एक उत्तरदायी पास्टर होने तथा प्रचार के महत्व को समझना

पास्टर होने के नाते  “उत्तरदायी होना” शब्द, प्रायः हमारे जीवन और सेवकाई में बहुत असहज और अनावश्यक लगता है। हमें स्वतंत्र होना प्रिय लगता है अर्थात् अनु-उत्तरदायी होना प्रिय लगता है। 

इसलिए, “उत्तरदायी होना” एक आत्मिक अनुशासन है; यह कोई ऐसी बात नहीं जिसे हम अपने मन के अनुसार समय-समय पर अभ्यास करना चाहते हों या प्रिय लगता हो। न ही यह ऐसा कुछ है जो हम अपने आनन्द या मनोरंजन के लिए करते हैं। वास्तविकता तो यह है कि “उत्तरदायी होना” और इसका अभ्यास करना हमारे आत्मिक अनुशासन का एक भाग है। यह हमारे लिए कठिन और पीड़ादायक है फिर भी हमें इस अनुशासन (उत्तरदायी होने) का अभ्यास करते रहना चाहिए।

उत्तरदायी होना” क्या है?

“उत्तरदायी होने” का एक सामान्य अर्थ – स्वेच्छा से अधीनता में रहते हुए उस कार्य के प्रति अपने उत्तरदायित्व को निभाना जो हमें सौंपा गया है। स्थानीय कलीसिया के सन्दर्भ में यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि हम उत्तरदायी होने का अभ्यास करें। कलीसिया के पास्टर होने नाते हमें समझना चाहिए  कि हम इतने स्वतंत्र नहीं हैं कि हम जो चाहें वो करें और हम यह भी अपेक्षा करें कि हमसे कोई कुछ भी नहीं पूछ सकता है, क्योंकि हम  कलीसिया के अगुवे हैं। 

सेवकाई में ऐसे कई पहलू हैं जहाँ एक पास्टर को उत्तरदायी होना पड़ता है परन्तु इस कार्यशाला में हम एक पास्टर का ‘प्रचार प्रति उत्तरदायी होने” के विषय में बात करेंगे। इस उत्तरदायी होने और प्रचार करने सन्दर्भ में हम बाइबल पर आधारित बातों को देखेंगे।

प्रचार करने के कुछ गलत कारण

जब भी हम प्रचार करने की बात करते हैं, तो पहला प्रश्न यह उठता है कि “आप प्रचार क्यों करना चाहते हैं?” इसके लिए विभिन्न कारण (अच्छे और बुरे) हो सकते हैं जैसे कि…

·     मेरे माता-पिता/परिवार के सदस्यों ने मुझे प्रचार करने के लिए प्रोत्साहित किया और इसलिए मैं पास्टर बन गया हूँ।

·     मैं अन्य कार्यों में कुशल नहीं हूँ, इसलिए मैंने प्रचार करने के बारे में सोचा और इसलिए मैं पास्टर बन गया हूँ।

·     जीविकोपार्जन हेतु मैं पास्टर बन गया हूँ।

·     मुझे लगता है कि मेरे जीवन में उपदेश देने की बुलाहट है और इसलिए मैं पास्टर बन गया हूँ।

·     मुझे लगता है कि मैं प्रचार करने के लिए बुलाया गया हूँ, इसलिए मैं पास्टर बन गया हूँ।

·     मुझे दर्शन मिला कि मैं उपदेशक / पास्टर बनूँगा और इसलिए मैं पास्टर बन गया हूँ।

·     लॉकडाउन के दौरान सभी उपदेश दे रहे हैं, इसलिए मैंने भी लोगों को उपदेश देने के बारे में सोचा। इसलिए मैं पास्टर बन गया हूँ।

इसके साथ और भी कई अन्य कारण हो सकते हैं। “प्रचार करने” के गलत कारणों के साथ-साथ हमें यह भी समझना होगा कि प्रायः लोग जिसे प्रचार समझते हैं या जिसे प्रचार कहते हैं, क्या वह सही है या नहीं है। निम्नलिखित बातों के द्वारा देखेंगे कि 

प्रचार करना क्या नहीं है?

·     प्रचार करना मन में आने वाले किसी भी विषय पर आधारित नहीं होता है

·     प्रचार करना कोई व्यक्तिगत रुचि पर आधारित विषय पर नहीं होता है

·     प्रचार करना केवल एक काम ही नहीं है। 

·     प्रचार करना प्रतिभा और भाषण का प्रदर्शन करना नहीं है।

·     प्रचार करना श्रोताओं को प्रभावित करना नहीं है।

·     प्रचार करना कोई कहानी सुनाने का कार्यक्रम नहीं है।

जब हम प्रचार करने के गलत कारणों को देख रहे हैं तो हम यह भी याद रखें कि एक पास्टर / प्रचारक होने के इच्छुक व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे वह अपने लिए तय करता है या उसके बारे में कोई प्रकाशन या दर्शन प्राप्त करता है। यदि उसके अन्दर सच में एक पास्टर / उपदेशक के गुण हैं, तो वह स्थानीय कलीसिया द्वारा पहचाना और पुष्टि किया जाता है (1 तीमुथियुस 3:1-7)।

स्थानीय कलीसिया के लोग उसके जीवन को, गवाही को, गुणों को लगातार देखते हैं और फलस्वरूप उसके विषय में गवाही देते हुए सहमत होते हैं कि वह पास्टर/उपदेशक की भूमिका और उत्तरदायित्व को विश्वासयोग्यता के साथ निभा सकता है। इस इच्छा का पोषण व्यक्तिगत जीवन में करना पड़ता है और इसे स्थानीय कलीसिया में भी स्वीकृति प्राप्त करनी होती है। 

अगर यह स्थानीय कलीसिया में निरन्तर और स्पष्ट रूप से दिखता है कि उसका प्रचार अपने निजी स्वार्थ – महिमा – आदर – सम्मान – प्रशंसा के लिए नहीं है। उसके प्रचार का उद्देश्य लोगों का आत्मिक शोषण नहीं है वरन् उसका प्रचार क्रूस-केन्द्रित है और लोगों के आत्मिक उन्नति का कारण बन रहा है (1 कुरिन्थियों 14:12,26), लोगों को मसीह की प्रभुता के अधीन ला रहा है, मसीह की देह में वह लोगों को एक कर रहा है, तो स्थानीय कलीसिया में यह पुष्टि हो जाती है कि वह वास्तव में एक पास्टर/उपदेशक की भूमिका और उत्तरदायित्व को ले सकता है।  

एक पास्टर का उद्देश्य “प्रचार करना” होना चाहिए

एक पास्टर का उद्देश्य “उपदेश देना या प्रचार करना” होना चाहिए। सबसे पहले तो हमें यह समझना चाहिए कि प्रचार करना व्यक्तिगत अनुभवों, प्रेरणा देने वाले भाषणों, सुगठित वार्ताओं को साझा करने के बारे में नहीं है।  प्रचार करना दूसरों को अच्छी अनुभूति कराना नहीं है और न ही स्वयं को अच्छा अनुभव करने के लिए हम प्रचार करते हैं। प्रचार का केवल एकमात्र लक्ष्य उन शब्दों को बोलना है जो सुसमाचार की सच्चाई को व्यक्त करते हैं, जो कि “उद्धार पाने वालों के लिए परमेश्वर का सामर्थ्य है” (रोमियों 1:16)। “सुसमाचार, उद्धार के निमित परमेश्वर की सामर्थ्य है।” – मसीही समुदाय के लिए यह उस प्रकार मूल्यवान होना चाहिए जैसे कि मनुष्य के शारीरिक जीवन के लिए भोजन। 

2 तीमुथियुस 3:16-17 की सत्यता को अपने मन और हृदय में विश्वास करते हुए एक पास्टर को प्रचार करना चाहिए। उसके प्रचार के उद्देश्य की नींव इस विश्वास पर होनी चाहिए कि “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की आत्मा की प्रेरणा से रचा गया है और शिक्षा, ताड़ना, सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिए उपयोगी है जिससे कि परमेश्वर का भक्त प्रत्येक भले कार्य के लिए कुशल और तत्पर हो जाए”। एक पास्टर होने के नाते क्या हम इस बात पर ध्यान देते हैं, गम्भीर हैं, सोचते हैं और प्रयत्न करते हैं कि हमारे प्रचार में शिक्षा, ताड़ना, सुधारना और धार्मिकता की शिक्षा की बातें हैं जो लोगों को उनकी धार्मिकता की शिक्षा में आगे बढ़ा रहा है या हमारा प्रचार मनोरंजन, हँसी-मज़ाक, अपनी प्रशंसा के लिए है?

पास्टर को 2 तीमुथियुस 4:1-4 में वर्णित बातों को ध्यान में रखते हुए प्रचार की सेवकाई को देखना चाहिए। वह इससे भाग नहीं सकता है। यहां पर ध्यान किसी अन्य बातों पर हो सकता था परन्तु  यहाँ प्रेरित पौलुस “प्रचार” के विषय पर ध्यान क्यों केन्द्रित करता है? यह केवल इसलिए नहीं कि तीमुथियुस प्रचार करने में निपुण था या उसके पास दान था। यहां पर सन्दर्भ को समझना महत्वपूर्ण है। सन्दर्भ पर ध्यान दे तो पाएंगे कि यह परमेश्वर के वचन के अधिकार और पर्याप्तता के बारे में है जो विश्वासियों को धार्मिकता के जीवन में परिपक्व और दृढ़ करता है (2 तीमुथियुस 3:15-16)। सन्दर्भ ही सब बातों की कुंजी है।

परमेश्वर के वचन की पर्याप्तता पर बल देते हुए और समझाते हुए प्रेरित पौलुस अब प्रचार करने की आज्ञा देते हैं, क्योंकि परमेश्वर मूल रूप से और आधारभूत रीति से वचन के प्रचार के माध्यम से ही अपने लोगों से बात करता है। यह रुचिकर है कि अगले खण्ड में, प्रेरित पौलुस ने तीमुथियुस को “समय और असमय” प्रचार करने हेतु तैयार होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। वह उसे बता रहा है कि “सुविधाजनक और असुविधाजनक” परिस्थितियों में भी उसे प्रचार करने के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है। क्यों? केवल इसलिए नहीं कि यह उसका काम है परन्तु इसलिए, क्योंकि अंततः मसीह के झुण्ड को इसकी आवश्यकता होती है। परमेश्वर के झुण्ड के लिए  किसी भी चीज़ से अधिक आवश्यकता “वचन के प्रचार” की है और “वचन के प्रचार” के द्वारा ही एक पास्टर जो उस झुण्ड के रखवाले के लिए नियुक्त किया गया है उनको भोजन दे सकता है और भेड़ों की रखवाली कर सकता है! (यूहन्ना 21:15-17)

प्रचार के उद्देश्य में एक पास्टर को यह स्मरण रखना चाहिए कि वह अपने स्वामी का दास है और इसलिए उसे अपने स्वार्थी मनसा को, अभिलाषा को, सोच-विचार को और उद्देश्य को स्वामी के चरणों में सौंप देना चाहिए। प्रचार में अब उसकी न तो कोई मनसा होनी चाहिए, न स्वार्थ होना चाहिए, न व्यक्तिगत अभिलाषा और न ही कोई व्यक्तिगत लाभ का उद्देश्य। उसके पास कोई अधिकार नहीं है कि वह परमेश्वर के वचन के प्रचार में परमेश्वर के अलावा किसी और को तथा स्वयं को तिनके भर की महिमा दे। वह तो केवल एक सन्देशवाहक है और उससे अधिक वह कुछ भी नहीं है। अपनी स्वेच्छा को पूरी तरह से आत्मसमर्पण करना और एक दास होना होने की सच्चाई को थाम लेना एक पास्टर के लिए यह सुनिश्चित करता है कि वह उस महिमा को चुराने का प्रयत्न नहीं करेगा जो केवल परमेश्वर की है।

प्रचार करने का उत्तरदायित्व 

पास्टर को शिक्षा देने और प्रचार करने में उपयुक्त और निपुण होना चाहिए और सुसमाचार के विरुद्ध उठने वाले बातों का खण्डन करने में सक्षम होना चाहिए (1 तीमुथियुस 3: 2 b, 2 तीमुथियुस 2: 24 b, 1 पतरस 3:15 -16)।

उसे स्मरण रखना चाहिए कि प्रचार करना किसी रुचिकर काम को करना नहीं है, बल्कि यह एक उत्तरदायित्व है जिसे विश्वासपूर्वक निभाना पड़ता है। और इसके लिए वह परमेश्वर के प्रति भी उत्तरदायी होगा। यदि वह अविश्वासयोग्य पाया जाता है तो वह कठोरतम दण्ड के भागी होगा (याकूब 3:1)। उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह परमेश्वर के सम्पूर्ण अभिप्राय या इच्छा से प्रचार करे, समय और असमय प्रचार करने के लिए तैयार रहे, विश्वास की अच्छी लड़ाई लड़ें और पृथ्वी पर अपनी दौड़ समाप्त करें (प्रेरित 20:27, 2 तीमुथियुस 4: 2,7)।

मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की योजना को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करना परमेश्वर के सम्पूर्ण अभिप्राय को बताना, सिखाना और प्रचार करना है। वह ईश्वरीय सच्चाई और आधारभूत बातें जो सृष्टि, पाप, मनुष्य की वास्तविकता और पापमय प्रवृत्ति, उद्धार रूपी पृष्ट्भूमि में चुनाव, छुटकारा, धार्मिकता, लेपालकपन, शुद्धिकरण, पवित्र जीवन, महिमा प्राप्ति के सैद्धान्तिक शिक्षा देना एक पास्टर के प्रचार का विषय होना चाहिए। लेकिन अक्सर यह देखा जाता है की पास्टर अपने प्रचार में इन बातों को अनदेखा करते हैं और अपना समय बाइबल में से रहस्य और भेदों को उजागर करके लोगों के कौतुहलता को जगाने के प्रयत्न में लगे रहते हैं और बाइबल आधारित व्याख्याशास्त्र के विपरीत अपनी शिक्षाओं को तैयार करते रहते हैं।  

प्रचार करने के कर्तव्य की जब बात होती है तो यह समझना आवश्यक है कि जब एक पास्टर / उपदेशक प्रचार करने की इच्छा रखता है, उसे पवित्रशास्त्र का अध्ययन पूरी लगन से करना चाहिए ताकि वह सत्य के वचन को ठीक ठीक काम में लाना जानता हो (2 तीमुथियुस 2:15)। धर्मग्रन्थ की शिक्षाएं कथाएं और कहानी नहीं हैं, वे ऐसे शब्द हैं जो मनुष्यों को अनन्त जीवन देते हैं। परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने के लिए एक आकस्मिक और आलसी रवैया किसी काम का नहीं है। जो कोई प्रचार करने की इच्छा रखता है, उसे अपने श्रोताओं को सच्चाई प्रस्तुत करने में निपुणता दर्शानी चाहिए और उसके लिए इच्छा भी होनी चाहिए। सत्य के वचन को ठीक-ठीक काम में लाने की इच्छा यदि एक पास्टर के अन्दर नहीं पायी जाती है तो वह अपने सुनने वालों के प्रति अपने उत्तरदायित्व को नहीं निभा सकते हैं। वह अपने प्रचार करने के उत्तरदायित्व में चूक जाते हैं, इसलिए वे कठोरतम दण्ड के भागीदार होंगे (याकूब 3:1)।

एक पास्टर के लिए प्रचार के उत्तरदायित्व में यह स्मरण रखना होगा कि उसे समय और असमय वचन के प्रचार हेतु तैयार रहना होगा। उसे सतर्क रहना होगा कि कहीं लोगों की मांग / लोकप्रियता / सम्मान इत्यादि के दबाव में आकर सुसमाचार केन्द्रित सन्देश प्रचार के उत्तरदायित्व से हट न जाए। आज एक पास्टर के लिए सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वह अपने प्रचार से लोगों को असहज अनुभव न कराए और इसीलिए वह एक आकर्षक सुसमाचार प्रस्तुत करने लगते हैं। प्रेरित पौलुस कहते हैं कि क्रूस की कथा ही पर्याप्त है और क्रूस की कथा के अलावा कोई दूसरा सुसमाचार सुनने वाला श्रापित है (1 कुरिन्थियों 2:2, गलातियों 1:8-9)। जिस तरह प्रेरित पौलुस के समय यहूदी चिह्न की मांग करते थे और यूनानी ज्ञान को खोजते थे, वैसे ही आज समाज में लोगों के पास विभिन्न मांग है और वे विभिन्न चीज़ों को खोज रहे हैं। लेकिन प्रेरित पौलुस ने उन लोगों के इच्छानुसार, उनकी मांगों और खोज को पूर्ति करने के लिए सुसमाचार में फेरबदल करके, आकर्षक बनाकर सुसमाचार को प्रस्तुत किया। उन्होंने इन सब परिस्थिति में केवल एक ही बात को बताया और वह था क्रूस का सुसमाचार। यह बाइबल का पैमाना है, तरीका है, आदेश है और आज्ञा है। हमें भी यही करना होगा; कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

एक पास्टर के उत्तरदायित्व में यह बात भी सम्मिलित है कि वह अपने आप को एक उचित / आदर का पात्र / बर्तन बनकर रखें, क्योंकि यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह स्वामी के काम का नहीं ठहरेगा (2 तीमुथियुस 2:20-22)। पास्टर को एक पवित्र पात्र होना चाहिए । प्रगतिशील पवित्रता और उस जीवन को जीने के लगातार प्रयासों की इच्छा के बिना, वह परमेश्वर द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर निश्चित रूप से एक व्यक्ति के साधारण पृष्ठभूमि के बावजूद उसे उपयोग कर सकते हैं लेकिन परमेश्वर अपने चरित्र के साथ समझौता नहीं कर सकते हैं; परमेश्वर पवित्र है और वह चाहता है कि हम भी पवित्र बनें। यदि कोई व्यक्ति लगातार पाप में रह रहा है, तो वह ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता जिसे परमेश्वर एक पास्टर के रूप में उपयोग करेंगे। इसलिए एक पास्टर को पवित्रता में बढ़ने के लिए एक दैनिक लड़ाई में संलग्न होने की आवश्यकता है और यह प्रचार करने के कर्तव्य का भाग है।

परमेश्वर के वचन के प्रति प्रेम और “प्रचार करना”

एक पास्टर को परमेश्वर से प्रेम और परमेश्वर के वचन के प्रति प्रेम रखने के सम्बन्ध को समझना चाहिए। कई पास्टर परमेश्वर से प्रेम को इस प्रकार परिभाषित करते हैं:-

·     परमेश्वर से प्रेम रखने का अर्थ प्रार्थना में बहुत समय व्यतीत करना है

·     परमेश्वर से प्रेम रखने का अर्थ स्तुति-आराधना में बहुत समय व्यतीत करना है

·     परमेश्वर से प्रेम रखने का अर्थ कई स्थानों में जाकर सुसमाचार सुनाना  है। 

·     परमेश्वर से प्रेम रखने का अर्थ लोगों के समय व्यतीत करना और संगति करना है।

ये सभी परमेश्वर से प्रेम करने का भाग तो हैं परन्तु एक पास्टर को यह समझना चाहिए कि वह सर्वप्रथम परमेश्वर के झुण्ड की देखभाल करने के लिए उत्तरदायी है। वह उन्हें आत्मिक पोषण प्रदान करता है (1 पतरस 5: 1-4, 2 तीमुथियुस 4: 1-2)।

इसलिए, एक पास्टर का परमेश्वर के वचन के प्रति प्रेम वह प्रमाण व चिन्ह यह है कि वह परमेश्वर से प्रेम रखता है और परमेश्वर के वचन के प्रति प्रेम के माध्यम से ही वह परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करता है और दर्शाता भी है। 1 पतरस 5: 1-4 के अनुसार एक पास्टर को यह अच्छी तरह से समझना चाहिए कि यह झुण्ड जिसका वह रखवाला है, वह उसका नहीं है; यह झुण्ड परमेश्वर का है। ये लोग उसे सौंपे गए हैं, वह केवल रखवाला है; झुण्ड का स्वामी नहीं है। इस झुण्ड की रखवाली उसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार करनी चाहिए। झुण्ड और रखवाले का चित्रात्मक रूप प्रस्तुत करते हुए प्रेरित पतरस दर्शाना चाहते है कि जिस प्रकार एक चरवाहा झुण्ड की भेड़ों की रखवाली जंगली जानवरों से करता है, उनके भोजन का प्रबन्ध करता है ठीक वैसे ही एक पास्टर को वचन की निपुण शिक्षा देकर लोगों को तृप्त करना है और उन्हें झूठी शिक्षा से भी बचाना है। और इस उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता है। यह कठिन परिश्रम मुख्य रूप से वचन के अध्ययन के कार्य में दिखाई देता है। यह आवश्यक है पास्टर वचन को अध्ययन करने में, प्रचार की तैयारी में परिश्रम करें, समय व्यतीत करें।

अंततः परमेश्वर ने अपने नाम की महिमा और अपने लोगों की भलाई के लिए स्थानीय कलीसिया में पास्टर को नियुक्त किया है। वचन का प्रचार उनकी सेवकाई का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसलिए पास्टर को चाहिए कि वह कलीसिया में प्रचार के उत्तरदायित्व को भली-भांति विश्वासयोग्यता के साथ निभाए। परमेश्वर की महिमा सुसमाचार के प्रचार के द्वारा लोगों के सामने प्रदर्शित करे।