हमारे देश में सामान्य रूप से मृत्यु के दिन को अशुभ और शोक का दिन माना जाता है। परन्तु जब हम प्रभु यीशु ख्रीष्ट की क्रूस पर मृत्यु की बात करते हैं, तो यह दिन “शुभ शुक्रवार” कहलाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस दिन यीशु ख्रीष्ट—जो सदेह पूर्ण परमेश्वर और पूर्ण मनुष्य हैं—हम पापियों के पापों की क्षमा और उद्धार के लिए क्रूस पर चढ़ाए गए। उन्होंने हमारे लिए स्वयं को बलिदान कर दिया।
यीशु के क्रूसीकरण का दिन, अर्थात् शुभ शुक्रवार, सम्पूर्ण मानव इतिहास का सबसे अधिक दुःखद और गम्भीर दिन था। इस दिन सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने मनुष्य का रूप धारण करके क्रूस पर मृत्यु सही। यह दिन शोक, पीड़ा और न्याय का दिन था; किन्तु इसी के साथ यह अनुग्रह, उद्धार और आशा का भी दिन है। इसलिए, यद्यपि यह बाहरी दृष्टि से दुःख का दिन है, वरन् आत्मिक दृष्टि से यह अत्यन्त शुभ और जीवनदायक है।
इस दिन को “शुभ” कहे जाने के पीछे मुख्यतः तीन गहरे और बाइबलीय कारण हैं—
1 क्योंकि इस दिन परमेश्वर का न्यायपूर्ण प्रकोप और करुणा एक साथ प्रकट हुए
शुभ शुक्रवार वह दिन है जब परमेश्वर का पवित्र, धर्मी और न्यायपूर्ण प्रकोप तथा उसका अनन्त प्रेम—दोनों क्रूस पर एक साथ प्रकट हुए। परमेश्वर पिता हमारे पापों के कारण धर्मी रीति से क्रोधित था। उसका न्याय यह माँग करता था कि पाप का दण्ड अवश्य दिया जाए। यह दण्ड सम्पूर्ण मानवता को सहना था, क्योंकि हम सब पापी हैं।
किन्तु इसी स्थान पर परमेश्वर की अद्भुत योजना प्रकट होती है—प्रभु यीशु ख्रीष्ट ने हमारे स्थान पर उस दण्ड को सह लिया। क्रूस पर उन्होंने परमेश्वर पिता के प्रचण्ड प्रकोप को अपने ऊपर लिया और उसके कोप को शान्त किया। इस प्रकार वे हमारे पापों के लिए प्रायश्चित्त बने (1 यूहन्ना 2:2)।
न केवल परमेश्वर का न्याय प्रकट हुआ, अपितु उसी क्षण उसका अनन्त प्रेम और करुणा भी प्रकट हुई। हमने पहले उससे प्रेम नहीं किया, परन्तु उसने पहले हमसे प्रेम किया और अपने पुत्र को हमारे लिए दे दिया (1 यूहन्ना 4:10)। यह सत्य अत्यन्त अद्भुत है कि परमेश्वर पिता ने हमारे पापों के बदले में अपने एकलौते पुत्र को दे दिया, ताकि वह हमारे स्थान पर बलिदान होकर हमें उद्धार प्रदान करे। इस प्रकार, क्रूस परमेश्वर के न्याय और प्रेम दोनों का सर्वोच्च प्रगटीकरण है।
2 क्य यीशु ने हमारे स्थान पर दुःख सहकर सिद्ध और पूर्ण बलिदान दिया
प्रभु यीशु ख्रीष्ट ने केवल दुःख ही नहीं सहा, वरन् उन्होंने हमारे स्थान पर दण्डात्मक प्रतिस्थापनीय प्रायश्चित्त (Substitutionary Atonement) बनकर हमारे पापों का दण्ड अपने ऊपर ले लिया। उन्होंने हमारे बदले में समस्त पीड़ाओं, अपमान और न्याय को सहा और एक दुःख उठाने वाले सेवक बने। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, किन्तु परमेश्वर की पूर्वनियोजित योजना का भाग थी, जिसकी भविष्यवाणी यशायाह ने लगभग 700 वर्ष पहले की थी:
“वह हमारे ही अपराधों के कारण बेधा गया… हमारे अधर्म के कामों के लिए कुचला गया… यहोवा ने हम सब के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया…” (यशायाह 53)
यह बलिदान अद्वितीय और सिद्ध था।
“क्योंकि यह असम्भव है कि बैलों और बकरों का लहू पापों को दूर करे” (इब्रानियों 10:4), अपितु यीशु ख्रीष्ट ने स्वयं को एक बार सदा के लिए पूर्ण बलिदान के रूप में अर्पित किया। उन्होंने हमारे पापों का दण्ड, दोष और शाप अपने ऊपर ले लिया, ताकि हम परमेश्वर के सामने पवित्र और निर्दोष ठहराए जाएँ। इसलिए परमेश्वर का वचन कहता है: “अब उन पर जो ख्रीष्ट यीशु में हैं, दण्ड की आज्ञा नहीं” (रोमियों 8:1)
3 क्योंकि क्रूस के द्वारा हमारा परमेश्वर से मेल-मिलाप हुआ
क्रूस केवल दण्ड और मृत्यु का स्थान नहीं था, वरन् वह स्थान था जहाँ परमेश्वर और मनुष्य के बीच टूटा हुआ सम्बन्ध पुनः स्थापित हुआ। हम जो अपने पापों के कारण परमेश्वर से दूर, आशाहीन और मन से बैरी थे, यीशु ख्रीष्ट के बलिदान के द्वारा उसके समीप लाए गए। प्रेरित पौलुस हमें स्मरण दिलाता है:
“तुम पहिले ख्रीष्ट से दूर, आशाहीन और संसार में परमेश्वर रहित थे, परन्तु अब ख्रीष्ट के लहू के द्वारा उसके समीप लाए गए हो” (इफिसियों 2:12-13)
न केवल हमें परमेश्वर के निकट लाया गया, अपितु उसके साथ हमारा मेल-मिलाप भी हुआ। उसके बहाए गए लहू के द्वारा हमारे और परमेश्वर के बीच शान्ति स्थापित हुई (कुलुस्सियों 1:19-20)। हम जो पहले मन से बैरी थे, अब यीशु की शारीरिक देह में क्रूस पर मृत्यु के द्वारा परमेश्वर से मेल करा दिए गए हैं (कुलुस्सियों 1:21-22)।इस प्रकार, क्रूस वह स्थान बन गया जहाँ न्याय पूरा हुआ और अनुग्रह दिया गया—जहाँ दण्ड भी था और उद्धार भी।





