बाइबल आधारित प्रार्थना के लिए रुकावट

मसीह जीवन में प्रार्थना का एक बड़ा महत्व है। हम सभी इस बात पर विश्वास करते हैं कि हमें हर दिन प्रार्थना करनी चाहिए और बाइबल भी यह शिक्षा देती है। यदि प्रार्थना को लेकर हमारी समझ सही नहीं है तो हो सकता है कि हमारी प्रार्थना का उद्देश्य और तरीका भी सही न हो। इसलिए यह आवश्यक है कि हम प्रार्थना के विषय में बाइबल पर आधारित सही समझ रखें, जिसके फलस्वरूप हम अपने जीवन में बाइबल आधारित प्रार्थना कर सकें। इस लेख में हम कुछ ऐसी बातों को देखेंगे जो बाइबल आधारित प्रार्थना के लिए रुकावट बनती हैं। 

स्वःकेन्द्रित प्रार्थना – केवल अपने जीवन की अभिलाषा, स्वार्थ और इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करना एक स्वःकेन्द्रित जीवन कहलाता है। जब हम अपने जीवन में संसार के अनुसार जीने के प्रयास में लग जाते हैं तो अधिकाशतः हमारी प्रार्थनाएं स्वयं के लिए होती हैं और कई बार हमारी प्रार्थनाओं का उद्देश्य बुरा होता है।  याकूब 4:3 में लिखा है कि, “तुम मांगते तो हो पर पाते नहीं, क्योंकि बुरे उद्देश्य से मांगते हो, कि अपने भोग-विलास में उड़ा दो।” यह हमारे लिए चेतावनी स्वरूप है कि हमारी प्रार्थना स्वयं के आराम और भोग-विलास के लिए तो नहीं हैं? परमेश्वर ऐसी प्रार्थना को ग्रहण नहीं करता है। परन्तु अब परमेश्वर का वचन हमें याकूब 5:16 में  सिखाता है कि एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करो।  जब हम केवल अपने लिए और अपने  परिवार के लिए ही प्रार्थना करते हैं चाहे वह भौतिक हो या आत्मिक, तो वह हमें बाइबल पर आधारित प्रार्थना करने में बाधा पहुँचाता है।   

जब हम केवल अपने लिए और अपने  परिवार के लिए ही प्रार्थना करते हैं चाहे वह भौतिक हो या आत्मिक, तो वह हमें बाइबल पर आधारित प्रार्थना करने में बाधा पहुँचाता है।

प्रार्थना के प्रति दिखावटी दृष्टिकोण-  दिखावे के उद्देश्य से की जाने वाली प्रार्थना परमेश्वर को भाती नहीं है और न ही इससे परमेश्वर की महिमा होती है। कई बार हम दिखावे की प्रार्थना की परीक्षा में गिर जाते हैं और हम परमेश्वर की आराधना के लिए नहीं, परन्तु मनुष्यों को प्रसन्न करने वाली प्रार्थना करने लगते हैं। ऐसा सम्भव है कि भले ही हमारे शब्दों में हम परमेश्वर को महिमा, आदर और धन्यवाद देते हों या प्रार्थना में प्रभावशाली शब्दों का उपयोग करते हों, परन्तु वास्तव में हमारे हृदय परमेश्वर से दूर हों। हमारे प्रभु यीशु, शिष्यों को निर्देश देते हुए कहते हैं कि “जब तू प्रार्थना करे तो पाखण्डियों के सदृश न हो, क्योंकि लोगों को दिखाने के लिए आराधनालयों और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको प्रिय लगता है…”(मत्ती 6:5)। इसलिए हमें सतर्क रहना चाहिए और अपने हृदय को तथा अपनी प्रार्थना की मनसाओं की जांच करना चाहिए कि कहीं हमारी प्रार्थना दिखावटी तो नहीं है। क्या ये प्रार्थना दूसरों के निर्माण के लिए और परमेश्वर की महिमा के लिए है या नहीं?  

पिता की इच्छा के अनुसार न माँगना – परमेश्वर ने अपने वचन में अपनी इच्छा को विश्वासियों के लिए प्रकट कर दिया है। इसलिए हमको उसके वचन के अनुसार प्रार्थना भी करना चाहिए। “और जो साहस हमें उसके सम्मुख होता है वह यह है; कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ मांगें, तो वह हमारी सुनता है” (1यूहन्ना 5:14)। यह पद अनन्त जीवन के सन्दर्भ में है। जो हम विश्वासियों को पहले ही मिल चुका है। कई बार हम पिता की इच्छा को जानने का प्रयास नहीं करते हैं। हमें लगता है कि वह हमारा स्वर्गीय पिता है। हम जो चाहेंगे वह हमें दे देगा। हम उसके वचनों का उपयोग परमेश्वर की इच्छा को जानने के लिए नहीं करते हैं, परन्तु हम वचनों का उपयोग अपनी प्रार्थना में अनुचित अपेक्षा हेतु करते हैं। हम परमेश्वर से अपेक्षा रखते हैं कि वह उन वचनों के आधार पर हमारी प्रार्थना को सुने और उत्तर दे। 

वचन का सही अर्थ न समझना, वचन के सन्दर्भ को अनदेखा करना, बाइबल के चरित्रों के साथ अपनी तुलना करते हुए यह आशा करना कि परमेश्वर ने जिस प्रकार बाइबल में लोगों के जीवन में काम किया, उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर दिया वैसे ही हमारे साथ भी हो; ऐसा करना पिता की इच्छा के अनुसार माँगना नहीं है। इस प्रकार से परमेश्वर से प्रार्थना में अनुचित अपेक्षा रखना भी बाइबल पर आधारित प्रार्थना के प्रति रुकावट बन जाती है।

अतः हम सतर्क रहें कि हमारी प्रार्थनाएं कहीं सवःकेन्द्रित, दिखावटी और परमेश्वर की इच्छा के विपरीत न हो। वचन पर आधारित प्रार्थना को परमेश्वर ग्रहण करता  है और यह हमारे आत्मिक जीवन के लिए लाभदायक भी है।