कलीसिया क्या नहीं है और क्या है?

कलीसिया के विषय में सही समझ सही कलीसिया का चुनाव करने, वचन पर आधारित कलीसिया की स्थापना करने तथा कलीसिया के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझने में सहायता करेगी। इसलिए कलीसिया के विषय में सही समझ के लिए हमें दो मुख्य बातों पर विचार करना आवश्यक है कि कलीसिया क्या है और क्या नहीं है?

पास्टर मार्क डेवर अपनी पुस्तक “एक स्वस्थ्य कलीसिया क्या है?” के दूसरे पाठ में कलीसिया में कलीसिया के विषय में कहते हैं कि “कलीसिया परमेश्वर के लोग हैं, यह स्थान व सांख्यिकी नहीं है। कलीसिया देह जो ख्रीष्ट के सिर से जुड़ी है। यह एक ऐसा परिवार है लेपालकपन के द्वारा ख्रीष्ट से एक साथ जुड़े हुए हैं।” तो आइए इस विचार को ध्यानपूर्वक देखें कि इसका क्या अभिप्राय है –

कलीसिया क्या नहीं है?
किसी भी बात को समझने के लिए व्याख्याशास्त्र का एक यंत्र यह होता है कि इसका क्या अर्थ है और क्या नहीं? अर्थात् इस बात पर विचार करें कि कलीसिया क्या है और क्या नहीं?  

बाइबल के अनुसार भवन या स्थान कलीसिया नहीं हैं।

कलीसिया स्थान व भवन नहीं है।  लोगों में एक सामान्य विचारधारा यह पाई जाती है कि लखनऊ में फला-फला स्थान पर कलीसिया बनी हैं। तो प्रायः उनका तात्पर्य भवन या ईमारत से होता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि बाइबल के अनुसार भवन या स्थान कलीसिया नहीं हैं। यीशु ख्रीष्ट किसी विशेष स्थान व भवन के लिए नहीं देहधारण किए, मनुष्य बने, सिद्ध जीवन जिया, और क्रूस पर बलिदान हुए और अपने लहू को बहाया, परन्तु वह मानव जाति के लिए मनुष्य देहधारण किए, सिद्ध जीवन जिया और क्रूस पर बलिदान हो गया। अतः यीशु का जीवन व बलिदान लोगों के लिए अर्थात् कलीसिया के लिए था।

कलीसिया कोई संख्या नहीं है: चाहे हम पास्टर हों, चाहे हम कलीसिया के सदस्य हों, हमें इस बात को समझने की आवश्यकता है कि कलीसिया नम्बर का खेल नहीं है। कलीसिया अधिक संख्या में एकत्रित होना नहीं है- जहां पर केवल विशेष लाइट्स और धुएं के साथ उच्च गुणवत्ता के संगीत बजाए जाते हैं और गीत गाए जाते हैं। जहां पर मनोरंजन आत्मिक बना कर प्रस्तुत किया जाता है और लोगों को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया जाता है।

कलीसिया कोई संस्था नहीं है: आज बहुत से लोग कलीसिया के प्रति एक संस्थागत विचारधारा रखते हैं कि कलीसिया एक संस्था है, जिसका कोई निर्देशक होगा, जिसमें बहुत से सहकर्मी लोग कार्य कर रहे होंगे, पास्टर जी भी उस संस्था के कार्यकर्ता हैं। प्रिय भाइयों, सदैव यह स्मरण रखें कि कलीसिया कोई संस्था नहीं है; परन्तु लोगों का समूह है।

इन बातों के पश्चात् हमारे मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि अन्ततोगत्वा कलीसिया क्या है? तो आइए हम जाने कि कलीसिया क्या है –

कलीसिया क्या है?
कलीसिया शब्द यूनानी भाषा के ἐκκλησία (एक्लेसिया) शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ – एकत्रित किए हुए लोग होता है। इस शब्दार्थ से भी स्पष्ट हो जाता है कि कलीसिया लोग हैं। कलीसिया सच्चे, बपतिस्मा पाए हुए, और सच्चे सुसमाचार व शिक्षा पर सहमत, एक दूसरे के साथ वाचा बान्धे हुए तथा कलीसियाई पवित्र विधि जैसे बपतिस्मा और प्रभु भोज का अभ्यास करने वाले विश्वासी लोगों का समूह है।

“कलीसिया सब समय के सब सच्चे विश्वासी लोगों का एक समुदाय है।”

प्रसिद्ध ईश्वरविज्ञानी वेन ग्रूडेम कलीसिया को इस प्रकार से परिभाषित किया है कि “कलीसिया सब समय के सब सच्चे विश्वासी लोगों का एक समुदाय है।” इस परिभाषा के आधार पर यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि कलीसिया स्थान, भवन, संख्या नहीं है, परन्तु कलीसिया सच्चे विश्वासी लोग हैं। कलीसिया ख्रीष्ट में सच्चे विश्वासियों की मण्डली, समूह, या समुदाय है।

कलीसिया लोग हैं : “कलीसिया नई वाचा के अन्तर्गत ख्रीष्ट के लहू से बचाए गए परमेश्वर के लोग हैं।” इसलिए पौलुस इफिसियों 5:25 में कहते हैं, कि “ख्रीष्ट ने कलीसिया से प्रेम किया और उसके लिए अपने आप को दे दिया। कलीसिया परमेश्वर के लोग हैं, यह स्थान व सांख्यिकी नहीं है। कलीसिया एक देह जो ख्रीष्ट के सिर से जुड़ी है। यह एक ऐसा परिवार है जिसमें हम लेपालकपन के द्वारा ख्रीष्ट के माध्यम से एक साथ जोड़े गए हैं।

कलीसिया के प्रकार 
कलीसिया दो प्रकार की होती है – 1. विश्वव्यापी / अदृश्य कलीसिया 2. स्थानीय / दृश्य कलीसिया।

विश्वव्यापी व अदृश्य कलीसिया में सब समय के सब सच्चे विश्वासी पाए जाते हैं, जो विशेष स्थान और समय की सीमा तक सीमित नही है। परन्तु यह भूत, वर्तमान और भविष्य के समस्त विश्वासी लोग विश्वव्यापी व अदृश्य कलीसिया के भाग हैं। एक विश्वासी चाहे व्यक्ति भारत का हो या अमेरिका हो, वह चाहे किसी भी क्षेत्र, देश, समय, भाषा का हो, वह विश्वव्यापी व अदृश्य कलीसिया का भाग है। यीशु ख्रीष्ट जब वापस आएंगे तो विश्वव्यापी और अदृश्य कलीसिया को ले जाएंगे। 

स्थानीय /दृश्य कलीसिया ऐसी कलीसिया है जिसे हम देख सकते हैं। जिस कलीसिया में हम नियमित रूप से आराधना हेतु मिलते हैं। जहां पर प्रभु भोज और बपतिस्मा का अभ्यास किया जाता है। जहां पर विश्वासी लोग एक-दूसरे के साथ वाचा बांधकर प्रतिबद्धता के साथ और उत्तदायी रूप से ख्रीष्टी जीवन जीते हैं। जहां पर वचन/सुसमचार का प्रचार किया जाता है, जहां पर वचन/सुसमाचार पर आधारित गीतों को गाया जाता है, जहां पर प्रभु भोज और बपतिस्मा की विधि के द्वारा सुसमाचार का प्रदर्शन किया जाता है। प्रत्येक सच्चा ख्रीष्टीय जो स्थानीय कलीसिया का सदस्य है वह विश्वव्यापी व अदृश्य कलीसिया का भी भाग होगा। साथ ही साथ प्रत्येक जीवित सच्चे ख्रीष्टीय को जो विश्वव्यापी कलीसिया का भाग है वह स्थानीय व अदृश्य कलीसिया का भाग अवश्य ही होना चाहिए।

अतः जब हम एक परिवार और एक देह के अंग है, जो एक दूसरे के साथ जोड़े गए हैं, तो हमारा उत्तरदायित्व अपने भौतिक परिवार के सदृश ही इस आत्मिक परिवार के प्रति होता है। इसलिए हम एक-दूसरे की आत्मिक चिन्ता करें, एक-दूसरे की भलाई करें और आत्मिक जीवन में बढ़ने में सहायता करें। हम एक-दूसरे से प्रेम करें और प्रोत्साहित करें। हम अपने जीवन को लेकर एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी बनें।