पौलुस : ईश्वरविज्ञानीय दिग्गज और प्रार्थना योद्धा

जब आप प्रेरित पौलुस के विषय में सोचते हैं, तो सबसे पहले आपके मन में क्या विचार आते हैं? मैं आपके विषय में नहीं जानता, पर मेरे मन के चित्र में पौलुस एक ऐसा व्यक्ति है जिसका मन सदैव लगा रहता था, उन सिद्धान्तों को समझने के लिए जिन्हें हम आज थामते हैं। मैं कल्पना करता हूँ कि रोमियों की पत्री लिखते समय वह ध्यान से हमारे उद्धार और मनुष्यों के लिए परमेश्वर की सम्प्रभु योजनाओं की सूक्ष्मताओं को व्यक्त करते हुए गहन विचारों में डूबा हुआ था। मैं कल्पना करता हूँ कि कुरिन्थियों और गलतियों को पत्रियों को लिखते हुए उसके माथे पर झुर्रियां थी क्योंकि कलीसियाओं में सही सिद्धान्त को सही रीति से समझा और लागू नहीं किया जा रहा था। मैं कल्पना करता हूँ कि वह घण्टों तक पवित्रशास्त्र पर मनन करता होगा, इन बातों को गहरी रीति से समझने के लिए कि वे ख्रीष्ट और अन्तिम दिनों के विषय में क्या कहते हैं। मैं कल्पना करता हूँ कि वह सर्वदा झूठे शिक्षकों की ताक में रहता था, ताकि वह उन्हें दिखा सके कि वे सत्य को समझने में त्रुटि करते हैं। मैं प्रायः पौलुस को घुटने के बल प्रार्थना करते हुए बहुत कम कल्पना करता हूँ।

परन्तु, जब हम प्रेरितों के काम और पौलुस की पत्रियों को पढ़ते हैं, तो पौलुस के विषय में  मेरी कल्पनाओं के विपरीत, हम एक ऐसे पुरुष से मिलते हैं जो प्रार्थना में लवलीन था। पौलुस द्वारा प्रार्थना को दिए गए महत्व को समझने के लिए हम इस लेख में इन चार बातों को देखेंगे:

उसने नम्रतापूर्वक प्रार्थना की मांग की क्योंकि वह जानता था कि परमेश्वर अपनी सन्तानों की प्रार्थनाओं का उत्तर देने के द्वारा कार्य करता है

1. पौलुस ने प्रार्थना के विषय में शिक्षा दी
जब हम पत्रियों को पढ़ते हैं, हम देखते हैं कि पौलुस ने प्रार्थना के विषय में शिक्षा दी। उदाहरण के लिए, रोमियों 8:26 में वह प्रार्थना में पवित्र आत्मा से प्राप्त होने वाली सहायता की बात करता है, और 1 कुरिन्थियों 11 और 1 तीमुथियुस 2 में, वह कलीसियाई सभाओं में प्रार्थना के विषय में शिक्षा देता है। शिक्षा देने के साथ-साथ, पौलुस ने कई पत्रियों में कलीसियाओं को प्रार्थना करने के लिए निर्देश भी दिए (रोमियों 12:12; इफिसियों 4:18; फिलिप्पियों 4:6; कुलुस्सियों 4:2-3; 1 थिस्सलुनीकियों 5:17; 1 थिस्सलुनीकियों 3:1; फिलेमोन 1:22 देखिए)। वह जानता था कि ख्रीष्टीय लोग सुसमाचार के प्रतिउत्तर में आज्ञाकारिता की बुलाहट को सच में केवल तब लागू कर पाएंगे, जब वे परमेश्वर से सहायता मांगते हुए इसे करें। पौलुस ने विश्वासियों को न केवल प्रार्थना करने के लिए निर्देश दिया, उसने साथ में अपनी प्रार्थनाओं को पत्रियों में लिखने के द्वारा प्रार्थना का नमूना भी दिया। ऐसा करने से वे देख सकते थे कि उन्हें किन बातों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और उन्हें परमेश्वर के समक्ष कैसे आना चाहिए।

2. पौलुस की प्रार्थना सिद्धान्त द्वारा प्रेरित थी
प्रार्थना उन सब विषयों में से एक था जिनकी शिक्षा पौलुस देता था, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी शिक्षा प्रार्थना से अलग थी। वास्तव में देखा जाए तो, उसका सिद्धान्त प्रार्थना के साथ लिपटा हुआ था। इफिसियों 1:3-14 पर विचार कीजिए। इस खण्ड में, पौलुस कई आशीषों को उल्लेखित करता है जिनका आनन्द ख्रीष्ट में होने के कारण ख्रीष्टीय लोग उठाते हैं। पर वह इन्हें केवल कुछ कथनों के रूप में नहीं लिखता है जिनको समझा जाना और स्वीकार किया जाना चाहिए। इसके विपरीत, पौलुस इसे परमेश्वर के प्रति स्तुति के रूप में व्यक्त करता है। या, इफिसियों ही में, 3:14-21 के विषय में सोचिए। यह खण्ड, जिसमें पौलुस कलीसिया के लिए प्रार्थना करता है और परमेश्वर की बुद्धि के लिए उसकी स्तुति करता है, जब पौलुस ने समझाया कि उद्धार अनुग्रह के द्वारा है (2:1-10), और कि सुसमाचार परमेश्वर के ज्ञान को प्रकट करता है एक ऐसी कलीसिया का निर्माण करने के द्वारा जिसमें यहूदी और गैरयहूदी हैं (2:11-3:13)। और सम्भवतः अधिक प्रसिद्ध रीति से रोमियों में, केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने के सुसमाचार को पहले 8 अध्यायों में समझाने के बाद, फिर 9-11 अध्यायों में चुनाव के कठिन सिद्धान्त के साथ संघर्ष करने के बाद, पौलुस अपने आप को 11:33-36 में स्तुति करने से रोक नहीं पाता है। सिद्धान्त के कारण उसने न केवल स्तुति की, पर उसने उसको गम्भीर प्रार्थना के लिए भी प्रेरित किया। इसका उदाहरण हम रोमियों 10:1 में देखते हैं, जहाँ पौलुस यहूदी लोगों के उद्धार के लिए अपनी इच्छा को व्यक्त करता है। यह बहुत स्पष्ट है कि परमेश्वर की सत्यों के विषय में पौलुस की मानसिक समझ और उसके प्रार्थना के जीवन में कोई अलगाव नहीं था।

3. पौलुस नियमित रीति से कलीसियाओं के लिए प्रार्थना करता था
पौलुस की प्रार्थना केवल परमेश्वरीय प्रकाशन के प्रतिउत्तर में परमेश्वर की स्तुति करने और प्रार्थना करने तक सीमित नहीं थी। वह उन सब कलीसियाओं के लिए एक पास्टर की चिन्ता रखता था जिन्हें उसने रोपित किया था। उसकी पत्रियों में उल्लेखित प्रार्थनाओं में, हम देखते हैं कि पौलुस उनके लिए नियमित तथा सुविचारित रीति से प्रार्थना करता था। यह स्पष्ट है जब हम ध्यान देते हैं कि पौलुस अधिकांश पत्रियों का आरम्भ कैसे करता है। जब आप इन पदों को पढ़ते हैं, ध्यान दीजिए कि पौलुस अपनी प्रार्थना के ढ़ंग को कैसे वर्णित करता है:

  • “परमेश्वर . . . मेरा साक्षी है कि मैं तुम्हें किस प्रकार निरन्तर  स्मरण करता हूँ, तथा सदैव  अपनी प्रार्थनाओं में विनती करता हूँ . . ” (रोमियों 1:9-10)।
  • “मैं तुम्हारे विषय में . . . परमेश्वर का निरन्तर  धन्यवाद करता हूँ ” (1 कुरिन्थियों 1:4)।
  • “मैं तुम्हारे लिए निरन्तर  धन्यवाद देता हूँ और अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हें स्मरण किया करता हूँ” (इफिसियों 1:16)।
  • जब कभी  मैं तुम्हें स्मरण करता हूँ, अपने परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ, तथा . . . तुम्हारे लिए सदा  प्रार्थना करता हूँ” (फिलिप्पियों 1:3-4)।
  • “हम तुम्हारे लिए सदैव  प्रार्थना करते हुए अपने प्रभु यीशु ख्रीष्ट के पिता परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं” (कुलुस्सियों 1:3)।
  • “हम अपनी प्रार्थनाओं में तुम्हें स्मरण करते हुए तुम सब के लिए परमेश्वर का सदैव  धन्यवाद करते हैं” (1 थिस्सलुनीकियों 1:2)।
  • “तुम्हारे लिए तो हमें सर्वदा  परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए . . .” (2 थिस्सलुनीकियों 1:3)।
  • “मैं अपनी प्रार्थनाओं में रात-दिन निरन्तर  तुझे स्मरण करते हुए परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ . . .” (2 तीमुथियुस 1:3)।
  • “मैं तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में स्मरण कर के अपने परमेश्वर का सदैव  धन्यवाद करता हूँ” (फिलेमोन 1:4)

इन पदों से कोई संदेह नहीं है कि सही सिद्धान्त की शिक्षा देने के उत्तरदायित्व को गम्भीरता से लेने के साथ-साथ, पौलुस जानता था कि परमेश्वर ही था जो सब कलीसियाओं में विश्वासियों को परिवर्तित करने के लिए कार्य कर रहा था।

4. पौलुस ने प्रार्थना की मांग की
पौलुस के प्रार्थना के जीवन का सम्भवतः सबसे आश्चर्यजनक तत्व यह है कि वह अपने लिए विश्वासियों से प्रार्थना की मांग करता था। पौलुस भली-भांति जानता था कि वह सुसमाचार के लिए कितना कठिन परिश्रम करता था (उदाहरण के लिए, प्रेरितों के काम 20:34; 1 कुरिन्थियों 15:10; 1 थिस्सलुनीकियों 2:9), पर इसका अर्थ यह नहीं था कि उसको परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता नहीं थी। वह दूसरों से प्रार्थना की मांग करने के लिए घमण्डी नहीं था (रोमियों 15:30; 2 कुरिन्थियों 1:11; कुलुस्सियों 4:3; 1 थिस्सलुनीकियों 5:25; 2 थिस्सलुनीकियों 3:1 दिखिए)। इसके विपरीत, उसने नम्रतापूर्वक प्रार्थना की मांग की क्योंकि वह जानता था कि परमेश्वर अपनी सन्तानों की प्रार्थनाओं का उत्तर देने के द्वारा कार्य करता है (फिलिप्पियों 1:19, फिलेमोन 1:22 देखिए)।

क्या प्रार्थना से सम्बन्धित सच्चाईयां—उसका अद्भुत सौभाग्य, यह आश्वासन कि परमेश्वर हमें सुनता है, यीशु के प्रार्थना के जीवन का उदाहरण, हमारी प्रार्थना में पवित्र आत्मा की सहायता—हमें प्रार्थना करने के लिए उस्ताहित करती हैं?

आप और हम कैसे कर रहे हैं?
यह देखने के बाद कि पौलुस, एक ईश्वरविज्ञानी दिग्गज, प्रार्थना के लिए समर्पित था और अपने जीवन और अपनी सेवकाई के लिए परमेश्वर पर निर्भर था, आइए हम अपने आप को जांचें, जो कि कोविड-19 की दूसरी लहर के मध्य जी रहे हैं। यदि हम अपने जीवन का अवलोकन करें और पौलुस के साथ तुलना करें, तो क्या परिणाम निकलेगा?

हमारे जीवन में प्रार्थना का कितना केन्द्रीय स्थान है? क्या प्रार्थना से सम्बन्धित सच्चाईयां—उसका अद्भुत सौभाग्य, यह आश्वासन कि परमेश्वर हमें सुनता है, यीशु के प्रार्थना के जीवन का उदाहरण, हमारी प्रार्थना में पवित्र आत्मा की सहायता—हमें प्रार्थना करने के लिए उस्ताहित करती हैं? या क्या हम अपने समय को सोश्यल मीडिया पर सबसे नए समाचार के लिए खोजने में समय व्यतीत करते हैं? प्रार्थना हमारे सिद्धान्त के साथ कितना मिला हुआ?

क्या हमारा सिद्धान्त हमारी प्रार्थनाओं के विषय-वस्तु पर कोई प्रभाव डालता है? या क्या हमने सिद्धान्त और प्रार्थना को एक दूसरे से इतना अलग कर दिया है कि हम सिद्धान्त की चर्चा करने में आनन्द लेते हैं, पर प्रार्थना में शब्द ढूंढ़ने के लिए संघर्ष करते हैं? परमेश्वर के विषय में हमारी समझ इस वैश्विक महामारी के मध्य हमारी प्रार्थनाओं को कैसे आकार देती है?

क्या हम अन्य ख्रीष्टियों के लिए प्रार्थना करते हैं? निस्सन्देह हमारे पास पौलुस के समान प्रेरिताई नहीं है, पर क्या हम अपनी ख्रीष्टीय भाइयों और बहनों के लिए प्रार्थना करते हैं? क्या हम नियमित रीति से  अपनी कलीसिया के सह सदस्यों के लिए प्रार्थना करते हैं? क्या हम उन ख्रीष्टियों के लिए प्रार्थना करते हैं जिन्हें हम जानते हैं और जिन्होंने कोरोना वायरस के हाथ अपने प्रियजनों को खोया है? क्या हम उन कलीसियाओं के लिए प्रार्थना करते हैं जिनके पास्टरों का देहान्त हो गया, और उन परिवारों के लिए जिनके प्रियजनों का देहान्त हो गया? जब हम प्रार्थना करते हैं, तो क्या उनके लिए हमारी प्रार्थनाएं पवित्रशास्त्र द्वारा निर्मित हैं?

क्या हम प्रार्थना की मांग करते हैं? इसलिए नहीं कि हम लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं या धन मांगना चाहते हैं। परन्तु, क्या हम प्रार्थना की मांग करते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि प्रभु के बिना हम निर्बल और असहाय हैं? हमें प्रार्थना की आवश्यकता है, न केवल कोविड निगेटिव बने रहने के लिए, पर ईश्वरभक्ति में बढ़ने के लिए, पाप से लड़ने के लिए, और साहस के साथ सुसमाचार का प्रचार करने के लिए।

परमेश्वर हम पर दया करे और हमें प्रार्थना करना सिखाए। वह सिद्धान्त की मानसिक समझ को लेकर हमारे घमण्ड को क्षमा करे, और हम ऐसे लोग हो सकें जो प्रार्थना करते हैं—अपने लिए, अपने परिवारों के लिए, अपनी कलीसियाओं के लिए, और अपने देश के लिए।


यह लेख ‘एक्विप इण्डियन चर्चस’ पर प्रकाशित लेख से अनुवादित किया गया है, जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं:https://equipindianchurches.com/blog/paul-a-theological-giant-and-a-prayer-warrior/

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