अपने आप का परित्याग करना ही स्वयं से प्रेम करना है।

जब बहुत से लोग अपने आप का परित्याग करने और अपना क्रूस उठाने के विषय में, यीशु की कठोर आज्ञा को सुनते हैं (मरकुस 8:34), तो वे हमारे प्रभु के साथ एक और वाणी को सुनते हैं। वह वाणी कहती है, “दूसरे शब्दों में, दुखी हो। वह सब कुछ खो दो जिससे आप प्रेम करते हैं। अपनी थोड़ी सी खुशी लो और उस पर रौंदो। शहीद बनो।”

हम इस सदैव उपलब्ध वाणी को बाइबल का नया सर्प अनुवाद (New Serpent Translation (NST)) कह सकते हैं। अन्ततः शैतान संसार का प्रथम बाइबल अनुवादक और अर्थानुवादक था। “तो उसने कहा कि उस वृक्ष में से खाना मना किया है? हाँ, मुझे बताने दीजिए कि उसका वास्तविक अर्थ क्या है . . .” (उत्पत्ति 3:1-5)। यह अनुभव हमारे लिए इतना सचेत नहीं होता है जितना कि हव्वा के लिए था। हमें पता ही नहीं चलता कि हम सर्प के वश में आ गए हैं; हम यीशु को सुनकर इस छोटे विचार को लिए हुए चलते हैं कि उसकी आज्ञाएँ बोझिल हैं।

परन्तु शैतान इस बात को नहीं बताता है कि यीशु “शैतान के कामों को नष्ट करने” के लिए आया था (1 यूहन्ना 3:8), जिसमें ईशनिन्दा सम्बन्धित यह झूठ भी सम्मिलित है कि “अपने आप का परित्याग” करने का अर्थ है “दुखी हो।” और इसलिए, वह हमें यह बताकर सर्प के स्वर को शान्त करता है कि अपने आप का परित्याग करना वास्तव में किस ओर ले जाता है। यीशु हमें बताता है, कि जब हम अपने आप का परित्याग करते हैं, तब हम स्वयं को प्राप्त करते हैं। हम शैतान का विरोध करते हैं। हम स्वर्ग के पक्ष में जुड़ते हैं। हम अपने शोक को नष्ट करते हैं।

स्वयं को प्राप्त करें

एक ऐसे समाज में जो व्यक्तिवाद को इतना अधिक महत्व देता है, सम्भवत: एक भय व्यापक रीति से मंडराने लगता है जब हम सुनते है कि “अपने आप का परित्याग करो”: यह भय कि हम अपने आप को खो देंगे। हम उन सब बातों से वंचित रहेंगे जो मुझे मेरी पहचान देती हैं। हमारे सपने नष्ट हो जाएँगे, हमारी इच्छाएँ धुंधली हो जाएँगी, हमारा व्यक्तित्व मिट जाएगा। हम एक अन्तहीन उदास समुद्र में एक और बून्द मात्र बन जाएँगे।

इस भय को समझा जा सकता है। क्योंकि “अपने आप का परित्याग करने” के लिए अपने आप का परित्याग करना पड़ेगा। हमें प्रत्येक उस पेड़ की जड़ को काटना होगा जो हम में बुरा फल लाता है। प्रत्येक पाप को घात किया जाना चाहिए, मेरा  प्रत्येक वह भाग जो उसे प्रतिबिम्बित नहीं करता है, उसे त्याग दिया जाना चाहिए — और न केवल एक बार, वरन् “प्रतिदिन” (लूका 9:23)। “देखो,” सर्प कहता है, “अपने आप को खो दो।”

“यदि आप शैतान को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो स्वयं को इनकार करने को अस्वीकृत करें।”

जिसके प्रति यीशु का प्रतिउत्तर है, “नहीं, अपने आप को प्राप्त करो — अपने वास्तविक स्वयं को।” वह कहता है, “जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, परन्तु जो कोई मेरे और सुसमाचार के कारण अपना प्राण खोता है, वह उसे बचाएगा” (मरकुस 8:35)। स्वर्ग के राज्य में ऐसे रहस्य हैं जिनके विषय में शैतान कुछ नहीं जानता। जहाँ यीशु शासन करता है, वहाँ ऊपर का मार्ग नीचे है, प्रथम अन्तिम हैं, और अपने जीवन को बचाने का एकमात्र उपाय है कि आप उसे उसके लिए खो दें।

अपने आप का परित्याग करने के पश्चात् का जीवन सम्भवतः उस जीवन से बहुत भिन्न दिखे जिससे आप परिचित हैं। परन्तु यह उससे भी और बुरा — नहीं होगा — यह हो ही नहीं सकता  है। यह एक ऐसा जीवन है जहाँ हम त्यागे हुई बातों से सौ गुना अधिक प्राप्त करते हैं (मरकुस 10:30)। यह एक ऐसा जीवन है जहाँ हम अब विश्व के संगीत में एक बेसुरे स्वर नहीं हैं, वरन् उसी स्वर से गा रहे हैं जिसके लिए परमेश्वर ने हमें बनाया है। यह एक ऐसा जीवन है जो यीशु के साथ है: वह यीशु जो सभी सुन्दरता का सृष्टिकर्ता, सभी टूटेपन का छुड़ाने वाला, तथा समस्त आनन्द के स्रोत है।

जब अपने आप का परित्याग करते हैं, तो आप अपने आप को नहीं खोएँगे — अनन्त रीति से तो नहीं। आप अपने आप को प्राप्त करेंगे।

शैतान का विरोध करें

निस्सन्देह, शैतान इस बात के पक्ष में नहीं है कि कोई भी अपने आप को प्राप्त करे। वह चोरी, हत्या और विनाश को अधिक प्रधानता देता है (यूहन्ना 10:10)। इसलिए जब हम ऐसे स्थान पर आते हैं जहाँ हम जानते हैं कि हमें अपने आप का परित्याग करना चाहिए, तो वह किसी न किसी रीति से सुझाव देगा, कि हम इसके विपरीत अपने आप को बचाना चाहिए।

यहाँ मरकुस 8 में, पतरस शैतान का प्यादा था। जब इस शिष्य ने अपने स्वामी को क्रूस से भटकाना चाहा, तो यीशु ने प्रतिउत्तर दिया, “हे शैतान, मेरे आगे से हट। तू तो परमेश्वर की बातों पर नहीं वरन् मनुष्य की बातों पर मन लगाता है” (मरकुस 8:33)। अपने पापमय स्वयं का परित्याग करने के स्थान पर बचाने का प्रलोभन एक हज़ार स्थानों से आ सकता है — हमारे अपने भीतर वास करने वाले पाप से, हमारे समाज से, यहाँ तक कि पतरस जैसे प्रिय मित्र से भी। परन्तु सबसे आधारभूत रीति से,  “अपने आप को बचाओ” यह सर्प के शब्द हैं। यह नरक का सुसमाचार है।

“जहाँ यीशु राज्य करता है, वहाँ ऊपर का मार्ग नीचे है, पहले वाले अन्तिम हैं, और अपने जीवन को बचाने का एकमात्र तरीका यह है कि इसे उसके लिए खो दिया जाए।”

कितनी बार हमें अपने आप का परित्याग करने का आवेग आया है — पेय को नीचे रखो, अतिरिक्त पैसों को दे दो, उस पड़ोसी से जाकर बात करो, लज्जाजनक पाप का अंगीकार करो— परन्तु तब ही हमारे भीतर का कोई भाग, पतरस के समान, हमारे अच्छे संकल्पों पर प्रश्न उठाना आरम्भ करता है ? “अब सुनो, महिमा के लिए एक और अधिक सुखद मार्ग है, है न? निश्चिय ही हम इस  क्रूस को उठाए बिना मुकुट को पकड़े सकते हैं? इतनी चरम सीमा तक जाने की आवश्यकता नहीं है। सभी बातों में संयम, स्मरण रखें।” शैतान सिंह हो सकता है, परन्तु हम उसकी दहाड़ को विरले ही सुनते हैं; उससे अधिक, वह अपने आप का परित्याग करने से बचने के लिए हमारे सबसे विश्वसनीय लगने वाले कारणों में प्रकट होता है।

यदि आप शैतान को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो अपने आप का परित्याग करने को अस्वीकार करें।” परन्तु यदि आप अपने प्राचीन शत्रु का विरोध करना चाहते हैं, यदि आप अपने प्राण से घृणा करने वाले का तिरस्कार करना चाहते हैं, यदि आप उन भुजाओं को काटना चाहते हैं जो आपको नरक में खींचती हैं, तो नीचे झुकें और अपना क्रूस उठाएँ।

स्वर्ग के पक्ष में साथ जुड़ें

कुछ लोगों के लिए, अपने आप का परित्याग करने का सबसे बड़ा मूल्य व्यक्तिगत सुखों की हानि नहीं है, वरन् सार्वजनिक प्रतिष्ठा और सम्बन्धों की हानि है। यीशु को “प्राचीनों और महायाजकों और शास्त्रियों ने तिरस्कृत किया” (मरकुस 8:31) — और इसके साथ यह बात तो थी ही कि उसके पड़ोसियों ने उसका उपहास किया और उसके परिवार ने उसकी आलोचना की (मरकुस 3:20–21; 6:1-6)। यदि हम उसका अनुसरण करते हैं, तो उसी प्रकार से हमें भी अस्वीकृति का सामना करना पड़ेगा।

फिर भी ध्यान दें कि यीशु कैसे इस मूल्य को स्वर्गीय दृष्टिकोणं में रखता है। जब हम यीशु के पीछे चलने के लिए उठते हैं तो हम किसे पीछे छोड़ रहे हैं? “इस व्यभिचारी और पापी पीढ़ी को” (मरकुस 8:38)। अपने पाप में, हमने व्यभिचारियों के साथ संगति रखते हैं; हम स्वयं भी उनमें से एक थे (याकूब 4:4)। हमें इसी संगति है जिसे हमें त्यागना होगा। और जब हम ऐसा करते हैं, हम किससे जुड़ते हैं? “मनुष्य का पुत्र,” से, जो एक दिन “पवित्र स्वर्गदूतों के साथ अपने पिता की महिमा में” लौटेगा (मरकुस 8:38)। दूसरे शब्दों में, हम स्वर्ग  से जुड़ते हैं। और स्वर्ग के पक्ष में होना सदैव इतिहास की दृष्टि में सही होने से उत्तम होता है।

निस्सन्देह, यीशु का अनुसरण करने से जो सम्बन्धों में अलगाव आता है, वह हमें रुला सकता है, विशेषकर जब हम जिस क्रूस को उठाते हैं वह हमें अपने सबसे प्रिय मित्रों और परिवार से अलग करता है। परन्तु क्या आप देख सकते हैं कि अपने आप का परित्याग करने की दूसरी ओर कौन आपकी प्रतीक्षा कर रहा है? आप एक ऐसे पिता के पास जाते हैं, जो अपने पश्चाताप करने वाले लोगों के कारण उत्साह मनाने के लिए तैयार है (लूका 15:7, 10, 22-24)। आप बड़ी संख्या में पवित्र स्वर्गदूतों के पास जाते हैं, जो आपको दिए गए अनुग्रह के लिए अचम्भित होते हैं (1 पतरस 1:12)। और आप यीशु के पास जाते हैं, वह पुत्र जो एक भाई से अधिक निकट, एक मित्र से अधिक प्रिय है, बन गया है।

जैसा कि एलीशा ने अपने भयभीत दास से कहा था, वैसे ही हम अपने भयभीत प्राणों से कह सकते हैं, “मत डर, क्योंकि जो हमारे साथ हैं वे उनसे अधिक हैं जो उनके साथ हैं” (2 राजा 6:16)। और जो हमारे साथ हैं वे न केवल संख्या में अधिक हैं, वरन् कहीं गुणा उत्तम भी हैं।

अपने दुखों को नष्ट करें

अब हम अपने आप का परित्याग करने के सम्भवतः सबसे आश्चर्यजनक प्रतिज्ञा पर आते हैं। यदि आप अपने आप का परित्याग करते हैं, तो आप न केवल स्वयं को प्राप्त करेंगे, शैतान का विरोध करेंगे, और स्वर्ग के पक्ष में जुड़ेंगे, आप तो आनन्दित भी होंगे। क्योंकि, जैसा जोनाथन एडवर्ड्स ने एक बार प्रचार किया था, “अपने आप का परित्याग दुःख की जड़ और नींव को ही नष्ट करता है।” संसार के सारे दुख, शोक, परीक्षाएँ, और क्लेश का आरम्भ हमारे पहले माता-पिता में पाया जाता, जिन्होंने परमेश्वर से बढ़कर स्वयं  को चुना  (रोमियों 5:12; 8:20)। हमारे अपने बहुत से दुख उसी कड़वी जड़ से उगते हैं। यदि हम अपने दुखों को पूर्ण रीति से नष्ट करना चाहते हैं, तो उस स्वयं का परित्याग किया जाना होगा जो पाप से प्रेम करता है।

“इस संसार में सबसे गहरी खुशियाँ केवल स्वयं के इनकार के दूसरे ओर ही आती हैं।” 

यीशु जानता था कि उसका उद्देश्य सभी दुखों को समाप्त करना था। यरूशलेम की ओर के दृढ़ निश्चिय से धोखा न खाएँ (लूका 9:51)। जब यीशु ने कोड़ों, कीलों, क्रूस, भीड़, भाले और कब्र की ओर देखा, तो उसने इन सब से आगे कुछ ऐसा देखा जिसके लिए मरना योग्य था: “महिमा” (मरकुस 8:38)। और उस महिमा का एक भाग, इब्रानियों हमें बताता है, “वह आनन्द  [था] जो उसके सामने रखा था” (इब्रानियों 12:2)।

जैसा यीशु के साथ था, वैसा ही हमारे साथ भी है। इस संसार में सबसे गहन आनन्द अपने आप का परित्याग करने की दूसरी ओर ही आते हैं। वास्तव में, वह आनन्द इतना समृद्ध, इतना विस्तृत और प्रचुर है, कि प्राय: वह हमारे अपने आप का परित्याग करने के मध्य ही हमसे मिलता है। नया जीवन उदय होता है जब दूसरा मरता है; नया पौधा अंकुरित होता है जब हम पुराने की जड़ को काट ही रहे होते हैं। जिस प्रकार से हम “शोकित परन्तु सदैव आनन्द मनाते हैं,” वैसे ही हम भी “स्वयं का इनकार करते, परन्तु सदैव आनन्द मनाते हैं”(2 कुरिन्थियों 6:10)।

अपने आप का परित्याक करने की यीशु की बुलाहट में, वह सर्प की माया को तोड़ता है और हमें उस आनन्द की ओर बुलाता है जिसके लिए उसने हमें बनाया। “आओ,” वह कहता है, “स्वर्ग के राजा का अनुसरण में वास्तविक आनन्द के लिए एक आत्म-संरक्षित जीवन के सुरक्षित और छोटे सुखों को छोड़ दो। प्रकाश के लिए अन्धेरा को छोड़ दो, स्वर्ग के लिए नरक को छोड़ दो, और मुझसे प्रेम करने वाले उत्तम जीवन के लिए उस जीवन को छोड़ दो जिसे तुम बचाना चाहते हो।” उस सभी पीड़ा के होते हुए जो अपने आप का परित्याग करना लाता है, वही “अत्याधिक आनन्द” का एकमात्र मार्ग है (भजन 43:4) — क्योंकि वही मार्ग ख्रीष्ट  की ओर जाता है।

स्कॉट हबर्ड desiringGod.org के एक सम्पादक, ऑल पीपल्स चर्च के एक पास्टर, और बैतलहम कॉलेज ऐण्ड सेमिनरी के एक स्नातक हैं। वह और उसकी पत्नी बेथानी मिनियापोलिस में अपने दो बेटों के साथ रहते हैं।

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