“पकी फसल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं”।

“तब उसने अपने चेलों से कहा, पकी फसल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं। इसलिए फसल के स्वामी से विनती करो कि वह फसल काटने के लिए मज़दूर भेज दे” (मत्ती 9: 37-38)।

यीशु ख्रीष्ट किस सन्दर्भ में यह कह रहे हैं कि पकी फसल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं ? जब हम मत्ती 9 में देखते हैं, तब हम पाते हैं कि मत्ती यीशु ख्रीष्ट की तीनों प्रकार की सेवकाइयों को संक्षेप में सारांशित करता है (9:35)। अगले पद में लिखा हैं, जब यीशु ने जनसमूह का देखा उसे लोग पर तरस आया। यीशु को लोग पर क्यों तरस आया? वह उनकी वास्तविक अवस्था को देखा, जैसे वे पीड़ित थे, उदास थे और भटके हुए भेड़ों की तरह थे। यीशु ने देखा कि लोग व्यथित और असहाय थे, वे बिना चरवाहे के भेड़ के समान थे। जब यीशु ने लोगों को इस स्थिति में देखा, तब उसने अपने चेलों से कहा, “पकी फसल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं। इसलिए फसल के स्वामी से विनती करो कि वह फसल काटने के लिए मज़दूर भेज दे।” ध्यान दीजिए यहाँ पर प्रभु यीशु ख्रीष्ट आज्ञा देते हैं प्रार्थना करने के लिए। अन्ततोगत्वा यीशु ख्रीष्ट प्रार्थना करने के लिए क्यों आज्ञा देते हैं। क्योंकि पकी फसल तो बहुत है परन्तु मज़दूर थोड़े हैं।

मज़दूर कौन है? 

इस खण्ड़ के सन्दर्भ के अनुसार, मज़दूर वह है जो अपने स्वामी के अधीनता में रहकर कठिन परिश्रम करता है। मज़दूर वह है जो अपने स्वामी यीशु का अनुसरण करते हुए सच्चा सुसमाचार प्रचार करता है। मज़दूर वह है जो अपने स्वामी यीशु के समान वचन का प्रचार और शिक्षा-कार्य में लगा रहता है। मज़दूर वह है जो लोगों के प्रति दया से परिपूर्ण है। मज़दूर वह है जो परमेश्वर की ओर से भेजा जाता है। यहाँ पर जो शब्द मज़दूर के लिए अनुवाद किया गया है, जिसका अर्थ है खेत में काम करनेवाला व्यक्ति तथा श्रमिक है। सामान्य रीति से खेत में काम करने वाला व्यक्ति तथा मज़दूर कठिन परिश्रम करने वाला होता है।

यीशु ख्रीष्ट विनती करने के लिए कहते हैं, जिससे फसल का स्वामी फसल काटने के लिए मज़दूर भेज दे। यह धान या मक्के की फसल नहीं। यहाँ पर फसल का अर्थ लोगों की फसल है। लोग अनाज की फसल के समान हैं जो काटे जाने के लिए तैयार है अर्थात् जिन्हें परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना है। परन्तु काम करने वाले मज़दूर थोड़े हैं। यीशु के समयकाल में राजा हेरोदेस के लिए यह फसल नहीं थी, रोमी सरकार के लिए भी यह फसल नहीं थी। परन्तु यीशु के लिए यह फसल का समय था। 

यीशु का लोगों को देखने का दृष्टिकोण पूर्णतः भिन्न था। यीशु के समय में फरीसी और शास्त्री जो धर्मगुरू थे वे नियम और रीति-विधियों की शिक्षा दिया करते थे। यीशु ख्रीष्ट अपनी सेवाकाल के दौरान सुसमाचार प्रचार करने में और परमेश्वर के वचन से लोगों को सिखाने में लगे रहते थे। मरकुस में लिखा है, जहां पर प्रभु यीशु ख्रीष्ट कहते हैं, “आओ, हम और कहीं आस-पास की बस्तियों में जाएं कि मैं वहां भी प्रचार कर सकूं; क्योंकि मैं इसीलिए निकला हूँ” (मरकुस 1: 38)। यीशु ख्रीष्ट लोगों के प्रति दया से परिपूर्ण थे। वह लोगों को महत्व देते थे।

वर्तमान परिस्थिति और सुसमाचार का प्रचार   

जब हम वर्तमान परिस्थिति को देखते हैं, तब हम देखने पाएंगे कि आज लोग परेशान है, निराशा में है। वास्तव में आज लोग यीशु के बिना नाश हो रहे हैं, वे अनन्तकाल के लिए नरक की ओर जा रहे हैं। दु:ख की बात है, आज समकालीन ख्रीष्टीयता में देखते हैं, बहुत सारे गायक हैं, और सम्पन्नता के प्रचारक हैं। जैसे यीशु के समय में फरीसी और शास्त्री व धर्मगुरू थे। वे नियम और रीति-विधियों की शिक्षा दिया करते थे, वैसे ही आज भी कलीसिया में इन सब बातों के विषय में बल दिया जा रहा है तथा प्रचार किया जा रहा है। आज भी स्थिति बदली नहीं है। 

आज समकालीन मसीहियत में गायकों की कमी नहीं है। आज ख्रीष्टीयता में पास्टरों की कमी नहीं, संस्थापकों की कमी नहीं। बल्कि मज़दूरों की आवश्यकता है। जो अपने हाथों को गंदा करने के लिए तैयार हो सकें, जो परमेश्वर के राज्य के लिए परिश्रम करने के लिए तत्पर हों। आज सबसे बड़ी आवश्यकता ऐसे मज़दूरों की है जो अपने स्वामी तथा प्रभु यीशु का अनुकरण करते हुए सच्चा सुसमाचार प्रचार करने में लगे रहें। आज ऐसे मज़दूरों की आवश्यकता है जो लोगों से प्रेम करें और लोगों को महत्व दे। यीशु के वचन पर ध्यान दें, जो सत्य के वचन को ठीक ठीक काम लाएं। परन्तु मज़दूर थोड़े हैं। मैं आप से आग्रह करना चाहूँगा कि आप व्यक्तिगत रीति से निरन्तर प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर और अधिक मज़दूरों को अर्थात् सुसमाचार के सेवकों, विश्वासयोग्य पास्टरों को खड़ा करे।  

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