उचित रीति से सुनने के छह पाठ

सुनना सबसे आसान कार्यों में से एक है जिसे आप कभी करेंगे, और सबसे कठिन कार्य भी है। 

एक अर्थ में, सुनना आसान है — या श्रुति  सरल है। यह पहल करने और शक्ति की मांग नहीं करता है जो बोलने में आवश्यक होती है। यही कारण है कि “विश्वास सुनने से, और सुनना ख्रीष्ट के वचन के द्वारा होता है” (रोमियों 10:17)। मुख्य विचार यह है कि सुनना आसान है, और विश्वास हमारी गतिविधि की अभिव्यक्ति नहीं है, परन्तु दूसरे की गतिविधि को हमारे द्वारा ग्रहण करना है। यह “विश्वास सहित सुनने से” है (गलातियों 3:2,5) जो ख्रीष्ट की उपलब्धियों पर बल देता है और इस प्रकार अनुग्रह का माध्यम है जो ख्रीष्टीय जीवन को आरम्भ करता है और बनाए रखता है। 

परन्तु इस सहजता के बाद भी — या सम्भवतः ठीक इसी कारण से — हम प्रायः इसके विरुद्ध लड़ते हैं। हम अपने पाप में, हम दूसरों की अपेक्षा अपने आप पर भरोसा करते हैं, दूसरों की धार्मिकता ग्रहण करने के स्थान पर हम अपनी धार्मिकता को संचित करते हैं, किसी और को सुनने के स्थान पर अपने विचारों को बोलते हैं। सच्चा, निरन्तर, और सक्रिय रूप से सुनना विश्वास का एक महान कार्य है, तथा अनुग्रह का एक महान साधन है, दोनों संगति में स्वयं के लिए तथा दूसरों के लिए। 

उचित रीति से सुनने हेतु निर्देश
खीष्टीय रीति से सुनने के लिए एक आधिकारिक खण्ड याकूब 1:19 हो सकता है, “प्रत्येक व्यक्ति सुनने के लिए तो तत्पर, बोलने में धीरजवन्त, और क्रोध करने में धीमा हो।” यह बात सिद्धान्त में तो सरल है, किन्तु इसके अनुसार जीना लगभग असम्भव है। कई बार हम सुनने में बहुत धीमे, बोलने में तत्पर, और क्रोध में तत्पर होते हैं।  इसलिए, उचित रीति से सुनना रातभर में नहीं सीखा जा सकता। इसके लिए अनुशासन, प्रयास, और सोद्देश्यता की आवश्यकता होती है। लोग कहते हैं कि, आप समय के साथ और अच्छा होते जाते हैं। एक उत्तम श्रोता बनना इस एक बड़े संकल्प पर नहीं निर्भर है कि हम एक ही वार्तालाप में और अच्छा करेंगे, परन्तु अनेक छोटे संकल्पों की पद्धति को विकसित करने पर निर्भर है जो कि विशिष्ट क्षणों में विशेष लोगों पर ध्यान केंद्रित करेगी।

हाल ही में मैंने माना कि मेरे जीवन के इस क्षेत्र में विकास की आवश्यकता है — सम्भवत: आपके जीवन में भी — तो यह हैं छह निर्देश उचित रीति से से सुनने के लिए। हम सुनने के विषय पर बाइबल से बाहर निम्नलिखित तीन सबसे महत्वपूर्ण परिच्छेदों से अपने संकेतों को लेते हैं, डिट्रिच बॉन्होफ़र की पुस्तक साथ में जीवन-Life Together के एक अनुभाग “सुनने की सेवा-the ministry of listening” और साथ ही साथ जेनेट डन  की उत्कृष्ट शिष्यता की पत्रिका-Discipleship Journal  के लेख “एक अच्छा श्रोता कैसे बनें-How to Become a Good Listener।” 

  1. उचित रीति से  सुनने के लिए धैर्य की आश्यकता है
    यहां पर बॉन्होफ़र  हमें कुछ बातों को न करने के लिए कहते हैं: “ध्यान से न सुनने वाला एक प्रकार से मान कर चलता है कि दूसरे व्यक्ति को जो कहना है उसे वह पहले से ही जानता है।” वह यह कहता है, “एक अधीर तथा ध्यान न देने वाला, केवल. . . बोलने के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता है।” सम्भवतः हम सोचते हैं कि हमें पता है कि वक्ता क्या कहने जा रहा है, तो इसलिए हम पहले से ही अपना प्रतिउत्तर तैयार करना आरम्भ कर देते हैं। या सम्भवतः जब हम किसी कार्य के बीच में ही थे तभी किसी ने हमसे बात करना आरम्भ कर दिया हो, या हमारा कोई अन्य कार्य है जिसे हमें करना है, और हम चाहते हैं कि काश वे अपनी बात पूरी कर चुके होते। 

या हो सकता है कि हमें आधा-सुनाई देता है क्योंकि हमारा ध्यान बटा हुआ है, अपने बाहरी परिवेश या स्वयं हमारी आंतरिक प्रतिध्वनि के द्वारा। जैसा कि डन  शोक व्यक्त करते हैं, “खेदजनक बात है, कि हम में से कई लोग स्वयं में बहुत अधिक ध्यानमग्न होते हैं। जो कहा जा रहा है, उस पर ध्यान देने के विपरीत, हम या तो यह विचार करने में व्यस्त हो जाते हैं कि प्रतिउत्तर में क्या कहना है या फिर मानसिक रूप से दूसरे व्यक्ति की बात को निरस्त करने में व्यस्त हो जाते हैं।” 

अनुचित रीति से सुनना दूसरे व्यक्ति को अपमानित करता है, जबकि उचित रीति से सुनना उन्हें बात में बने रहने के लिए आमन्त्रित करता है।

सकारात्मक रीति से कहें तो, उचित रीति से सुनने के लिए एकाग्रता की आवश्यकता होती है और इसका अर्थ है कि हम अपने दोनों कान से सुनते हैं, और हम दूसरे व्यक्ति को तब तक सुनते हैं, जब तक वो अपनी बात समाप्त नहीं कर लेते। कदाचित ही कोई वक्ता अपनी बात का आरम्भ सबसे महत्वपूर्ण और गहरी बात से करता है। हमें सम्पूर्ण विचार के प्रवाह को सुनने की आवश्यकता है, आरम्भ से लेकर अन्त तक, इससे पहले कि आगे की सोचना आरम्भ करें।

उचित रीति से सुनना फोन को मौन की स्थिति में कर देता है और कहानी को नहीं रोकता है, परन्तु ये सचेत तथा धैर्यवान होता है। बाहरी रूप से निश्चिंत और आंतरिक रूप से सक्रिय। हमें उन बातों को रोकने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जैसे कि: ध्यान को भटकाने वाली बातें जो हम पर आक्रमण करती रहती हैं, और वे अतिरिक्त बातें जो हमारी सचेतना पर प्रवाहित होती रहती हैं, और कई अच्छी सम्भावनाएं जिन्हें हम उत्पन्न कर सकते हैं किन्तु जो हमें बाधित करती हैं। जब हम लोग बोलने में तत्पर होते हैं, तो आत्मा-प्रेरित धैर्य की आवश्यकता होती है न केवल सुनने में तत्पर होने के लिए, किन्तु सुनते रहने के लिए । 

  1. उचित रीति से  सुनना प्रेम का एक कार्य है
    बॉन्होफ़र  कहते हैं कि आधा-सुनना मानो, “भाई का तिरस्कार करना है और यह तो केवल बोलने का अवसर पाने की प्रतीक्षा करना है और इस प्रकार से दूसरे व्यक्ति से छुटकारा पाना है।” अनुचित रीति से सुनना तिरस्कारता है; उचित रीति से सुनना अपनाता है। अनुचित रीति से सुनना दूसरे व्यक्ति को अपमानित करता है, जबकि उचित रीति से सुनना उन्हें बात में बने रहने के लिए आमन्त्रित करता है। बॉन्होफ़र लिखते हैं, “जिस रीति से परमेश्वर के लिए प्रेम आरम्भ होता है उसके वचन को सुनने के साथ, उसी रीति से, भाइयों के लिए प्रेम का आरम्भ होता है उनकी बातों को सुनने के द्वारा।” 

उचित रीति से सुनना मसीह के स्वभाव के साथ-ही-साथ चलता है (फिलिप्पियों 2:5)। यह एक नम्र हृदय से प्रवाहित होता है जो अपनी अपेक्षा दूसरों को उत्तम समझता है (फिलिप्पियों 2:3)। वह केवल अपने ही हितों को ध्यान में नहीं रखता है परन्तु दूसरों के भी हितों को ध्यान में रखता है (फिलिप्पियों 2:4)। वह धैर्यवान और दयालु है(1 कुरिन्थियों 13:4)। 

  1. उचित रीति से सुनना ज्ञानवर्धक प्रश्नों को पूछता है।
    यह सम्मति नीतिवचन की पुस्तक में स्पष्टता से लिखी गयी है। “मूर्ख तो समझदारी की बातों से नहीं, पर अपने ही मन की बात प्रकट करने से आनन्दित होता है” (नीतिवचन 18:2)। और इसलिए वह “बिना बात सुने उत्तर देता है” (नीतिवचन 18:13)। नीतिवचन 20:5 में कहा गया है, “मनुष्य के हृदय के उद्देश्य गहरे जल के समान है, परन्तु समझदार मनुष्य उसे खींच निकालता है।” 

उचित रीति से सुनना ज्ञानवर्धक, ऐसे खुले-अन्त वाले प्रश्नों को पूछता है जिसके उत्तर हाँ और न में नहीं हो सकते हैं, परन्तु ये कोमलता से, प्याज को छीलने के समान आंतरिक बातों की खोजबीन करते हैं। यह अशाब्दिक संप्रेषण (बिना शब्दों के संवाद) पर ध्यान देता है, परन्तु पूछताछ नहीं करता है और न ही उन विवरणों को खोदता है जिसे वक्ता बताना नहीं चाहता है, परन्तु कोमलता से उन्हें बाहर खींचता है और वक्ता को नम्रता के साथ किन्तु वास्तविक प्रश्नों के द्वारा नये दृष्टिकोणों की ओर इंगित करने में सहायता करता है। 

आज आप जो सबसे श्रेष्ठ सेवकाई कर सकते हैं, वह है किसी की सम्पूर्ण पीड़ा को अन्त तक सुनना।

  1. उचित रीति से सुनना सेवकाई है। 
    बॉन्होफ़र  के अनुसार, कई बार ऐसा होता है जब “सुनना बोलने की तुलना में बड़ी सेवा हो सकती है।” परमेश्वर केवल हमारे उचित रीति से सुनने से कहीं अधिक ख्रीष्टीय होने की अपेक्षा रखता है, परन्तु उस से कम नहीं चाहता है। ऐसे भी दिन होंगे जब हमारी सबसे महत्वपूर्ण सेवा यह होगी, कि हम अपने कंधों को किसी पीड़ित के सामने झुकाएं, अपनी भुजाओं को मोड़ें, आगे की ओर झुकें, आंखों में आंखें डालें, और उनकी सम्पूर्ण पीड़ा को अन्त तक सुनें। डन  ऐसा कहते हैं, 

उचित रीति से सुनना प्रायः उन भावनाओं के तनाव को कम कर देते हैं जो कि चर्चा की जा रही समस्या का भाग हैं। कभी-कभी इन भावनाओं को व्यक्त करना ही समस्या को हल करने के लिए पर्याप्त होता है। वक्ता सम्भवतः प्रतिउत्तर में न तो कुछ कहना चाहेगा और न ही हमसे अपेक्षा करेगा।

उचित रीति से सुनने की क्षमता को विकसित करने के लिए डन  की अनेक परामर्शों में से एक यह है: “अपने उत्तरों के स्थान पर पुष्टिकरण पर अधिक बल दीजिए। . . .कई बार परमेश्वर बस मुझे एक माध्यम के रूप में उपयोग करना चाहता है अपने पुष्टि करने वाले प्रेम के लिए जब मैं करुणा तथा समझ के साथ सुनता हूं।” यह बॉनहोफर  के विचार को प्रतिध्वनित करता है, “प्रायः किसी व्यक्ति की सहायता की जा सकती है मात्र किसी अन्य जन के द्वारा जो उसको गम्भीरतापूर्वक सुन सके।” कभी-कभार हमारे पड़ोसी को जिस बात की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, वह यह है कि किसी अन्य जन उसकी बात को सुने। 

  1. उचित रीति से सुनना हमें अच्छी तरह से बोलने के लिए तैयार करता है। 
    कभी-कभार उचित रीति से सुनना केवल सुनता ही है, और चुप रहने के द्वारा सर्वोत्तम  सेवा की जाती है, परन्तु सामान्यतः उचित रीति से सुनना हमें अनुग्रह के वचनों की ठीक रीति से सेवा करने के लिए तैयार करता है विशेष रीति से उस स्थान पर जहां अन्य लोग आवश्यकता में हैं। जैसा कि बॉनहोफर  लिखते हैं, “हमें परमेश्वर के कानों के साथ सुनना चाहिए ताकि हम परमेश्वर के वचन बोल सकें।”

जबकि मूर्ख “बिना बात सुने उत्तर देता है” (नीतिवचन 18:13), परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति आत्म-बचाव का प्रतिरोध करने का प्रयास करता है, और एक गैर-आलोचनात्मक दृष्टिकोण से सुनता है, तथा स्वयं को प्रशिक्षित करता है अपनी राय या प्रतिक्रिया तब तक न देने के लिए जब तक सम्पूर्ण विवरण उसके समक्ष न हो और पूरी बात सुन न ली गई हो।

  1. उचित रीति से सुनना परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध को प्रतिबिम्बित करता है। 
    दूसरों को उचित रीति से सुनने की हमारी अयोग्यता एक बकवादी आत्मा का लक्षण हो सकता है जो परमेश्वर की वाणी को ध्यान नहीं दे रहा है। बॉन्होफ़र  चेतावनी देते हैं, 

वह जो अब अपने भाई की बात नहीं सुन सकता है वह शीघ्र ही परमेश्वर को भी नहीं सुनेगा; वह परन्तु परमेश्वर की उपस्थिति में भी बकबक कर रहा होगा। यह आत्मिक जीवन की मृत्यु का आरम्भ है। . . . जो कोई भी यह सोचता है कि उसका समय बहुत मूल्यवान है शांत अवस्था में व्यतीत करने के लिए, तो उसके पास अंततः परमेश्वर तथा भाइयों के लिए समय नहीं होगा, परन्तु केवल उसके स्वयं के लिए और उसकी मूर्खता के लिए।

सच्ची मसीही संगति की गतिविधि में उचित रीति से सुनना अनुग्रह का एक बड़ा साधन है। न केवल यह एक ऐसा साधन है जिसके माध्यम से परमेश्वर हमारे जीवन में अपना अनुग्रह उण्डेलता रहता है, परन्तु हमें दूसरों के जीवन में उसके अनुग्रह के साधन के रूप में उपयोग करने की एक रीति है। यह उन कठिनतम कार्यों में से एक हो सकता है जिन्हें हम करना सीखेंगे, परन्तु हम पाएंगे कि इसके लिए किया गया छोटा सा भी प्रयास इसके योग्य था। 

डेविड मैथिस desiringGod.org के कार्यकारी संपादक हैं और मिनियापोलिस/सेंट में सिटीज चर्च में पासबान हैं।
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