“सुसमाचार क्या है?” इस शीर्षक पर एक लेख लिखना? एक ख्रीष्टीय वेबसाइट के लिए थोड़ा अनावश्यक लग सकता है। क्या सभी ख्रीष्टीय लोगों को पहले से ही सुसमाचार को नहीं समझना चाहिए? हम ऐसा सोच सकते हैं, परन्तु दुख की बात है कि सुसमाचार की सबसे आधारभूत अवधारणा को या तो अनदेखा कर दिया जाता है या तथाकथित विशेषज्ञों द्वारा मान लिया जाता है और इसका कलीसिया पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। इसलिए हमें मूलभूत बातों पर वापस जाने और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हम सुसमाचार को स्पष्ट रूप से समझते हैं।

तो, सुसमाचार क्या है?
बाइबलीय ग्रीक में सुसमाचार शब्द ευαγγελιον (यूआंग्लियान) है और इसका सीधा सा अर्थ है अच्छा समाचार। बहुत ही आधारभूत स्तर पर, सुसमाचार समाचार है, किसी प्रकार की जानकारी जो सकारात्मक, अच्छी और सहायक है। जब हम नए नियम के दृष्टिकोण से सुसमाचार के बारे में बात करते हैं, तो यह बहुत अधिक विशिष्ट है। हम इसे 1 कुरिन्थियों 15:3-4 में देखते हैं, जहां पौलुस हमें बताता है: “मैंने यह बात जो मुझ तक पहुंची थी उसे सब से मुख्य जानकर तुम तक भी पहुंचा दी, कि पवित्रशास्त्र के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिए मरा, और गाड़ा गया, तथा पवित्रशास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा।”

मुझे आशा है कि आपने ध्यान दिया होगा कि यह अच्छा समाचार यीशु ख्रीष्ट के व्यक्ति और कार्य के बारे में है और इसका प्रभाव उसके श्रोताओं पर होता है। जब नये नियम के लेखक सुसमाचार के बारे में बात करते हैं, तो यह सदैव यीशु ख्रीष्ट से सम्बन्धित होता है जिसमें क्रूस पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परन्तु सुसमाचार व्यक्ति और यीशु ख्रीष्ट के कार्य से क्यों जुड़ा है? इसका उत्तर देने के लिए, आइए हम परमेश्वर के चार गुणों को देखें जिन्हें पवित्रशास्त्र में प्रकट किया गया है।

परमेश्वर हमसे ठीक ही अपेक्षा करता है कि हम उसकी आराधना करें, उसका आदर करें और उसके स्तरों के अनुसार उसके लिए जीएं

1. सृष्टिकर्ता परमेश्वर
यदि आप बाइबल के बड़े चित्र से अवगत हैं, तो आप जानते हैं कि पहली पुस्तक उत्पत्ति से पता चलता है कि परमेश्वर इस सृष्टि का सृजनहार है। कुछ भी दृश्य और अदृश्य नहीं है जो उसके बिना सृजे अस्तित्व में हो, और जो कुछ भी उसने बनाया वह अच्छा और अद्भुत था। सबसे बढ़कर, परमेश्वर ने मनुष्य को उसकी महिमा को प्रतिबिंबित करने और उसकी आराधना करने और उसके साथ एक सम्बन्ध में रहने के लिए अपने स्वरूप में बनाया।

यह सत्य कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, परमेश्वर के प्रमुख गुणों में से एक है जिसे हमें सुसमाचार के बारे में सोचते समय ध्यान में रखने की आवश्यकता है। यदि यह सच नहीं होता, तो हम जो कुछ भी बात करते हैं वह केवल एक मिथ्या है। क्योंकि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है, जो कुछ भी अस्तित्व में है उसका अर्थ और उद्देश्य उसी से प्राप्त होता है। यही कारण है कि प्रकाशितवाक्य 4:11 घोषित करता है, “हे हमारे प्रभु और परमेश्वर, तू ही महिमा, आदर और सामर्थ्य के योग्य है, क्योंकि तू ने ही सब वस्तुओं को सृजा, और उनका अस्तित्व और उनकी सृष्टि तेरी ही इच्छा से हुई।” परमेश्वर हमसे ठीक ही अपेक्षा करता है कि हम उसकी आराधना करें, उसका आदर करें और उसके स्तरों के अनुसार उसके लिए जीएं। दूसरे शब्दों में, हम सब उसके प्रति उत्तरदायी हैं।

2. पवित्र परमेश्वर
बाइबल के परमेश्वर के पास न केवल शक्तिशाली सृष्टिकर्ता है, किन्तु परिभाषा के अनुसार वह अपने चरित्र और अस्तित्व (जो वह है) में भी पूरी तरह से पवित्र है। और क्योंकि वह पवित्र है, वह ठीक ही अपेक्षा करता है कि मनुष्य जो उसके स्वरूप में सृजे गए हैं, उसकी पवित्रता को प्रतिबिम्बित करेंगे। उनके स्वरूप में बनाए जाने का तात्पर्य है कि हम पृथ्वी पर उसके प्रतिनिधि होने के लिए और पूरी पवित्रता में उसकी ओर से सारी सृष्टि पर शासन करने के लिए हैं।

परन्तु सृष्टि के शीघ्र पश्चात, हम देखते हैं कि पाप ने संसार में प्रवेश किया और उत्पत्ति अध्याय 3 में एक बड़ी उथल-पुथल का कारण बना। शैतान ने आदम और हव्वा को उकसाया और उन्हें परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रोत्साहित किया और ऐसा करने में पूरी सृष्टि ने परमेश्वर के क्रोध का सामना किया। बाइबल का परमेश्वर एक उदासीन और विमुख सृष्टिकर्ता नहीं है जो चीजों को बनाता है और उन्हें स्वयं छोड़ देता है। इसलिए जब पाप ने प्रवेश किया, तो मनुष्य और पवित्र सृष्टिकर्ता के मध्य सम्बन्ध बाधित हो गया। पवित्र परमेश्वर, सम्भवतः पापी मानवता के साथ सम्बन्ध में बने नहीं रह सकते थे।

3. न्यायी परमेश्वर
जब मनुष्य ने पाप किया, तो उसने सर्वशक्तिमान, सम्प्रभु, पवित्र सृष्टिकर्ता परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया। हमें उस घटना की गम्भीरता को उत्पत्ति के आरम्भिक अध्यायों में समझना चाहिए। यह बहुत बड़ी बात थी। यह गम्भीर था। यह इस सृष्टि के राजा के विरुद्ध एक पूर्ण विद्रोह था। और क्योंकि परमेश्वर पवित्र और न्यायी है, वह इस अपराध को एक छोटे से उल्लंघन के रूप में अनदेखा नहीं कर सकता था। उसे इस अपराध के लिए मानवता को दण्डित करना पड़ा। पाप को दण्डित न होने देना, सम्प्रभु सृष्टिकर्ता के रूप में उसके अधिकार, पवित्रता के उसके स्तरों और उसकी न्याय प्रणाली के बारे में गम्भीर प्रश्न खड़ा करेगा। न्यायपूर्ण और सही होने के लिए, उसे जो कुछ भी है उसके लिए उसे दण्डित करना होगा। बिना किसी दण्ड के पाप क्षमा नहीं किया जा सकता था।

यह सब बहुत गम्भीर है। इसके बारे में ध्यान से सोचें: परमेश्वर जिसके पास सारी सृष्टि पर पूर्ण अधिकार है, जिसने अपनी महिमा के लिए सब कुछ बनाया, जिसमें मनुष्य भी सम्मिलित है, पूरी निष्ठा और आराधना की अपेक्षा करता है और योग्य है। परन्तु इसके अतिरिक्त, मानवता वास्तव में उसकी आराधना करने में विफल रहती है और उसके विरुद्ध विद्रोह करती है। इस सम्प्रभु परमेश्वर के पास न्याय के सिद्ध स्तर हैं और इसका अर्थ है कि पाप से निपटा जाना चाहिए, विद्रोह को कुचला जाना चाहिए, पापियों को उसके क्रोध का सामना करना चाहिए!

पाप और विद्रोह का शीघ्र न्याय यह था कि हमारे पहले माता-पिता आदम और हव्वा को अदन की वाटिका से निकाल दिया गया था—उनका जीवन अब परिश्रम, पसीना, पीड़ा और हृदय पीड़ा से चिह्नित होगा। इस पूरे प्रकरण का दुखद भाग यह था कि इस न्याय को पूरी सृष्टि को अनुभव करना था। परन्तु मनुष्य को विशेष रूप से इस पृथ्वी पर इस जीवन में और मृत्यु में और फिर जीवन के पश्चात नरक में सदा और सर्वदा के लिए परमेश्वर के न्याय का अनुभव करना था।

अब यदि आप रुक कर इस सब के बारे में सोचें, तो यह वास्तव में बहुत बुरा सन्देश है। मनुष्य संकट में है क्योंकि उसने एक सच्चे सम्प्रभु सृष्टिकर्ता परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया है। वास्तविकता यह है कि सभी पापी मानवता निश्चित मृत्यु का सामना करती है (पहले इस पृथ्वी पर शारीरिक मृत्यु और फिर नरक में अनन्त आत्मिक मृत्यु), और अनन्त न्याय। चूँकि मनुष्य ने सर्वशक्तिमान पवित्र और न्यायपूर्ण सृष्टिकर्ता के विरुद्ध विद्रोह किया है, इसलिए हमें परमेश्वर के निकट क्रोध से बचने की अत्यन्त आवश्यकता है। हमारे लिए कोई आशा नहीं होनी चाहिए।

4. प्रेमी परमेश्वर
धन्यवाद हो कि बाइबल का परमेश्वर न केवल पवित्र और न्यायी सृष्टिकर्ता है, किन्तु एक प्रेम करने वाला परमेश्वर भी है। वह जानता है कि पापी मनुष्यों को परमेश्वर से बचाने के लिए, परमेश्वर को इसके बारे में कुछ करना होगा। और क्योंकि वह एक प्रेम करने वाला परमेश्वर है, उसने अपने इकलौते पुत्र को इस संसार में एक सिद्ध जीवन जीने के लिए भेजा और फिर हमारे पापों के दण्ड का भुगतान करने के लिए क्रूस पर मर गया। ख्रीष्ट का प्रायश्चित का बलिदान पाप के प्रति परमेश्वर के न्यायोचित क्रोध को सन्तुष्ट करता है और पापियों को क्षमा करने का मार्ग तैयार करता है। अपने प्रेम के कारण, वह इसे उन सभी के लिए लागू करता है जो उसके हैं, उन सभी के लिए जो उसके पुत्र पर भरोसा करते हैं! हम इसे यूहन्ना 3:16 में स्पष्ट रूप से पढ़ते हैं: “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया, कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।”

तो फिर, सुसमाचार क्या है?
बाइबल का शुभ समाचार यह है कि जो लोग परमेश्वर के भेजे हुए पर विश्वास करते हैं, वे नाश नहीं होंगे।  ‘नाश न हो’  बाइबल का अर्थ है कि उन्हें अनन्त काल तक नरक में परमेश्वर के क्रोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। परन्तु वे नाश क्यों नहीं होंगे? ऐसा इसलिए है क्योंकि पुत्र ने उनकी ओर से उनके पापों के दण्ड का भुगतान किया है जब वह क्रूस पर मरा। सृष्टिकर्ता के पवित्र व्यवस्था की मांगों को पूरा किया गया है। विश्वासियों की सबसे महत्वपूर्ण, सबसे आधारभूत आवश्यकता स्वयं परमेश्वर ने अपने पुत्र, यीशु ख्रीष्ट के जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान के माध्यम से पूरी की है। यह अब तक का सबसे अच्छा समाचार है, और यही सुसमाचार है!

एक निर्णय करने के लिए!
मुझे आशा है कि जैसा कि हम सुसमाचार को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं, यह स्पष्ट है कि सुनने वालों को इस समाचार को सुनकर निर्णय लेना है। हमें यह पहचानना होगा कि हम संकट में हैं—हमने पाप किया है, और हम परमेश्वर के क्रोध के अधीन हैं और अपने जीवन में परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना अनंतकाल तक नरक में सामना कर रहे हैं। हमें यह पहचानने और स्वीकार करने की आवश्यकता है कि हम अपने लिए कुछ भी करने में असमर्थ हैं। कोई भी अच्छे कार्य और धार्मिक गतिविधियाँ हमें बचा नहीं पाएंगी। हमारी एकमात्र आशा है कि हम अपने पापों को स्वीकार करते हुए और अपनी दयनीय स्थिति के बारे में कुछ भी करने में  अपनी असमर्थता को स्वीकार करते हुए परमेश्वर के पास आएं। दूसरे शब्दों में, हमें अपने पापों से, अपने विद्रोह से, पश्चाताप करना चाहिए (फिरना), और नम्रता में परमेश्वर की ओर मुड़ना चाहिए।

दूसरा पहलू यह है कि हमें सुसमाचार पर विश्वास करना चाहिए — कि यीशु ने हमारे स्थान पर पवित्रता का एक सिद्ध जीवन जिया और हमारी ओर से पापों के न्यायपूर्ण दण्ड का भुगतान करने के लिए क्रूस पर एक लज्जाजनक, पीड़ादायक और शापित मृत्यु मरा जो हमें मरना चाहिए था। और जब हम अपने पापों से पश्चाताप करते हैं और यीशु ख्रीष्ट के क्रूस पर किए गए कार्य में अपना पूरा भरोसा रखते हैं, तो हम निश्चित रूप से पवित्र, न्यायी, और प्रेममय सृष्टिकर्ता परमेश्वर से पूर्ण रीति से और सही अर्थ में और स्वतंत्र रूप से क्षमा प्राप्त करेंगे!

यह सुसमाचार है और अब तक का सबसे अच्छा समाचार है! क्या कोई इससे अच्छा समाचार है? कोई इस बात को स्वीकार क्यों नहीं करना चाहेगा? कोई क्यों सोचेगा कि इससे अच्छा कोई और प्रस्ताव है?