कलीसियाई अनुशासन क्या है?

कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति जो कलीसिया का सदस्य है और नियमित कलीसियाई सभाओं में सहभागी होता है। और उसका व्यवहार कलीसिया में सबके साथ बहुत अच्छा है। किन्तु आपकी कलीसिया को पता चलता है कि वह अपने कार्यक्षेत्र में बिना घूस लिए किसी का काम नहीं करता है। ऐसी परिस्थिति में आपकी कलीसिया क्या करेगी जो संसार में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हुए उसकी महिमा करना चाहती है। परमेश्वर का वचन हमें ऐसे व्यक्ति का कलीसियाई अनुशासन करने के लिए कहता है। परन्तु कलीसियाई अनुशासन क्या है? इसका उद्देश्य क्या है? कलीसियाई अनुशासन की प्रक्रिया से क्या लाभ होता है? यह लेख इन्हीं प्रश्नो का संक्षिप्त उत्तर प्रस्तुत करेगा।

कलीसियाई अनुशासन की प्रक्रिया चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक दोनों का लक्ष्य भटके हुए पापी को फेर लाना अर्थात पुनःस्थापित करना होता है।

यह कलीसिया का एक कार्य है
तुम हमारे प्रभु यीशु के नाम में एकत्रित होते हो, और आत्मा में मैं भी तुम्हारे साथ तो… तुम ऐसे कुकर्मी को अपने बीच में से निकाल दो  (1कुरिन्थियों 5:4, 13)।

सबसे पहले, कलीसियाई अनुशासन (जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है) कलीसिया का एक कार्य है जिसके अन्तर्गत मण्डली के किसी सदस्य के जीवन में पाए जाने वाले पापों को सुधारने के लिए इस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। अनुशासन की यह प्रक्रिया ऐसे पापों के लिए की जाती है जो स्पष्ट और बाहरी हों तथा जिन पापों से पश्चाताप न किया गया हो। कलीसियाई अनुशासन का यह कार्य सबसे पहले व्यक्तिगत तथा अनौपचारिक रीति से आरम्भ होता है। किन्तु जब बात व्यक्तिगत रीति से नहीं सुलझती है तब इसे सामूहिक तथा औपचारिक रीति से कलीसिया के सामने प्रस्तुत किया जाता है। 

प्रभु यीशु ख्रीष्ट मत्ती 18 में बताते हैं कि “यदि तेरा भाई पाप करे तो पहले उसे अकेले में समझा और यदि वह तेरी सुन ले तो तूने उसे पा लिया। परन्तु यदि वह तेरी न सुने तो अपने साथ दो या तीन व्यक्ति ले जा… यदि वह उनकी भी न सुने तो कलीसिया से कह और यदि वह कलीसिया की भी न सुने तो वह तेरे लिए अन्यजाति और कर वसूल करने वाले के समान ठहरे” (मत्ती 18:15-17)। यह खण्ड हमें दिखाता है कि कलीसियाई अनुशासन सबसे पहले व्यक्तिगत और अनौपचारिक रीति से आरम्भ होता है जो बाद में सामूहिक और औपचारिक भी हो सकता है। 

यह पापी के प्रति प्रेम का प्रदर्शन है
खुली डांट, गुप्त प्रेम से उत्तम है। मित्र के हाथ से लगे घाव विश्वासयोग्य होते हैं, परन्तु शत्रु अधिक चुम्बन करता है  (नीतिवचन 27:5-6)

कलीसियाई अनुशासन की प्रक्रिया चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक दोनों का लक्ष्य भटके हुए पापी को फेर लाना अर्थात पुनःस्थापित करना होता है। जब कोई ख्रीष्टीय ख्रीष्ट से बढ़कर पाप से प्रेम करता तथा पाप के जाल में फंस जाता है, तब उसको इस संकट से बचाने के लिए कलीसियाई अनुशासन करने की आवश्यकता पड़ती है। इस अनुशासन का उद्देश्य प्राथमिक रीति से व्यक्ति के पापों को उजागर करके उसको अनन्त दण्ड हेतु दोषी ठहराने से बढ़कर उसको अनन्त विनाश से बचाना होता है। यह एक प्रकार से भटके हुए पापी व्यक्ति पर दया दिखाना है, ताकि वह पापों से पश्चात्ताप करके पवित्रता के मार्ग पर चल सके (1कुरिन्थियों 5:5)। कलीसियाई अनुशासन का लक्ष्य व्यक्ति को सदा के लिए कलीसिया अर्थात परमेश्वर के परिवार से बाहर निकालना नहीं, किन्तु उसको पुनःस्थापित करना है (गलातियों 6:1)। अनुशासन की यह प्रक्रिया मित्र के हाथों से लगे घाव के समान विश्वासयोग्य तथा उस पिता की ताड़ना के समान है जो बच्चे से प्रेम करता है (इब्रानियों 12:6)। ऐसा अनुशासन  बुद्धिमान मनुष्य के लिए प्रेम और दया का प्रदर्शन है।

यह कलीसिया को स्वस्थ रखने की विधि है 
जो कोई शिक्षा से प्रीति रखता है, वह ज्ञान से प्रेम रखता है, परन्तु जो ताड़ना से घृणा करता है, वह तो निर्बुद्धि पशु तुल्य है  (नीतिवचन 12:1)।

कलीसियाई अनुशासन की प्रक्रिया कलीसिया में सभी सदस्यों के सामने की जाती है, जो सम्पूर्ण कलीसिया को पापों के प्रति चिताती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कलीसियाई परिवार के सदस्यों को अन्य सदस्यों के विषय में पता चले तथा अन्य लोग भी पाप करने से डरें (1 तीमुथियुस 5:20)। जब किसी व्यक्ति का अनुशासन किया जाता है तब कलीसिया पाप की गम्भीरता एवं खतरे को देखने पाती है। इससे कलीसिया की गैर-ख्रीष्टीय समुदाय में उत्तम साक्षी प्रकट होती है। जो कलीसिया को परमेश्वर की महिमा के लिए जीवन जीने हेतु चेतावनी देती है। एक स्वस्थ कलीसिया कभी भी पाप को अनदेखा नहीं करती है, किन्तु वह परमेश्वर की पवित्रता में दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है।