुःख ने अंतिम शब्द नहीं कहा है। अंतिम शब्द हमारे जीवित उद्धारकर्ता का है—और उसका शब्द आशा, जीवन और विजय का शब्द है।

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विवेक जॉन
विवेक जॉन

परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हैं और मार्ग सत्य जीवन के साथ सेवा करते हैं।

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