हमें अपने शत्रुओं से प्रेम क्यों करना चाहिए?­­­­­­­

“अपने शत्रुओं से प्रेम करो, जो तुम से घृणा करते हैं उनकी भलाई करो।” (लूका 6:27)

इसके दो मुख्य कारण हैं कि क्यों मसीहियों को अपने शत्रुओं से प्रेम करना चाहिए और उनका भला करना चाहिए ।

पहला कारण यह है कि परमेश्वर जैसा है उसके विषय में यह कुछ बताता है। परमेश्वर दयालु है।

  •    वह अपना सूर्य भलों और बुरों दोनों पर उदय करता है, और धर्मियों तथा अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है । (मत्ती 5:45)
  •    उसने हमारे पापों के अनुसार हमसे व्यवहार नहीं किया, न हमारे अधर्म के अनुसार हमें बदला दिया। (भजन संहिता 103:10)
  •    एक-दूसरे के प्रति दयालु और करुणामय बनो, और परमेश्वर ने मसीह में जैसे तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो (इफिसियों 4:32)।

इसलिए, जब मसीही लोग परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा इस प्रकार से जीवन व्यतीत करते हैं, तो हम इस विषय में कुछ दर्शाते हैं कि परमेश्वर कैसा है।

दूसरा कारण यह है कि मसीहियों के हृदय परमेश्वर से सन्तुष्ट होते हैं तथा प्रतिशोध या स्वयं की उन्नति या धन या सांसारिक सुरक्षा की लालसा से प्रेरित नहीं होते हैं।

परमेश्वर हमारा पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान करने वाला ख़ज़ाना बन गया है इस कारण हम अपने विरोधियों से अपनी आवश्यकता और असुरक्षा की भावना के आधार पर नहीं व्यवहार करते हैं, परन्तु हम अपनी पूर्णता के आधार पर परमेश्वर की सन्तुष्टिदायक महिमा के साथ व्यवहार करते हैं।

इब्रानियों 10:34, “तुम ने अपनी सम्पत्ति के जब्त किए जाने को यह जान कर सहर्ष स्वीकार किया [अर्थात, यदि तुमने अपने विरोधियों के विरुद्ध बदला नहीं लिया], कि तुम्हारे पास और भी अधिक उत्तम और चिरस्थाई सम्पत्ति है।” जो हमारे बदले की बाध्यता को दूर करती है, वह हमारा दृढ़ विश्वास है कि यह संसार हमारा घर नहीं है तथा परमेश्वर ही हमारा पूर्ण निश्चित और सर्व-संतोषजनक प्रतिफल है। “हम जानते हैं कि हमारे पास और भी अधिक उत्तम और चिरस्थाई सम्पत्ति है।”

इसलिए, हम अपने शत्रु से प्रेम करने के इन दोनों कारणों में एक मुख्य बात को देखते हैं: कि परमेश्वर को जैसा कि वह सच में है वैसे ही एक दयालु परमेश्वर के रूप में और महिमामय रीति से सर्वसन्तोषजनक दिखाया गया है।

दयालु होने की सामर्थ्य यह है कि हम अपने ऊपर हुई परमेश्वर की दया से सन्तुष्ट हैं। और दयालु होने का सर्वोत्तम कारण परमेश्वर की महिमा करना है, अर्थात्, दूसरों की सहायता करना कि वे परमेश्वर की दया के लिए उसकी बड़ाई करें। हम यह दिखाना चाहते हैं कि परमेश्वर महाप्रतापी है। हम चाहते हैं कि परमेश्वर की दया से हमारा प्रेम, परमेश्वर को मनुष्य की दृष्टि में महान बनाए। 

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।
Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email
Share on facebook
Share on twitter