कोरोना की महामारी बनाम पाप की महामारी

आज हमारे देश में ऐसा कोई नहीं है जो कोरोना वायरस की महामारी को लेकर चिन्तित न हो। सब के पास बात करने के लिए एक सामान्य विषय है। और हो भी क्यों न, जबकि इस महामारी ने पूरे संसार और विशेष रीति से हमारे राष्ट्र को इस कोरोना की दूसरी लहर ने हिला दिया है। दूसरा कारण यह भी है जिसके कारण से सभी लोग इसके बारे में बात कर रहे हैं वह यह है कि यह बीमारी प्रत्यक्ष है और लोगों के ऊपर इस बीमारी का परिणाम स्पष्ट है। वर्तमान स्थिति में हमारे देश की स्थिति बहुत ही दयनीय है। हम सब इसको देख कर शोकित हैं, परन्तु इन बातों को और भी अधिक हमारे ध्यान को एक और बहुत बड़ी, जटिल, भयानक, कभी न समाप्त होने वाली बीमारी की ओर लेकर जाना चाहिए है। इस बीमारी का कोई उपचार नहीं है, इसको कोई रोक नहीं सकता और इसका परिणाम अनन्तकाल का है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस पर बात करना उचित है, क्योंकि इस बीमारी के चित्रण में हम इसको और अधिक समझने का प्रयास कर सकते हैं। 

दृश्य बीमारी और अदृश्य बीमारी
कोरोना वायरस की बीमारी दृश्य बीमारी है। हम हर दिन समाचारों में पाते हैं कि या तो संक्रमण बढ़ रहा है या फिर घट रहा है। हम इसका आंकड़ा लगा सकते हैं और समझ सकते हैं कि यह महामारी फैल रही हैं। साथ ही साथ इस महामारी के कई सारे लक्षण हैं। ज्वर, खासी, सांस लेने में समस्या, शरीर में दर्द, स्वाद और सूंघने की क्षमता को खोना, यहाँ तक की मृत्यु। क्योंकि लोग इस बीमारी से ग्रसित और यह दिख रहा है कि यह बीमारी भयानक है लोग इसको गम्भीरता से लेते हैं।

दूसरी ओर पाप एक अदृश्य बीमारी है। इस बीमारी के बारे में हम लोग सम्भवतः बहुत ही कम बात करते हैं। इस बीमारी में हमारा हृदय जो की बाहर से नहीं दिखता है पूरी तरह से दूषित है। इस बीमारी के लक्षण बहुत ही गम्भीर और जीवन नाश करने वाले हैं। इसी कारण हमारे मन से “कुविचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन, और दुष्टता के काम तथा छल, कामुकता, ईर्ष्या, निन्दा, अहंकार और मूर्खता निकलती है” (मरकुस 7:21-22)। यह सूची हमारे प्रभु ख्रीष्ट ने स्वयं दी है। क्योंकि यह अदृश्य है और वर्तमान में हमें इसका प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं दिखाता है, इसलिए हम इसको गम्भीरता से नहीं लेते हैं।      

कोरोना वायरस की महामारी से हमारी शारीरिक मृत्यु हो सकती है, परन्तु पाप की महामारी से हमारी आत्मिक मृत्यु होती है।  

संक्रमण
हम जानते हैं कि लोग कोरोना से बहुत ही तेजी के साथ संक्रमित हो रहे हैं और उसको रोकने के लिए सरकार और स्वयं लोग विभिन्न प्रकार की सावधानियों को रख रहे हैं। यह बीमारी एक से दूसरे को फैल रही है, इसलिए लोग मास्क पहनते हैं सैनिटाईज़र का उपयोग करते हैं और उचित दूरी बनाकर रखते हैं।  

परन्तु पाप का संक्रमण तो प्रत्येक व्यक्ति में है। रोमियों 3:23 में लिखा हैं, “सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।” ऐसा कोई भी नहीं इस पृथ्वी पर जो इस बीमारी से संक्रमित न हो। उत्पत्ति 6:5 में लिखा है कि, “तब यहोवा ने देखा कि पृथ्वी पर मनुष्य की दुष्टता बहुत बढ़ गई है, और उसके मन का प्रत्येक विचार निरन्तर बुरा ही है।” पाप की बीमारी का संक्रमण तो माता के गर्भ से ही लोगों में होता है (भजन 51:5)। और मनुष्य इस बात का दावा नहीं कर सकता है कि उनमें पाप नहीं है, क्योंकि परमेश्वर का वचन 1 यूहन्ना 1:8 में कहता है, “यदि हम कहें कि हम में पाप नहीं, तो अपने आप को धोखा देते हैं, और हम में सत्य नहीं है।” इससे बचने का उपाय निश्चित रूप से भले कार्य नहीं है। हम चाहे जितनी भी सावधानी कर लें परन्तु हम तो अन्तःकरण से संक्रमित हैं। कई बार कोरोना के संक्रमण की जाँच त्रुटिपूर्ण आ सकती है, परन्तु इस पाप की महामारी की जाँच कभी भी त्रुटिपूर्ण नहीं होगी।

उपचार और अ-उपचार
सबसे पहले कोरोना वायरस वूहान, चीन में सन् 2019 में पाया गया था। तब से लेकर अब तक विभिन्न देशों के वैज्ञानिक इसका पूर्ण उपचार ढूंढने में लगे हुए हैं। कुछ स्तर तक इसके उपचार की खोज की गई और लोग स्वस्थ भी हुए हैं। हमारे देश में इसकी वैक्सीन लगाई जा रही है जो कि अच्छी बात है। कोरोना की महामारी से बचने के लिए विभिन्न प्रकार की सावधानियाँ और वैक्सीन सम्भवतः सफलता दे सकती है। लोगों ने मान लिया है कि थोड़ी सी मेहनत और सावधानी के भरोसे हम कोरोना से लड़ाई में विजयी होंगे और सम्भावना है कि ऐसा हो भी सकता है।

परन्तु हम जब पाप की महामारी के बारे में बात करते हैं तो इसका ऐसा कोई भी उपाय नहीं है जो मनुष्य के पास हो। यह बीमारी हमारे भीतर है, जन्म से और  हम सभी इससे ग्रसित हैं परन्तु इसका उपचार किसी के पास नहीं है। हम सोच सकते हैं कि हम अपनी इच्छा शक्ति से और मन को नियंत्रित करने से इस बीमारी पर विजय प्राप्त कर सकते हैं परन्तु यह तो असत्य है। परमेश्वर का वचन हमें यिर्मयाह 17:9 में बताता है कि, “मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखेबाज होता है, और असाध्य रोग से ग्रसित है; उसे कौन समझ सकता है।” हम अपने अच्छे कार्य, हम अपनी मेहनत के कार्य और हम अपनी इच्छा शक्ति से स्वयं को नहीं बचा सकते हैं क्योंकि, “… हमारे धर्म के काम मैले चिथड़ों के समान हैं” (यशायाह 64:6)। यह है हमारी वास्तविकता। हम तो पापों और अपराधों में मरे हुए थे और परमेश्वर के प्रकोप के अधीन थे (इफिसियों 2:1-3)। एक आत्मिक रूप से मरा हुआ व्यक्ति स्वयं को स्वस्थ नहीं कर सकता है।  

कोरोना के परिणाम और पाप के परिणाम
इन दोनों महामारी के परिणामों में भी बहुत ही भिन्नता है। कोरोना वायरस शरीर में विभिन्न प्रकार की अस्वस्थता और समस्याओं को लेकर आता है। जब यह अस्वस्थताएं बहुत अधिक बढ़ जाती हैं तो शारीरिक मृत्यु तक ले जाती हैं। कोरोना वायरस का अन्त यहाँ पर इस जीवन के साथ हो जाता है। शरीर मिट्टी में मिल जाता है और हम सोचते हैं कि मरने वाले व्यक्ति को इस संसार की बीमारी और पीड़ा से मुक्ति मिल गई है।

परन्तु वास्तविकता यह है कि पाप के कारण ही बीमारियों ने और मृत्यु ने इस संसार में प्रवेश किया। रोमियों 5:12, “… जिस प्रकार एक मनुष्य के द्वारा पाप ने जगत में प्रवेश किया, तथा पाप के द्वार मृत्यु आई, उसी प्रकार मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया।” कोरोना वायरस की बीमारी का परिणाम तो केवल इस पृथ्वी तक सीमित है परन्तु पाप के कारण जिस मृत्यु ने प्रवेश किया वह न केवल शारीरिक परन्तु आत्मिक भी है। इस मृत्यु के कारण हम परमेश्वर से सदा के लिए दूर हो जाएंगे और उसके भयानक और भयावह प्रकोप के अधीन होंगे। प्रकाशितवाक्य 20:12-15 में लिखा है कि, “तब मैंने छोटे बड़े सब मृतकों को सिंहासन के समझ खड़े हुए देखा और पुस्तक खोली गई, तथा एक और पुस्तक खोली गई जो जीवन की पुस्तक है, और उन पुस्तकों में लिखी हुई बातों के आधार पर सब मृतकों का न्याय उनके कामों के अनुसार किया गया। … मृत्यु और अधोलोक आग की झील में डाले गए। यह आग की झील दूसरी मृत्यु है। जिस किसी का नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ न मिला, वह आग की झील में फेंक दिया गया।” कोरोना वायरस की महामारी से हमारी शारीरिक मृत्यु हो सकती है, परन्तु पाप की महामारी से हमारी आत्मिक मृत्यु होती है।    

पाप की महामारी का उपचार
जब हम महामारी जैसी बड़ी बीमारी की बात करते हैं तो हम सोचते है कि इस का उपचार बहुत ही कठिन होगा जो साधारण नहीं हो सकता है। परन्तु जब हम पाप की महामारी से छुटकारे की बात करते हैं तो इसके उपचार की योजना को त्रिएक परमेश्वर ने आदि में ही बना लिया था। यह योजना मनुष्य की कल्पना और समझ से परे हैं। लोग इस योजना को मूर्खता समझा (1 कुरिन्थियों 1:18)। परन्तु वही जो पापी और सीमित मनुष्यों के लिए मूर्खता थी उनके उद्धार का चिन्ह बन गया।  परमेश्वर ने क्रूस पर यीशु की मृत्यु के द्वारा हमारे लिए पाप की महामारी से बचने का उपाय किया। उसने अपने पुत्र को इस संसार में भेज दिया कि वह जगत के पापों को उठाने वाला मेमना बन जाए (यूहन्ना 1:29) और हमारे सारे अपराधों को क्षमा कर दे। हमारे भीतर जो पाप की बीमारी थी, जो सड़ाहट थी उसको परमेश्वर ने हटा दिया। उसने हमारे अन्दर से पत्थर के हृदय को निकाल कर मास के हृदय को डाला, उसने अपनी वाचा को हमारे हृदयों पर लिखा और हमारे सारे अधर्म को क्षमा किया (यिर्मयाह 31:33-34)। यीशु मसीह की क्रूस पर हमारे लिए मृत्यु और जी उठना हमें पाप के बन्धन से स्वतंत्र करता है। अब हम जो उस पर विश्वास करते है हमारे पास अनन्त जीवन की आशा है जो इस पृथ्वी पर मृत्यु के बाद का जीवन है। यह हमारे कार्यों के कारण नहीं हुआ है जिसके कारण हम घमण्ड करें (इफिसियों 2:9) इसलिए परमेश्वर ही हमारी पाप की महामारी का उपचार है।