कलीसिया परमेश्वर के लोग हैं

अधिकांश लोग प्रायः जब भी कलीसिया के विषय में विचार करते हैं कि तो वे यह विचार करते हैं कि कलीसिया एक भवन है, कलीसिया एक स्थान है। परन्तु बाइबल के अनुसार कलीसिया कोई स्थान नहीं है, परन्तु उद्धार पाए विश्वासियों का समूह है, अर्थात परमेश्वर के लोग हैं। कलीसिया शृंखला के पहले लेख में आपने सीखा कि कलीसिया क्या है और क्या नहीं है इसी विषय पर हम आगे बढ़ते हुए आज के लेख में हम यह सीखेंगे कि कलीसिया क्या है। इस विषय के अन्तर्गत हम सीखेंगे कि कलीसिया परमेश्वर के लोग हैं। 

परमेश्वर अपने लोगों के प्रति और अपनी प्रतिज्ञा के प्रति विश्वासयोग्य रहता है।

पुराने नियम में ‘परमेश्वर के लोग’

पुराने नियम में परमेश्वर ने आदम और हव्वा को बनाया और उनसे कहा कि “फूलो – फलो और पृथ्वी में भर जाओ” (उत्पत्ति 1:28), आदम और हव्वा के द्वारा परमेश्वर का उद्देश्य एक प्रजा बनाना था। इसी कारण परमेश्वर ने इब्राहीम से प्रतिज्ञा की कि “मैं तुझे एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और मैं तुझे आशीष दूंगा” (उत्पत्ति 12:2)। परमेश्वर ने इस प्रतिज्ञा को पूरा भी किया। परमेश्वर इस्राएल से कहता है कि, “मैं तुमको अपनी प्रजा बनाने के लिए अपना लूंगा, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरुंगा” (निर्गमन 6:7)। परमेश्वर इस्राएलियों को मिस्र के दासत्व से छुड़ाता है ताकि वे लोग परमेश्वर के नाम में एकत्रित होकर उसकी आराधना करें और उसके वचन के अनुसार जीवन व्यतीत करें। परन्तु सम्पूर्ण पुराने नियम में देखते हैं कि इस्राएली बार-बार परमेश्वर के लिए जीने में असफल हुए। फिर भी परमेश्वर अपने लोगों के प्रति और अपनी प्रतिज्ञा के प्रति विश्वासयोग्य रहता है। परमेश्वर के लोग होने का पूर्तिकरण सम्पूर्णता के साथ यीशु ख्रीष्ट में होकर देखते हैं क्योंकि प्रेरित पतरस हमें बताता है कि ख्रीष्ट में विश्वासी लोग “चुना हुआ वंश, राजकीय याजकों का समाज, एक पवित्र प्रजा, और परमेश्वर की निज सम्पत्ति हैं” (1 पतरस 2:9)। 

नये नियम में ‘परमेश्वर के लोग’ अर्थात् कलीसिया

“कलीसिया” शब्द यूनानी भाषा के एक्लेसिया (ekklesia) शब्द से आता है जिसका भावार्थ “एकत्रित किए हुए लोग” या “बुलाए गए लोग” है। पौलुस रोमियों 16:5 में कहता है कि “उस कलीसिया को भी नमस्कार जो उनके घर में है”, इसका अर्थ यह है कि पौलुस उनके घर में एकत्रित होने वाले लोगों को कलीसिया कहता है न कि उस स्थान को जहां पर वे एकत्रित होते हैं। इसलिए कलीसिया परमेश्वर के लोग हैं। परमेश्वर यीशु ख्रीष्ट के द्वारा अकेले व्यक्ति को ही नहीं बचाता परन्तु वह लोगों को अर्थात् बहुत से लोगों को भी बचाता है।

कलीसिया ख्रीष्ट की देह है। कलीसिया को ख्रीष्ट ने अपने लहू से मोल लिया है। अब हम परमेश्वर तथा परमेश्वर के लोगों के हैं। इफिसियों 1:22-23 कहता है कि, “उसने [परमेश्वर] सब कुछ उसके [ख्रीष्ट] पैरों तले कर दिया और उसे सब वस्तुओं पर शिरोमणि ठहराकर कलीसिया को दिया, जो उसकी देह है, और उसकी परिपूर्णता है जो सब कुछ पूर्ण करता है।”  

परमेश्वर यीशु ख्रीष्ट के द्वारा अकेले व्यक्ति को ही नहीं बचाता परन्तु वह लोगों को अर्थात् बहुत से लोगों को भी बचाता है।

इफिसियों 2:11-12 में हमारी पुरानी स्थिति को बताते इस प्रकार कहता है, “हम शारीरिक रीति से अन्यजाति… और ख़तना रहित थे, ख्रीष्ट से अलग और इस्राएल की प्रजा कहलाए जाने से वंचित थे, प्रतिज्ञा की वाचाओं के भागीदार न थे तथा आशाहीन तथा संसार में परमेश्वर रहित थे।” हम परमेश्वर के लोग नहीं थे परन्तु यीशु ख्रीष्ट के लहू के द्वारा हम परमेश्वर के समीप लाए गए हैं। क्योंकि यीशु ख्रीष्ट ने उस दीवार को जो हमारे और परमेश्वर के बीच थी उसको गिरा दिया, इस कारण अब हम यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास करने के द्वारा परमेश्वर के पिता के पास जा सकते हैं। पौलुस पद 19 में कहता है कि अब हम जो यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास करते हैं, विदेशी और अजनबी नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोग  के संगी स्वदेशी और परमेश्वर के कुटुम्ब के बन गए हैं। यह विचार इस बात की ओर संकेत करती है कि जब हम ख्रीष्ट पर विश्वास करते हैं तो न केवल हमारा मेल परमेश्वर से होता है परन्तु हम उसके लोगों के संगति में भी बुलाए जाते हैं। 

अत: एक ख्रीष्टीय होने के कारण हमें अपने आप को अकेले व्यक्ति के समान नहीं देखना चाहिए परन्तु हमें परमेश्वर के लोगों के संगी और परमेश्वर के घराने के सदस्य के रूप में देखना चाहिए। यद्यपि हमारा उद्धार व्यक्तिगत रीति से होता है परन्तु हम अपने जीवन को परमेश्वर के लोगों के मध्य में जीते हैं। कलीसिया जो परमेश्वर का घराना है, हम उस घराने के सदस्य हैं। इसलिए अब हम यह नहीं कह सकते हैं कि हमारा जीवन व्यक्तिगत जीवन है और कलीसिया में कोई भी हमारे जीवन में हस्तक्षेप न करे। इसके स्थान पर हमें यह सोचना चाहिए हम स्थानीय कलीसिया में हम एक दूसरे के प्रति उत्तरदायी हैं। इसलिए हमें अपने जीवनों को एक दूसरे के प्रति खुली पुस्तक के समान रखना चाहिए। ताकि कोई भी हमसे हमारे जीवन के विषय में पूछ सके, हमें आत्मिक जीवन में बढ़ने के लिए उत्साहित कर सके और पाप में हमें चेतावनी दे सके। 

ख्रीष्ट में परमेश्वर के लोग होने का अर्थ यह भी है कि हमारी पहचान संसार से नहीं परन्तु परमेश्वर से है, क्योंकि परमेश्वर ने हमें ख्रीष्ट के द्वारा बचाया है। इस कारण हमारा उत्तरदायित्व यह है कि हमें अपने जीवन को संसार से पृथक व्यतीत करना है। इस सन्दर्भ में, हमें चाहिए कि हम परमेश्वर के अधीन जीवन जीएं। पवित्रता का पीछा करें और परमेश्वर के गुणों को अपने जीवन से प्रदर्शित करें। इसी के द्वारा हम जाने जाएंगे कि हम संसार से पृथक हैं। अब हमारा ख्रीष्टीय जीवन व्यक्तिगत नहीं है परन्तु स्वयं के जीवन को स्थानीय कलीसिया में अन्य ख्रीष्टीय भाई-बहनों के लिए समर्पित है। इसलिए उनकी देखभाल करना है, उनकी आत्मिक चिन्ता करना है, एक दूसरे के भार को उठाना है और एक दूसरे के साथ आनन्द मनाना है ( रोमियों 12:15, 1 कुरिन्थियों 12:26)