परमेश्वर आपके संकट में उत्तर देगा

आपके संकट का समय आने वाला है। यदि वह अभी तक नहीं आया है, या यदि अभी आप किसी भी  संकट के बीच में नहीं हैं, तो आपका समय आएगा।

और केवल एक ही संकट नहीं। उसकी अपार दया में, परमेश्वर इस पतित युग में हमारे जीवनों में अलग-अलग स्तरों के संकट के क्षणों को आने देता है, जो हमारे अनन्त भलाई के लिए बनाए गए हैं। हज़ारों वर्षों से, परमेश्वर के लोगों ने “विपत्ति के समयों को” और “क्लेश के दिनों” को जाना है, कभी-कभी तो बहुत अधिक रीति से। और ऐसा आज भी हो रहा है। हमारे पिता ने कभी यह प्रतिज्ञा नहीं किया था कि हम उसके हैं इसका अर्थ यह होगा कि हमारे जीवन में कोई संकट नहीं होगा । 

बारम्बार, पवित्रशास्त्र विश्वासयोग्य लोगों का वर्णन ऐसे लोगों के समान नहीं करता है जिन्होंने कभी कष्ट को नहीं देखा, किन्तु ऐसे लोगों के समान जो अपने संकटों में परमेश्वर को पुकारते हैं। जिन पुरुषों और स्त्रियों को हम आदर्श के रूप में स्मरण करते हैं, उन्होंने बड़े विपत्ति के समयों और संकट के दिनों का सामना किया था। और सहायता के लिए परमेश्वर ने उनकी पुकार को सुना था। वह अपने लोगों की दुहाई के प्रति   चाहे वह जितनी ही उँची हो या धीमी हो विशेष रीति से संकट के समय में — न ही उस समय बहरा था और न ही वह आज है। 

विपत्ति और संकट में
हमारा परमेश्वर ऐसा परमेश्वर नहीं है जो केवल बोलता है — यद्धपि यह उल्लेखनीय बात अवश्य है — किन्तु यह भी अत्यन्त ही अचम्भे की बात है, कि परमेश्वर सुनता भी है। जब याकूब हमें “सुनने के लिए तत्पर” होने के लिए बुलाता है (याकूब 1:19), तो वह हमें हमारे स्वर्गीय पिता की नाई बनने के लिए बुलाता है। हमारे पास ऐसा पिता है “जो प्रार्थनाओं को सुनता है” (भजन 65:2), जो हमारी विनतियों की पुकार पर ध्यान देता है (भजन 66:19)। हमारा परमेश्वर न केवल सभी लोगों को देखता है, परन्तु वह अपने लोगों को विशेष रीति से देखता है, उन लोगों के नाई जिनके साथ प्रेम में उसने स्वयं को वाचा में बांधा है। वह अपने लोगों की एक पति और एक पिता के समान कान लगा कर सुनता है। वह हमारी याचिकाओं से व्यथित और क्रोधित नहीं होता है — विशेष रीति से विपत्ति और संकट के समय में। 

भजन संहिता “संकट के दिन” और “विपत्ति के समय” में अपने लोगों की सुनने और उनकी सहायता करने के प्रति परमेश्वर की तत्परता का विशेष रीति से उत्सव मनाते हैं। दाऊद ने साक्षी दी कि परमेश्वर उसके लिए “दृढ़ गढ़ और संकट के समय में मेरा शरणस्थान है” (भजन 59:16, साथ ही 9:9; 37:39; 41:1)। वह जानता था कि जब संकट आएगा तो किसके पास जाना है: “मैं अपने संकट के दिन तुझे पुकारूंगा, क्योंकि तू मुझे उत्तर देगा” (भजन 86:7)। “विपत्ति के दिन तो वह मुझे अपने मण्डप में छिपा लेगा” (भजन 27:5)। और दाऊद जानता था कि दूसरों को किसकी ओर इंगित करना है। “संकट के दिन यहोवा तेरी सुन ले!” (भजन 20:1)। यहोवा पिसे हुओं का दृढ़ गढ़ भी ठहरेगा, हां, संकट के समय, दृढ़ गढ़ (भजन 9:9 )। 

और केवल दाऊद ही नहीं, परन्तु भजनकार आसाफ भी: “संकट के दिन मैंने प्रभु की खोज की” (भजन 77:2)। परमेश्वर स्वयं कहता है, “संकट के दिन मुझे पुकार; मैं तुझे छुड़ाऊंगा, और तू मेरी महिमा करेगा (भजन 50:15)। सहायता हेतु हमारी पुकारों से क्षुब्ध होने के विपरीत, जब हम अपने बोझ के साथ उसकी ओर मुड़ते हैं तो परमेश्वर सम्मानित होता है। सम्भवतः सबसे आकर्षक दोहराई गई पंक्ति भजन 107 में है (चार बार): “तब उन्होंने संकट में यहोवा की दुहाई दी, और उसने उन्हें विपत्ति में से छुड़ाया” (भजन 107:6, 13, 19, 28 )। यह केवल इस्राएल की ही कहानी नहीं है जिसे बार बार दोहराया गया है, परन्तु यह हमारी भी कहानी है। 

हमारा परमेश्वर हमारे संकटों के मध्य में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है। 

देखो हमारा परमेश्वर 
यह वही है हमारा परमेश्वर जो आरम्भ से रहा है। यह इब्राहीम और इसहाक का परमेश्वर है। और यह वही परमेश्वर है जिसे याकूब ने अपने अनेक उतार-चढ़ावों में, अपने अनेक प्रयत्नों और संघर्षों में ऐसा पाया: “परमेश्वर, जिसने संकट के दिन मुझे उत्तर दिया” (उत्पत्ति 35: 3)।

याकूब का परमेश्वर आसपास के देशों के झूठे देवताओं के समान नहीं है। वह याकूब के मामा, लाबान के गृह देवताओं के समान नहीं है (उत्पत्ति 31:19, 34-35)। और न उन कनानी देवताओं के समान है जिन्हें याकूब के पुत्रों ने शकेम को लूटते समय पाया था (उत्पत्ति 34:29; 35: 2)। अन्य “देवता” संकट के दिन में उत्तर नहीं देते हैं। वे तो बस मानवीय हाथों और कल्पना द्वारा बनाए गए हैं। वे बच्चों के खिलौने हैं। वे उत्तर नहीं देते हैं। वे कार्य नहीं करते हैं। 

याकूब का जीवन निरन्तर संकट के झणों से घिरा हुआ था, और परमेश्वर ने स्वयं को सुनने और उत्तर देने वाले परमेश्वर के रूप में विश्वासयोग्य प्रमाणित किया। जिस प्रकार परमेश्वर ने लिआ को उसके संकट के समय में देखा था (उत्पत्ति 29:31) और परमेश्वर ने राहेल के संकट में उसको स्मरण किया था (उत्पत्ति 30:22), उसी प्रकार वह देखता है, वह सुनता है, वह स्मरण करता है, और वह देखभाल करता है। वह जीवित परमेश्वर है जो चाहता है कि हम अपने संकट के समय में उसकी ओर मुड़ें, तथा उसके साथ संघर्ष करें (उत्पत्ति 32:22-28), न केवल कि हम अपनी परिस्थितियों से ही संघर्ष करें। यह है याकूब का परमेश्वर — और नहूम का (नहूम 1:7), ओबद्याह (ओबद्याह 12, 14), यिर्मयाह (यिर्मयाह 16:19), और हिजकिय्याह (यशायाह 37:3) का परमेश्वर। 

उसका सिद्ध कैसे  और कब 
हमारी सीमितता और पतन में, हमें कभी-कभी ऐसा प्रतीत हो सकता है कि परमेश्वर हमारे संकट के क्षणों में स्वयं को छिपा रहा है (भजन 10:1)। परन्तु यदि हम उसके सम्मुख दीनता से आते हैं, और अपने मनों में पाप को संजोए नहीं रखते हैं (भजन 66:18; साथ ही 1 पतरस 3:7), तो हम अपेक्षा कर सकते हैं कि “परमेश्वर ने अवश्य सुना है; उसने मेरी प्रार्थना पर ध्यान दिया है” (भजन 66:19)। और फिर भी परमेश्वर हमारी सुनता है का अर्थ यह नहीं है कि वह सदैव — या यहाँ तक कि समान्यतः — कैसे  और कब  हमें हमारी आशा या इच्छा के अनुसार उत्तर देता है। 

जब हम अपने परमेश्वर को उस रीति से स्मरण करते हैं जो कि हमारे संकट के समय में हमें उत्तर देता है — जैसा कि उसने याकूब और भजनकारों तथा नबियों के लिये किया था — तो हम यह मानकर नहीं चलते हैं कि वह वैसे ही उत्तर देगा जैसा  कि हम उसे करते या ठीक उसी समय जब  हम उसे चाहते। याकूब ने पहले तो लाबान के अत्याचार के अधीन बीस वर्ष बिताए, और फिर उसके पुत्र यूसुफ ने तेरह वर्ष नीचे, नीचे और नीचे किये जाने में व्यतीत किया — वह दासत्व में बेचा गया, उस पर झूठा आरोप लगाया गया, बंदीगृह में डाला गया, फिर भुला दिया गया — इससे पहले कि परमेश्वर ने उसे ऊपर उठाया। हमारा परमेश्वर अपने “उचित समय” (1 पतरस 5: 6) पर, अपनी “नियत अवधि” में कार्य करता है (गलतियों 6: 9)। 

वास्तव में वह हमारी सुनेगा और उत्तर भी देगा — परन्तु प्राय: ऐसे ढंग से, और ऐसे समय में,  जिसका कि हम अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं। उसके मार्ग और विचार हम से बढ़कर हैं (यशायाह 55: 8-9), और वह “कल्पना से कहीं अधिक बढ़कर कार्य करता है” परन्तु हमारी विनती या विचारों से कम नहीं (इफिसियों 3:20)। ख्रीष्ट में, हम यह पहले से ही नहीं मान लेते हैं कि हमारा परमेश्वर हमें नहीं देख रहा है, या हमारी नहीं सुन रहा है, या उत्तर नहीं दे रहा है क्योंकि हमारे जीवन हमारी योजनाओं के अनुसार प्रकट नहीं हो रहे हैं। यह मानने के कहीं विपरीत कि वह उत्तर नहीं दे रहा है, हम तो उसकी अत्यन्त दया प्राप्त करते रहना चाहेंगे जबकि वह आश्चर्यजनक रीति से इतिहास और हमारे जीवन को प्रकट करता रहता है, जो कि मानवीय अपेक्षाओं के अनुसार नहीं, किन्तु उसकी असीम रीति से प्रतापी योजनाओं और उद्देश्यों के अनुसार है। जिसको कि हम बहुत ही स्पष्ट रीति से परमेश्वर के अपने पुत्र के संकट के समय में देखते हैं। 

उसका महानतम उत्तर
“उसने अपने साथ पतरस, याकूब और यूहन्ना को लिया, और बहुत ही व्यथित और व्याकुल होने लगा” (मरकुस 14:33)। वहाँ, संकट के उस बगीचे में, यीशु ने “उस से जो उसको मृत्यु से बचा सकता था उच्च स्वर से पुकारकर और आंसू बहा बहा कर प्रार्थनाएं और विनतियां कीं और आज्ञाकारिता के कारण उसकी सुनी गई” (इब्रानियों 5:7)। परमेश्वर ने अपने पुत्र की उसके संकट के समय में सुनी, किन्तु उसने प्याले को नहीं हटाया। उसने उसे मृत्यु से नहीं बचाया। परमेश्वर के द्वारा यीशु की सुनना और उत्तर देने का अर्थ क्रूस से छुटकारा नहीं था परन्तु क्रूस के द्वारा छुटकारा था।

पिता द्वारा “उसको मृत्यु से बचाने” का अर्थ मृत्यु से सुरक्षा हो सकती थी। परन्तु उसके मार्ग उच्चतम थे। जितना कि हम मांगने या सोचने की क्षमता रखते हैं, उससे कहीं अधिक बढ़कर के उसने किया। इस समय जो छुटकारा परमेश्वर ने अपने पुत्र को दिया था वह मृत्यु से सुरक्षा तो नहीं थी, किन्तु मृत्यु के मध्य में भी सम्भालने वाला अनुग्रह था। फिर उसके पश्चात पुनरुत्थान होता है। और यदि यीशु वापस पहले नहीं आता है, तो हम सब भी शीघ्र ही मृत्यु का सामना करेंगे, और हमारे लिए इसके मध्य में भी परमेश्वर का उत्तर सम्भालने वाला अनुग्रह होगा और फिर उसके दूसरी ओर पुनरुत्थान होगा। 

हमारा परमेश्वर अत्यन्त वास्तविक, तथा अत्यधिक महान है, और हमारी मानवीय अपेक्षाओं और सुविधाजनक समय-सारिणी के अनुसार कार्य करने से कहीं बढ़कर अत्यधिक महिमामय है। वह हमसे इतना अधिक प्रेम करता है, कि वह हमारे संकट के समयों में नियमित रूप से वह कार्य नहीं करेगा जो कि हम चाहते हैं और जब चाहते हैं। परन्तु वह सदैव हमें देखता रहता है। वह सदैव हमारी सुनता है। और ख्रीष्ट में होकर, वह हमें उत्तर देगा, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि उस रीति से जैसे कि हम कब और कैसे चाहते हैं, परन्तु वह हमें वही उत्तर देता है जिसकी हमें आवश्यकता होती है, यद्पि हो सकता है कि यह अभी के लिए कष्टदायक हो, परन्तु वह हमारी अंतिम भलाई और महिमा के लिए है।  

डेविड मैथिस desiringGod.org के कार्यकारी संपादक हैं और मिनियापोलिस/सेंट में सिटीज चर्च में पासबान हैं।
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