परमेश्वर उद्धार है, इस बात से आनन्दित रहें।

मेरा प्राण यहोवा में आनन्दित होगा और उसके उद्धार के कारण मग्न होगा (भजन संहिता 35:9)।

ख्रीष्टीय जीवन में हम बहुत सारे संघर्षों में से होकर जाते हैं। कभी-कभी हम कठिन समय से होकर जाते हैं, हमें प्रतीत होता है कि परमेश्वर चुप है, परमेश्वर हमसे प्रेम नहीं करता है, परमेश्वर ने हमें छोड़ दिया है। हम सोचने लगते हैं कि, मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा है, क्या मैं अभी भी परमेश्वर पर भरोसा रखना चाहता हूँ। क्या लाभ है? क्यों मेरे साथ ही ऐसा हो रहा है। जब हम विपरित परिस्थिति का सामना करते हैं, हम हताश हो जाते हैं, निराश हो जाते हैं, हम विचलित होते हैं। ऐसे समय में हम क्या करें ? 

कितना अदभुत है हमारा उद्धारकर्ता जिसकी मृत्यु के द्वारा हम अनन्तकाल कि लिए जी सकते हैं। 

हम भजन 35 में देखते हैं कि दाऊद के शत्रु अकारण उसके बैरी हैं और उसके प्राण लेने के लिए पीछे पड़े हुए हैं। इस परिस्थिति में दाऊद परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि परमेश्वर उसके शत्रु से उसके प्राण को बचाए। वह परमेश्वर से छुटकारे व न्याय के लिए निवेदन करता है। इस भजन में हम देखते हैं कि दाऊद की स्थिति ठीक नहीं है। परन्तु वह परमेश्वर को जानता है कि परमेश्वर कौन है। इसलिए वह परमेश्वर से प्रार्थना करता है, और परमेश्वर में मग्न है। वह आगे कहता है, हे यहोवा तेरे तुल्य कौन है (भजन 35:10)। दाऊद परमेश्वर को सम्बोधित करने के बाद, अपनी वर्तमान परिस्थिति के बारे में बताता है। वह इसे छिपाता नहीं है। वह कहता है, मेरा प्राण यहोवा में आनन्दित होगा और उसके उद्धार के कारण मग्न होगा। वह आगे कहता है, मेरी हड्डी-हड्डी कहेगी, कि परमेश्वर के तुल्य कोई नहीं (भजन 35 : 9-10)। 

यीशु ने हमारे पापों को ले लिया और हमारे बदले बलिदान हुआ, इसका अर्थ है कि हमारे सभी पाप अर्थात् अतीत, वर्तमान और भविष्य के पाप दूर हो गए हैं।

हमारे जीवन की विपरीत परिस्थिति में जब हम कठिन समस्या का सामना करते हैं, ऐसे समय में हमारे लिए अच्छा यह होगा कि हम परमेश्वर के उद्धार को देखें तथा जो कार्य उसने अपने पुत्र यीशु के द्वारा क्रूस पर किया है। हम इस बात से आनन्दित हों कि परमेश्वर ने हमें बचाने के लिए यीशु को भेजा जो हमारे सबसे बड़े शत्रु, पाप से बचाने के लिए हमारे लिए बलिदान हुए ताकि हम उसके द्वारा जीवन पाएं। क्योंकि यीशु ने हमारे पापों को ले लिया और हमारे बदले बलिदान हुआ, इसका अर्थ है कि हमारे सभी पाप अर्थात् अतीत, वर्तमान और भविष्य के पाप दूर हो गए हैं। हमारे अनगिनत पाप, अंसख्य पाप क्षमा किए गए हैं। उसमें आनन्दित रहें। कितना अदभुत है हमारा उद्धारकर्ता जिसकी मृत्यु के द्वारा हम अनन्तकाल कि लिए जी सकते हैं। 

इसलिए परमेश्वर के उद्धार में आनन्दित रहें। क्योंकि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, हम उसकी संतान हैं, और हम स्वर्ग जा रहे हैं। हमारी नागरिकता स्वर्ग की है ( फिलिप्पियों 3:20)।। हमें परमेश्वर के प्रेम से कोई अलग नहीं कर सकता है ( रोमियों 8:35)। हमारा पलभर का यह हल्का-सा क्लेश एक ऐसी चिरस्थायी महिमा उत्पन्न कर रहा है जो अतुल्य है ( 2 कुरिन्थियों 4: 17)। यीशु ने कहा, “जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम भी रहो, स्वंय यीशु हमारे साथ होंगे” (यूहन्ना 14:3)। प्रेरित यूहन्ना लिखते हैं, “देखो, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है, वह उनके मध्य निवास करेगा। वे उसके लोग होंगे तथा परमेश्वर स्वयं उनके मध्य रहेगा। उस दिन वह हमारे आँसुओं को पोंछ डालेगा” (प्रकाशितवाक्य 21: 3-4)। चाहे हमारी स्थिति कैसी भी क्यों न हो हम परमेश्वर पर भरोसा रखें, क्योंकि वह हमारा उद्धार है। यह इस पर आधारित नहीं है कि हमने क्या किया है बल्कि परमेश्वर ने हमारे लिए क्या किया है, इस बात पर आधारित है।

प्रेरित पतरस उन विश्वासियों को लिखता है, जब उनके जीवन में सब कुछ सही नहीं चल रहा है, जो बहुत से अन्याय को सह रहे थे, जब वे सताव में होकर जा रहे थे, उनको यह नहीं कहता है कि चिन्ता मत करो, सब ठीक हो जाएगा, या सकरात्मक सोचो। परन्तु वह उनसे कहता है कि “परमेश्वर के उद्धार का काम को देखें और परमेश्वर की स्तुति करें” (1 पतरस 1: 3-12)। परमेश्वर ने जो उद्धार का काम किये हैं, उसको देखें। विपरीत परिस्थिति में, कठिन समय में केवल वही हमारी आशा है। परमेश्वर से अधिक सामर्थी कोई नहीं है। कोई और अधिक प्रेम करने वाला नहीं है। परमेश्वर के अलावा कोई दूसरा परमेश्वर नहीं है। केवल वही उद्धारकर्ता है। उसमें आनन्दित रहें।

आज हमारे बारे में क्या है? क्या हम परमेश्वर के उद्धार के कारण आनन्दित हैं? आज हम कहाँ पर आनन्दित है? आज हम किस चीज में मग्न हैं? विपरित परिस्थिति में, कठिन समय में, हम किस बात में मग्न रह सकते हैं? हम किसके पास जा सकते हैं? चाहे कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो, इस बात को स्मरण रखें, कि परमेश्वर उद्धार है और उसमें आनन्दित रहें। हबक्कूक 3: 17-18 में लिखा है, चाहे अंजीर का वृक्ष न फूले, न दाखलताओं में फल लगे, और जैतुन वृक्ष फल न दें, खेतों में अनाज उत्पन्न न हो, और भेड़शालाओं से भेड़-बकरियां जाती रहें और थानों में गाय-बैल न रहें। फिर भी यहोवा के कारण मैं आनन्दित रहूंगा और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर में मग्न रहूंगा। 

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