यीशु की उत्तम पुकार हमें अनन्त आश्वासन देती है  

लूका 23:46 – और यीशु ने ऊँचे स्वर से पुकार कर कहा, “हे पिता, मैं अपना आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ।” यह कहकर उसने प्राण त्याग दिया। इसके आधार पे जो मुख्य बात हम देखेंगे वह यह है की “यीशु की उत्तम पुकार हमें अनन्त आश्वासन देती है”।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि क्रूस पर मृत्यु की अवस्था में यह पुकार कैसे एक उत्तम पुकार हो सकती है और कैसे यह हमें एक अनन्त आश्वासन दे सकती है ? 

जिस समय यीशु यह अन्तिम वाणी कह रहे हैं उस समय वह 6 घण्टों से क्रूस पर हैं। अत्यन्त शारीरिक और मानसिक पीड़ा में तथा अपने पूरे होश में होकर वह ऊँचे स्वर से वह कहता है “हे पिता, मैं अपना आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ”। यह कहकर उसने प्राण त्याग दिया। अपने मृत्यु के समय में भी परमेश्वर को पिता कहकर सम्बोधित करने के द्वारा हम उस प्रेम और भरोसे को देख सकते हैं जो यीशु अपने पिता के प्रति रखता है। 

इस अन्तिम वाणी या यीशु के द्वारा कहे गए इन शब्दों को हम भजन 31:5 में पाते हैं और यहाँ, क्रूस पर यीशु इन शब्दों को कह रहे हैं। भजन 31 में दाऊद राजा इस भरोसे के साथ कि परमेश्वर उसको शत्रुओं से बचाएगा अपने शत्रुओं से अपने प्राण की सुरक्षा के लिए यह प्रार्थना करता है। परन्तु जब यीशु ने इन शब्दों को कहा, तो वह दाऊद के समान अपने प्राण की रक्षा के लिए प्रार्थना नहीं कर रहा था और न ही वह क्रूस की मृत्यु से चमत्कार के द्वारा बच जाने के लिए प्रार्थना नहीं कर रहा था।

यीशु की यह पुकार दाऊद की प्रार्थना और पुकार से एक उत्तम और बेहतर पुकार थी इसलिए यीशु की यह पुकार हमें 2 बातें स्मरण दिलाती हैं। 

1. यीशु का अपनी मृत्यु पर सम्पूर्ण नियंत्रण था। 

जब यीशु ने अपने प्राण को त्याग दिया, वह असहाय होकर अपने प्राण को नहीं त्यागा, वह विवश होकर अपने प्राण को नहीं त्यागा। एक लाचार अवस्था में यीशु ने प्राण को नहीं त्यागा। ऐसा नहीं था कि यीशु समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ यह क्या और क्यों हो रहा है। ऐसा नहीं था की उसका प्राण उससे ले लिया गया या छीन लिया गया, किन्तु यीशु ने अपनी इच्छा से अपने प्राण को दे दिया क्योंकि इसका अधिकार केवल उसके पास था। 

यूहन्ना 10:17-18 में यीशु ने कहा था कि “पिता इसलिए मुझसे प्रेम रखता है कि मैं अपना प्राण देता हूँ कि उसे फिर ले लूँ। कोई उसे मुझ से नहीं छीनता, परन्तु मैं उसे अपने आप दे देता हूँ। मुझे उसे देने का अधिकार है, और फिर ले लेने का भी अधिकार है। यह आज्ञा मैंने अपने पिता से पायी है”। इसलिए यीशु की मृत्यु एक हताश, हारे हुए, लाचार मनुष्य की मृत्यु नहीं थी। यीशु ने अपनी इच्छा से, सम्पूर्ण नियंत्रण में होकर, अपने अधिकार में होकर यीशु ने अपने प्राण को त्यागा दिया क्योंकि यीशु के पास अपनी मृत्यु पर सम्पूर्ण नियंत्रण था। यह बात हमारे लिए बहुत ही उत्तम है। 

2. यीशु अपने कार्य को सिद्धता से समाप्त करते हैं। 

यीशु का ऊँचे स्वर से पुकार कर इस वाणी को कहना कि, “हे पिता, मैं अपना आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ”, यह दर्शाता है कि उसने अपने पिता की इच्छा को सिद्धता से पूरा कर दिया है। उसने कोई कार्य को रख नहीं छोड़ा जिसे अब हमें पूरा करना होगा। यह एक जीत की पुकार है। पिता के हाथों में वह अपनी आत्मा को इस आश्वासन के साथ सौंप देता है क्योंकि वह जानता है कि उसने उद्धार के कार्य को पूरा कर दिया है। और अब वह उस महिमा में प्रवेश करेगा जिस महिमा में वह पिता के साथ अनन्त काल से था (यूहन्ना 17:5)। उसने अपने कार्य को पूरा कर दिया है और अब वह पिता के दाहिने हाथ पर जा बैठेगा और अपनी अनन्त महिमा में प्रवेश करेगा। 

इसलिए, इन शब्दों को यीशु  धीमी आवाज में नहीं कह रहे हैं। वह ऊँचे स्वर से पुकार कर यह कह रहे हैं क्योंकि वह चाहते हैं की वहाँ खड़े हुए लोग इन शब्दों पर ध्यान दें और सुने और आज हमें भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि यह हमें कुछ आश्वासन देते हैं।  

और यह दो बातें (अपनी मृत्यु पर सम्पूर्ण नियंत्रण और अपने कार्य को सिद्धता से समाप्त करना) हमें अनन्त आश्वासन देता है। तो आज हम इससे क्या आश्वासन पा सकते हैं ?

– हमें मृत्यु से डरने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि यीशु ने उद्धार के कार्य को पूरा कर लिया है, अब हम पर दण्ड की आज्ञा नहीं रही। हमारी शारीरिक मृत्यु के बाद हमारे पास एक अनन्त आश्वासन है और इसलिए हम मृत्यु से नहीं डरेंगे। यीशु पर विश्वास करने के द्वारा हम अपने शारीरिक मृत्यु के बाद अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे। 

– जीवन की कठिनाइयों, परीक्षाओं और दुखों के मध्य में हम हताश नहीं होंगे यह जानते हुए कि यह सब “कुछ समय” के लिए है और एक दिन हम महिमा में प्रवेश करेंगे जो केवल यीशु ख्रीष्ट के कारण सम्भव हो पाया है। यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास के द्वारा ही हम उस महिमा में प्रवेश करने के आश्वासन को प्राप्त कर सकते हैं। 

तो इस उत्तम पुकार के द्वारा जो हमें अनन्त आश्वासन प्रदान करता है उसके लिए हमें कृतज्ञ और धन्यवादी होने की आवश्यकता है क्योंकि यह जीवित आश्वासन हमें संसार, हमारा धन, हमारी नौकरी, हमारे मित्र इत्यादि दे नहीं सकते हैं। यह केवल यीशु पर विश्वास करने के द्वारा हम प्राप्त कर सकते हैं। 

साझा करें:

अन्य लेख:

यदि आप इस प्रकार के और भी संसाधन पाना चाहते हैं तो अभी सब्सक्राइब करें

"*" indicates required fields

पूरा नाम*