पास्टर जॉन से पूछें
पवित्रता में बढ़ने हेतु वास्तविक युद्ध
<a href="" >जॉन पाइपर के साथ साक्षात्कार</a>

संस्थापक और शिक्षक, desiringGod.org

श्रुति लेख (Audio Transcript)

शुद्धतावादी1 (प्यूरिटन Puritans) लोगों ने पवित्रशास्त्र में जिन महान बातों को देखा था, उनमें से एक मुख्य बात थी प्रसन्नता और पवित्रता के बीच पाया जाने वाला सम्बन्ध। उनके लिए, पूर्ण रूप से पवित्र होने का अर्थ, पूर्ण रूप से प्रसन्न होना था। पास्टर जॉन, आप प्रसन्नता और पवित्रता के बीच के इस सम्बन्ध को कैसे व्यक्त करेंगे?

मेरी सोचने की रीति थोड़ी भिन्न है, क्योंकि जितना अधिक मैं ख्रीष्टीय सुखवाद (Hedonism) के विषय में विचार करता हूँ, उतना ही अधिक मैं इस सम्बन्ध को व्यक्त करने में भी सावधान रहता हूँ। प्रसन्नता, पवित्रता का एक भाग  है जिसका अर्थ है कि यदि आपने यह वर्णन करने का प्रयास किया कि एक पवित्र व्यक्ति होने का अर्थ क्या है और यदि आपने परमेश्वर में पायी जाने वाली प्रसन्नता की बात नहीं की, तो आप इसे सही रीति से वर्णन ही नहीं कर पाएँगे। बिना परमेश्वर में प्रसन्नता के, पवित्रता जैसी कोई बात है ही नहीं। क्योंकि पवित्रता का सारतत्व परमेश्वर में पायी जाने वाली प्रसन्नता है।

परमेश्वर की पवित्रता का अर्थ है कि परमेश्वर का प्राणी सर्वोच्च रीति से बहुमूल्य है। और यही उसकी पवित्रता है। परमेश्वर अपने असीम रीति से हर्षपूर्ण होने के गुण में असीम रीति से हर्षित होता है, अन्यथा वह झूठा ठहरेगा तथा वह अधर्मी होगा। इसीलिए उसकी पवित्रता का अर्थ है असीम रूप से हर्षपूर्ण होना और अपने असीम रीति से हर्षपूर्ण होने के गुण में असीम रीति से हर्षित होना।

यदि आप प्रसन्नता के बिना पवित्रता को समझाने का प्रयास करते हैं तो आप असफल होंगे। क्योंकि पवित्रता का सारतत्व ही है परमेश्वर में पायी जाने वाली प्रसन्नता।

हमारी पवित्रता का अर्थ है परमेश्वर को असीम रीति से बहमूल्य एवं उत्कृष्ट रीति से देखना तथा उसका रसास्वादन करना और उसे भरोसा, हर्ष, प्रशंसा और स्तुति के योग्य समझना। हम इस बात पर भरोसा करते हैं। हम इसे संजोते हैं। हम इसे अपनाते हैं। हम इसका आनन्द उठाते हैं। हम इसके द्वारा सन्तुष्ट होते हैं, और हमारा व्यवहार दर्शाता है कि हम यीशु को सब बातों में सर्वाधिक आदर के योग्य समझते हैं। तो जब आप एक बार सब कुछ को इस रीति से समझते हैं, तो फिर शेष सब कुछ इसी से प्रवाहित होता है।

निरन्तर ऊपर की ओर वृद्धि करने वाली पवित्र प्रसन्नता

ख्रीष्टीय जीवन में प्रसन्नता एक निरन्तर ऊपर की ओर वृद्धि करने वाली प्रक्रिया है। मत्ती 5:8 बताता है, “धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।” इसलिए जो कुछ आप परमेश्वर के विषय में देखते हैं उसके कारण आपका प्राण आनन्द से सराबोर हो जाता है। देखने की यह क्रिया आपको उस कार्य को करने में सक्षम करती है जिसे करने के लिए परमेश्वर ने कहा है, जैसे कि अपने शत्रुओं से प्रेम करना। जब आप अपने शत्रु से प्रेम करते हैं तो यह पलटकर आपको ही प्रसन्न करता है।

इसके अतिरिक्त, हमारा विवेक तब प्रसन्न होता है जब आप वह कार्य करते हैं जिसे करने पर आपका विवेक आपको दोषी नहीं ठहराता है। यह रोमियों 14:22 में देखा जाता है जब पौलुस कहता है, “धन्य है वह जो उस बात में जिसे वह ठीक समझता है, अपने आप को दोषी नहीं ठहराता।” 

पवित्रता या शुद्धिकरण में बढ़ने हेतु वास्तविक युद्ध परमेश्वर में सन्तुष्ट होने के लिए युद्ध है।

जब आप दिन-भर परमेश्वर में प्राप्त सन्तुष्टि के आधार पर व्यवहार करने के पश्चात् रात को लेटते हैं, तब आपको एक भिन्न स्तर की प्रसन्नता प्राप्त होती है। प्रसन्नता की इस प्रकार की ऊपर की ओर बढ़ने वाली वृद्धि तब परमेश्वर में आपके आनन्द को बढ़ाती है, और यह आपको और अधिक प्रेम भरे कार्यों को करने लिए स्वतन्त्र करती है और इस प्रकार यह आपको और भी अधिक प्रसन्न करती है।

जब हम कहते हैं कि परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमा तब पाता है जब आप उसमें सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं, तो हमारे कहने का अर्थ यह है कि पवित्रता या शुद्धिकरण में बढ़ने हेतु जो वास्तिवक युद्ध है वह परमेश्वर में सन्तुष्ट होने के लिए युद्ध है। सबसे प्राथमिक लड़ाई उसको अति सुन्दर प्रभु के रूप में देखने और उसका रसास्वादन करने के लिए है। अश्लील चलचित्र, या चोरी, या सराहना पाने की अभिलाषा की जड़ को काट कर पृथक करने का आधारभूत उपाय है, एक श्रेष्ठ सन्तुष्टि की सामर्थ्य हेतु प्रयास करना अर्थात् परमेश्वर में सन्तुष्टि पाना।


टिप्पणी

  1. ‘शुद्धतावादी’ (Puritans) 16वीं और 17वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड के कुछ प्रोटेस्टेन्ट थे, जो इंग्लैण्ड की कलीसिया से रोमन कैथोलिक विधियों को हटाने के द्वारा उसका शुद्धिकरण करना चाहते थे, क्योंकि वे मानते थे कि इंग्लैण्ड की कलीसिया पूर्ण रीति से धर्मसुधारवादी नहीं बनी थी तथा उसे और अधिक प्रोटेस्टेन्ट होने की आवश्यकता थी।

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