क्या आप यीशु के योग्य हैं?

मसीही किस अर्थ के अनुसार परमेश्वर या मसीह या अपनी बुलाहट के योग्य  हैं? और किस अर्थ के अनुसार हम अयोग्य  हैं?

एक ओर तो, यीशु और पौलुस दोनों सिखाते हैं कि हमें यीशु और उसकी बुलाहट के योग्य  होना चाहिए। 

यीशु:

  • यीशु कहता है कि “पर सरदीस में तेरे पास कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने अपने वस्त्र अशुद्ध नहीं किए हैं। वे श्वेत वस्त्र पहिने हुए मेरे साथ चलेंगे-फिरेंगे, क्योंकि वे इस योग्य हैं”। (प्रकाशितवाक्य 3:4)
  • “जो मुझ से अधिक अपने माता या पिता से प्रेम करता है, वह मेरे योग्य नहीं । जो मुझ से अधिक अपने पुत्र या पुत्री से प्रेम करता है, वह मेरे योग्य नहीं; और जो अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे नहीं चलता, वह मेरे योग्य नहीं” (मत्ती 10:37-38)।
  • “परन्तु वे जो उस युग  में प्रवेश करने और मरे हुओं में से जी उठने के योग्य ठहरे हैं, न तो शादी-ब्याह करेंगे और न करवांएगे” (लूका 20:35)।
  • “विवाह-भोज तो तैयार है, परन्तु वे जो बुलाए गए थे योग्य न निकले ” (मत्ती 22:8)। 

पौलुस:

  • “पश्चाताप करके परमेश्वर की ओर फिरें और मन-फिराव के योग्य  काम करें” (प्रेरितों के काम 26:20)। इसी प्रकार, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला ने कहा था, “इसलिए अपने पश्चाताप के योग्य  फल भी लाओ” (मत्ती 3:8)। 
  • पिसिदिया के अन्ताकिया में यहूदियों से, पौलुस ने कहा, “यह अवश्य था कि परमेश्वर का वचन पहिले तुम्हें सुनाया जाता, परन्तु इसलिए कि तुम उसकी अवहेलना करते हो तथा अपने आप को अनन्त जीवन के अयोग्य ठहराते हो तो देखो, हम ग़ैरयहूदियों की ओर फिरते हैं” (प्रेरितों के काम 13:46)। 
  •  “जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए हो उसके योग्य  चाल चलो” (इफिसियों 4:1)।
  • “तुम्हारा आचरण मसीह के सुसमाचार के योग्य  हो” (फिलिप्पियों 1:27)।
  • “तुम्हारा चाल-चलन प्रभु के योग्य  हो जाए” (कुलिस्सियों 1:10)।
  • “परमेश्वर के योग्य  चलो” (1 थिस्सलुनीकियों 2:12)।
  • “परमेश्वर तुम्हें अपनी बुलाहट के योग्य समझे, तथा भलाई की हर एक इच्छा को और विश्वास के हर एक कार्य को सामर्थ्य सहित पूरा करे” (2 थिस्सलुनीकियों 1:11)।
  • “यह परमेश्वर के सच्चे न्याय का स्पष्ट संकेत है कि तुम परमेश्वर के राज्य के योग्य ठहराए जाओ, जिसके लिए तुम सचमुच दुख उठा रहे हो” (2 थिस्सलुनीकियों 1:5)।

इन सभी खण्डों में, योग्य होना  मसीही जीवन में अपेक्षित और अनिवार्य है। 

परन्तु दूसरी ओर, यीशु ने सूबेदार के अनूठे विश्वास की सराहना की क्योंकि उसने विनम्रतापूर्वक अपनी अयोग्यता  को स्वीकार किया था। “हे प्रभु अपने को अधिक कष्ट न दे, क्योंकि मैं इस योग्य  नहीं कि तू मेरी छत के तले आए”…. यीशु ने कहा, “मैं तुमसे कहता हूं कि इस्राएल में भी मैंने ऐसा बड़ा विश्वास नहीं पाया” (लूका 7:6,9)।

और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने यीशु के बारे में कहा, “यह वही है जो मेरे पश्चात आने वाला है और जिसकी जूती का बँध खोलने के योग्य मैं नहीं हूँ” (यूहन्ना 1:27)।

हम अपने पापों को ध्यान में रखते हुए कैसे समझें कि हम यीशु के योग्य हैं?

पश्चात्ताप  के योग्य 
जो कुंजी इस रहस्य को खोलती है वह इस वाक्यांश में पायी जाती है “पश्चात्ताप के योग्य फल लाओ” (प्रेरितों के काम 26:20; मत्ती 3:8; लूका 3:8)। इसका अर्थ यह नहीं है “ऐसा फल लाओ जो पश्चात्ताप के उचित सुपात्र  हो”, क्योंकि पश्चात्ताप वहाँ पहले से ही उपस्थित है। यह पहले आता है: “पश्चात्ताप  करें और परमेश्वर की ओर फिरें, मन फिराव के योग्य  काम करें” (प्रेरितों के काम 26:20)।

हम अपने पापों को ध्यान में रखते हुए कैसे समझें कि हम यीशु के योग्य हैं?

“पश्चात्ताप के योग्य” होने का अर्थ है: पश्चात्ताप में इस प्रकार की योग्यता  है कि जो फल वह उत्पन्न करता है वह उसकी योग्यता में सहभागी होगा। “पश्चात्ताप के योग्य फल” का अर्थ है पश्चात्ताप की सुन्दरता और उसके फल की सुन्दरता के बीच में एक उपयुक्त समानता का होना। सब बातों से परमेश्वर की ओर फिरना, और सब बातों की तुलना में परमेश्वर को आदर देना ही पश्चात्ताप है। और यह मनोहर बात है। और इसी के लिए मनुष्यों को बनाया गया था। और यही योग्यता का अर्थ है।  

इसके पश्चात, सभी वस्तुओं की तुलना में परमेश्वर को अपने भीतर बहुमूल्य जानना कार्यों में फलवन्त होता है। और ये कार्य परमेश्वर के सर्वोच्च मूल्य को प्रतिबिम्बित करते हैं। और इसलिए वे भी, अपनी सम्पूर्ण असिद्धता में भी, योग्य हैं। उनकी योग्यता पश्चात्ताप को प्रतिबिम्बित करती है, जो कि परमेश्वर के असीम योग्यता का एक प्रतिबिम्ब है। 

इसलिए पश्चात्ताप के योग्य होने  का अर्थ “पश्चात्ताप के उचित सुपात्र” होना नहीं है, मानो कि हमने इसे अर्जित किया है या इसे पाने के योग्य हैं। 

यीशु के शब्दों को समझना 
यह यीशु के शब्दों की पहेली को हल करता है, “जो मुझ से अधिक अपने माता या पिता से प्रेम करता है, वह मेरे योग्य नहीं है” (मत्ती 10:37)। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम यीशु को पाने के उचित सुपात्र  हैं, या यीशु के योग्य  हैं या यीशु को अर्जित  करते हैं। ऐसा हम कुछ भी नहीं करते हैं जो हमें ऐसी स्थिति में लाता है कि वह हमारा ऋणी हो जाए हमारे लिए कुछ भी भला करने के लिए।

जब यीशु कहता है कि हम उसके योग्य नहीं  हैं यदि हम अपने माता-पिता या बच्चों तथा जीवन को उससे अधिक बहुमूल्य जानते हैं तो, उसके कहने का अर्थ है कि उसकी  योग्यता असीम है (माता-पिता और बच्चों और जीवन से बढ़कर), और हमारी ओर से एकमात्र उपयुक्त (योग्य ) प्रतिउत्तर है कि हम इस बात को देखें, और उसे अपने सर्वोच्च कोष के रूप में प्राथमिकता दें। 

उसकी योग्यता को देखने में ही हमारी योग्यता है
इस प्रकार, उसकी योग्यता के लिए हमारी प्राथमिकता में ही हमारी योग्यता पाई जाती है। यीशु के असीम योग्यता के योग्य होना का तात्पर्य है कि उसे असीमित रीति से योग्य देखें और उसका रसास्वादन करें। यह उसे अर्जित करना या उसके योग्य होना या उसके उचित सुपात्र होना नहीं है।

यीशु के असीम योग्यता के योग्य होना का तात्पर्य है कि उसे असीमित रीति से योग्य देखें और उसका रसास्वादन करें।

वास्तव में, हम जैसे पापियों के प्रति उसका अनुग्रह  उसकी सुन्दरता का एक पहलू है जिसे हम सर्वोत्तम रूप से संजोते हैं। एक अनुग्रहकारी  उद्धारकर्ता के “योग्य” होने में वही अयोग्यता की भावना सम्मिलित होती है जो कि सूबेदार (लूका 7:6) तथा यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले (यूहन्ना 1:27) के अंगीकारों में पाई जाती है। 

आप अनुग्रह के योग्य  तब होते हैं (अनुग्रह के उपयुक्त  लाभार्थी) जब आप अनुग्रह के लिए अपनी आवश्यकता को देखते हैं, और जब आप उस अनुग्रहकारी की असीम योग्यता का आलिंगन करते हैं। इस अर्थ में, यदि आप यीशु से अधिक अपने माता या पिता या पुत्र या पुत्री या अपने स्वयं के जीवन से प्रेम करते हैं, तो आप उसके योग्य नहीं हैं। सभी वस्तुओं से बढ़कर उसके अनुग्रहपूर्ण योग्यता के लिए आपकी अतिआवश्यक प्राथमिकता ही आपकी  योग्यता है।

भोज की योग्यता का आलिंगन करना 
विवाह भोज की कहानी में इसकी पुष्टि की गई है। यीशु ने कहा, “स्वर्ग के राज्य की तुलना एक राजा से की जा सकती है जिसने अपने पुत्र के विवाह का भोज दिया। उसने भोज में आमन्त्रित लोगों को बुलाने के लिए अपने दास भेजे” (मत्ती 22:3-4)। 

किन्तु वे नहीं आते हैं। वे “चले गए, एक अपने खेत को तो दूसरा अपने व्यापार को” (मत्ती 22:5)। इसलिए राजा ने उन सभी के लिए द्वार खोल दिए जो आएंगे तथा उसने अपने दूतों को उन सभी को निमंत्रण देने के लिए भेज दिया (मत्ती 22:9)। परन्तु इससे पहले कि वह ऐसा करता, वह कहता है, “विवाह-भोज तो तैयार है, परन्तु वे जो बुलाए गए थे योग्य न निकले  (मत्ती 22:8)।

यह उस स्थिति के ठीक समान है जहां यीशु ने कहा, “जो मुझ से अधिक अपने पुत्र  या पुत्री  से प्रेम करता है, वह मेरे योग्य नहीं है।” किन्तु यहाँ वह केवल यह कह रहा है, “जो कोई भी मुझसे अधिक अपने खेत  या व्यापार  से प्रेम करता है, वह मेरे योग्य नहीं है।” तो सिद्धांत यहां पर वही है। विवाह-भोज के उचित सुपात्र होना यह नहीं है कि हमने उसे अर्जित किया है, या हम उसके योग्य हैं। विवाह-भोज के योग्य होने का तात्पर्य है अपने खेत और व्यापार से बढ़कर विवाह-भोज को प्राथमिकता देना। 

अतिथियों के द्वारा विवाह-भोज की योग्यता को स्वीकारना उनकी योग्यता को दर्शाता है। 

उसकी योग्यता सब वस्तुओं से बढ़कर है
मैं आपको अन्य खण्डों पर इस सिद्धान्त को लागू करने के लिए आमन्त्रित करता हूँ, जैसे कि बुलाहट के योग्य  चाल चलने के लिए आज्ञा (इफिसियों 4:1), और सुसमाचार के योग्य  होना (फिलिप्पियों 1:27), और प्रभु के योग्य होना (कुलुस्सियों 1:10), और परमेश्वर के योग्य होना (1 थिस्सलुनीकियों 2:12), और परमेश्वर के राज्य के योग्य होना (2 थिस्सलुनीकियों 1:5)। 

हमारी योग्यता इस बात पर आधारित है कि वह जो असीमित रीति से योग्य है उसको हम देखें तथा उसका रसास्वादन करें।

प्रत्येक परिस्थिति में हम यह पाते हैं कि हमारी योग्यता हमारे सुपात्रता या गुण या उपार्जन पर आधारित नहीं है, किन्तु हमारी योग्यता इस बात पर आधारित है कि वह जो असीमित रीति से योग्य है उसको हम देखें तथा उसका रसास्वादन करें। हमारी  योग्यता इसमें ही है कि हम उसको प्राथमिकता दें जिसकी योग्यता सभी वस्तुओं से कहीं बढ़कर है ।

हम प्रभु और उसकी बुलाहट तथा उसके राज्य के योग्य नहीं हैं, और न ही उसे अर्जित कर सकते हैं और न ही उसके सुपात्र हैं। परन्तु हमारी आवश्यकता में, हमें परमेश्वर उनको असीम रूप से बहुमूल्य — असीम रीति से योग्य — देखने की अनुमति देता है। और हम उन्हें हार्दिक इच्छा के साथ स्वीकार करते हैं। हम उन्हें सब वस्तुओं से बढ़कर प्राथमिकता देते हैं। हम उन्हें संजोते हैं। हम उन्हें ग्रहण करते हैं। हम भरोसा करते हैं। “प्रभु के योग्य होने” का अर्थ यही है।

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।
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