क्या आप प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करते हैं?

“प्रार्थना करो कि तुम प्रलोभन में न पड़ो।”

यीशु अपनी व्यथा के बगीचे में घुटने टेकता है और अपने लोगों को प्रार्थना करने हेतु निर्देश देता है, केवल पाप  के विरुद्ध ही नहीं, परन्तु प्रलोभन  के विरुद्ध भी।

अपने जीवन की कठिन प्रलोभन के आरम्भ में ही, वह अपने शिष्यों को निर्देश देता है — एक बार नहीं परन्तु दो बार (लूका 22:40, 46) — प्रलोभन के विरुद्ध  प्रार्थना करने के लिए। जंगल में चालीस दिनों का लम्बा उपवास निश्चय ही इस प्रलोभन की तुलना में जिसे वह सहने पर है बच्चों के खेल के समान प्रतीत होता होगा। उसका समय अब आ गया था।

वह संसार के इतिहास की एकमात्र सबसे बड़ी प्रलोभन का सामना करता है: क्या पापरहित परमेश्वर-मानव को मृत्यु-तक-यन्त्रणा भोगना पड़ेगा उन विद्रोहियों के पापों के लिए जिनसे वह  प्रेम करता है? और फिर भी, जब उसकी स्वयं की बड़ी प्रलोभन आरम्भ होती है, जो ऐसी व्यथा को लायी कि उसके सिर से पसीना मानो लहू के बूँद के समान गिरता है (लूका 22:44), वह दो बार अपने शिष्यों के पास यह कहने के लिए जाता है, “प्रार्थना करो कि तुम प्रलोभन में न पड़ो” (लूका 22:40, 46)।  

उसकी प्रसिद्ध प्रार्थना में बलपूर्ण प्रभाव
यह केवल पहली (और दूसरी) बार ही नहीं है जब उसने अपने शिष्यों को प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करने के लिए निर्देश दिया है।

जब वे उसके पास आए और पूछा “प्रभु हमें प्रार्थना करना सिखा” (लूका 11:1), तो उसने उन्हें स्मरण रखने योग्य शक्तिशाली और संक्षिप्त “प्रभु की प्रार्थना” के साथ उत्तर दिया जो लूका में अंग्रेजी भाषा में केवल 36 शब्दों में पाई जाती है! ऐसे संक्षेप और केन्द्रित प्रार्थना में, वह केवल उल्लेख ही नहीं करता है परन्तु याचिका के साथ समापन भी करता है “हमें प्रलोभन में न पड़ने दे” (लूका 11:4) ।

“प्रलोभन पर विजय पाने के लिए सबसे अधिक तत्पर वह ख्रीष्टीय है जो प्रार्थना करता है और उसके विरुद्ध योजना बनाता है।”

प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करना किसी अनावश्यक बात को कहना नहीं है, जैसे कि स्वयं परमेश्वर के शब्दों को अनदेखा किया जा सकता है। यहाँ बगीचे में, और ठीक उस समय यीशु ने हमें प्रार्थना करना सिखाया, वह केवल पाप के विरुद्ध ही प्रार्थना करने के लिए नहीं कहता है (यह बात तो अन्तर्निहित है), परन्तु स्पष्ट रूप से प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना  करने के लिए कहता है।

हम में से उनके लिए जो उसके शब्दों पर ध्यान देते हैं,  हम यीशु की आज्ञाओं में कम से कम  (सम्भवतः चकित करने वाले) तीन लागूकरण पाते हैं। 

प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करें
पहला, परमेश्वर वास्तव में हमारी प्रार्थनाओं के प्रतिउत्तर में हमें कुछ प्रलोभनओं से दूर रखता है। परमेश्वर और उसका पुत्र हमें प्रार्थना में खिलवाड़ करने का निर्देश नहीं देते हैं। प्रार्थना महत्वपूर्ण है। सम्प्रभु परमेश्वर इस प्रकार से ब्रह्मांड पर शासन करने का चुनाव करता है जिसमें प्रार्थना एक भूमिका निभाती है। उसकी सम्प्रभुता के तले, कुछ घटनाएं घटती हैं (या नहीं) क्योंकि उसके लोगों ने प्रार्थनाएं की हैं; और अन्य घटनाएं नहीं घटती हैं (या घटती हैं) क्योंकि उन्होंने प्रार्थनाएं नहीं की हैं। 

जब हम न केवल अपने पापों के विरुद्ध ही प्रार्थना करते हैं, परन्तु पाप करने की प्रलोभन के विरुद्ध भी प्रार्थना करते हैं, तो हम परिपक्व होने वाली विनम्रता को प्रकट करते हैं। हम अपनी निर्बलता और पाप के सामर्थ्य को स्वीकारते हैं। और हम अपने पिता के हृदय को पवित्रता और हमारी भलाई के लिए स्मरण रखते हैं। परमेश्वर, “स्वयं किसी की प्रलोभन नहीं करता है” (याकूब 1:13)। पाप का दोष पूर्ण रूप से पापी पर पड़ता है। “प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा द्वारा खिंचकर व फंसकर प्रलोभन में पड़ता है” (याकूब 1:14)। और फिर भी परमेश्वर, अपने अनुग्रह और दया में, हमें अनेकों प्रलोभनओं से बचाए रखने में आनन्दित होता है — असंख्य बार जब हम उससे मांगने में भी विफल हो जाते हैं, और हमारे मांगने के न जाने कितने सीधे प्रतिउत्तर मिलने के बहुमूल्य उदाहरण हैं?

यदि हम अपने आप में पाप की गहराई को, और हमारे पिता में दया की गहराई को गम्भीरता से लेते हैं, तो हम यीशु के वचनों,और जॉन ओवेन के टीका-टिप्पणी पर ध्यान देंगे: “कोई भी व्यक्ति पाप से डरने का दिखावा न करे जो प्रलोभन से भी नहीं डरता है! ये दोनों बहुत ही निकटता से जुड़े हुए हैं कि इनको अलग किया जा सके। वह वास्तव में फल से घृणा नहीं करता है जो जड़ में आनन्दित होता है।” सत्य और भले विवेक के वा्स्ते, हम प्रलोभन को पाप से भेद करते हैं, और पवित्रता और आनन्द के वास्ते, हम उन्हें पृथक नहीं करते हैं। और इसलिए हम केवल अपने पाप के विरुद्ध ही प्रार्थना नहीं करते हैं, परन्तु अपनी प्रलोभनओं के विरूद्ध भी करते हैं। 

प्रलोभन के विरुद्ध योजना बनाएं
दूसरा, जब हम प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करते हैं, तो हम इसे अनदेखा करने की प्रक्रिया को आरम्भ करते हैं, और ऐसा करने पर, हम परमेश्वर के लिए अपनी प्रार्थना का उत्तर देने का एक साधन बन जाते हैं। परमेश्वर प्रायः न केवल हमारी प्रार्थनाओं के कारण हमें प्रलोभन से बचाता है, परन्तु प्रार्थना के कार्य में उसी क्षण, हम और भी गहराई से इस युद्ध में संलग्न होते हैं। हम अपने प्राणों को पाप के विरुद्ध सुदृढ़ करते हैं। हम अधिक गहराई से निवेशित हो जाते हैं। हम, आत्मा के द्वारा, सत्य को पकड़े रहने के लिए संकल्प लेते हैं और इसलिए नहीं कि “पाप के छल में पड़कर कठोर हो जाएं” (इब्रानियों 3:13)। हम अपने हृदयों को स्मरण दिलाते हैं कि पाप के सुख उथले और क्षणिक हैं (इब्रानियों 11:25), जबकि परमेश्वर में जो सुख है वह गहरा और स्थाई है (भजन 16:11)। 

“परमेश्वर वास्तव में हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर में हमें कुछ प्रलोभनओं से बचाएगा”

प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करना हमारी अगुवाई करता है, प्रलोभन के विरुद्ध स्पर्शनीय ढंग से योजना बनाने के लिए। विशिष्ट पापों के प्रति अपनी पद्धति और प्रवृत्ति को जानते हुए, हम मूर्खता के सन्दर्भों से बचते हैं। हम “जवानी की अभिलाषाओं से भागते हैं” (2 तीमुथियुस 2:22) और “शारीरिक वासनाओं की तृप्ति में मन नहीं लगाते हैं” (रोमियों 13:14)। हम व्यभिचारिणी स्त्री (नीतिवचन 5:3) के विषय में अपने पुत्र से प्रेम करने वाले पिता (नीतिवचन 5:1) की बुद्धि पर ध्यान देते हैं: केवल उसके बिछौने से दूर रहने के लिए नहीं परन्तु “ऐसी स्त्री से दूर ही रह, और उसके घर के द्वार के पास भी न जा”  (नीतिवचन 5:8)।  

यह अनुग्रह न केवल पाप से दूर रखने के लिए है परन्तु प्रलोभन से भी दूर रहने का अनुग्रह है (प्रकाशितवाक्य 3:10)। हमारी आत्मा वास्तव में पाप को न कहने के लिए तत्पर हो सकती है, परन्तु देह तो दुर्बल हो सकती है (मत्ती 26:41)। और प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करना हमें इसके विरूद्ध योजना बनाने के मार्ग पर भी स्थापित करती है।  

फिर भी प्रलोभन के लिए तैयार रहें
अन्त में, जब हम प्रलोभन में पड़ते हैं, यदि हमने इसके विरूद्ध प्रार्थना की है, तो हमें बहुत कम अचम्भित होना चाहिए, और युद्ध के लिए सबसे अधिक तैयार रहना चाहिए। परमेश्वर उस हृदय से प्रेम करता है जो प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करता है, और वह प्रायः हमारी विनतियों का उत्तर देता है। और फिर भी हमारी तुलना में उसके मार्ग उच्च हैं। वह जानता है कि, प्रेम में होकर, प्रलोभन को कब आने देना है। वास्तव में, यीशु कहता है, प्रलोभनओं का आना आवश्यक है (लूका 17:1)। चाहे हम जितना भी उसके विरोध में प्रार्थना करें, परमेश्वर ने सदैव इस प्रार्थना का उत्तर जिस रीति से हम चाहते हैं देने की प्रतिज्ञा नहीं की है। अभी तक तो नहीं। 

इसलिए जब हम प्रलोभन के विरूद्ध प्रार्थना करते हैं, तो हम स्वयं को तैयार करते हैं कि जब वे आएँ तो हम आश्चर्यचकित न हों (1 पतरस 4:12)। और जब हम प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना कर चुके होते हैं, तो हम और अधिक स्पष्ट मस्तिष्क से इसका आभास कर सकते हैं कि परमेश्वर ने प्रेमपूर्वक इस परीक्षा को मेरे जीवन में आने दिया है। और उसने मुझे ऐसे क्षण में अपनी प्रतिज्ञाओं के बिना नहीं छोड़ा है। “परमेश्वर तो सच्चा है, जो तुम्हें सामर्थ्य से बाहर प्रलोभन में पड़ने नहीं देगा, परन्तु प्रलोभन के साथ-साथ बचने का उपाय भी करेगा कि तुम उसे सह सको (1 कुरिन्थियों 10:13)। यूसुफ के समान, इसका अर्थ छोड़कर भागना हो सकता है (उत्पत्ति 39:11-12)। यीशु के समान, इसका अर्थ प्रायः परमेश्वर के वचनों को दोहराना हो सकता है (मत्ती 4:1-11) या मूर्खों के सामने चुप रहना हो सकता है (मत्ती 26:63, मरकुस 14:61, प्रेरितों के काम 8:32)। 

प्रभु केवल उन्हें प्रलोभनों से सुरक्षित ही नहीं रखता है परन्तु, “भक्तों को प्रभु प्रलोभन में से निकालना जानता है” (2 पतरस 2:9)। और प्रलोभन पर विजय पाने के लिए सबसे अधिक तैयार ख्रीष्टीय वह है जो प्रार्थना करता है और इसके विरुद्ध योजनाएं बनाता है। 

परमेश्वर द्वारा परीक्षा में बने रहना
अपने उन विशिष्ट निरन्तर होने वाले पापों के विरुद्ध प्रार्थना करें, और जब आप प्रार्थना करें, तो एक और कदम आगे बढ़ें और विशिष्ट प्रलोभनओं के विरुद्ध भी प्रार्थना करें।

“यह अनुग्रह केवल पाप से बचाए जाने के लिए ही नहीं है परन्तु प्रलोभन से भी बचाए जाने के लिए है”

जब हम प्रलोभन के विरुद्ध प्रार्थना करते हैं, तो हम दो परिणामों की अपेक्षा कर सकते हैं, (1) वास्तविक और स्पर्शनीय रीति से, परमेश्वर हमें उन प्रलोभनों से दूर रखने में प्रसन्न होगा जिनका सामना अन्यथा हमने किया होता यदि हमने प्रार्थना नहीं किया होता। और (2) और कभी-कभी परमेश्वर हमें उसी प्रलोभन का सामना करने के योग्य देख सकता है, जिसके विरुद्ध हमने प्रार्थना की है (और योजना बनाई है!) — और जब हम ऐसा करते हैं तो, प्रार्थना करने के पश्चात, हम इसका सामना करने के लिए और उत्तम रीति से तैयार होंगे उसको आत्मा की सामर्थ्य में होकर के पराजित करेंगे।  

परमेश्वर एक मार्ग का उपाय करेगा (1 कुरिन्थियों 10:13)। इसके लिए तत्पर रहें और इसे अपना लें। और उसको धन्यवाद दें, केवल अनेक बार ही नहीं, बिना आपके यह जाने, कि उसने आपको प्रलोभन से पूर्ण रूप से बचाया है, परन्तु उस समय के लिए भी जब उसने आपकी प्रार्थनाओं का उत्तर भिन्न रीति से दिया है, केवल आपको प्रलोभनओं से  बचाए रखने के लिए ही नहीं परन्तु आपको प्रलोभन के मध्य  बनाए रखने के लिए भी। 

डेविड मैथिस desiringGod.org के कार्यकारी संपादक हैं और मिनियापोलिस/सेंट में सिटीज चर्च में पासबान हैं।
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