कलीसिया का उद्देश्य परमेश्वर के ज्ञान को प्रकट करना है।
यीशु ने कहा, “मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल नहीं होंगे.” यदि कलीसिया यीशु मसीह के लिए इतनी महत्वपूर्ण है तो फिर हमें पूछना चाहिए कि “अन्ततः कलीसिया का उद्देश्य क्या है?” बहुत से लोग भिन्न तरह से इस प्रश्न का उत्तर देते हैं। कुछ कहते हैं कि कलीसिया का मुख्य उद्देश्य समाज में लोगों की सहायता करना, दबे कुचलें लोगों के उत्थान के लिए कार्य करना है। परन्तु हमें प्रश्न पूछना चाहिए कि परमेश्वर का वचन इस बारे में क्या कहता है। कलीसिया के उद्देश्य को समझने के लिए परमेश्वर के वचन से हम कई उद्देश्यों पर चर्चा कर सकते हैं। हम यहाँ पर उन में से केवल एक विचार पर चर्चा करेंगे।

कलीसिया का उद्देश्य: परमेश्वर का विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रकट करना। “कि अब कलीसिया के द्वारा परमेश्वर का विभिन्न प्रकार का ज्ञान उन प्रधानों और अधिकारियों पर जो आकाश में हैं प्रकट किया जाए” (इफिसियों 3:10) यदि हम सन्दर्भ पर ध्यान दें तो 3 अध्याय में, पौलुस बताता है कि परमेश्वर ने एक रहस्य को प्रकाशित किया है। वह रहस्य यह है कि अब गैर-यहूदी भी देह के अंग एवं सह-उत्तराधिकारी तथा प्रतिज्ञा के सहभागी हैं (पद 6)। अब यहूदी एवं गैर-यहूदी दोनों से मिलकर परमेश्वर का घराना अर्थात् कलीसिया बनी है। इसके बाद में, पौलुस 10वें पद में बताता है कि परमेश्वर ने कलीसिया के द्वारा विभिन्न प्रकार का ज्ञान प्रकाशित किया है। इस वाक्यांश—‘परमेश्वर का विभिन्न प्रकार का ज्ञान’ आरम्भिक कलीसिया के कलीसियाई पिता- निस्सा शहर के ग्रेगरी ने इस वाक्यांश पर लाभदायक टिप्पणी की है। “उसके लिए यह खण्ड मसीही जीवन में दिखाई देने वाले विरोधाभासों- मृत्यु द्वारा सृजित जीवन, अनादर द्वारा महिमा की प्राप्ति, श्राप द्वारा आशीर्वाद, दुर्बलता द्वारा शक्ति, एवं इस प्रकार की अन्य बातों का वर्णन करता है।[1]” वह दिखाता है कि परमेश्वर की बुद्धि मनुष्य की बुद्धि एवं ज्ञान से बहुत अधिक परे है।

इसके साथ ही साथ पौलुस बताता है कि इस प्रकाशन के श्रोतागण आकाश के प्रधान और अधिकारी हैं। शैतान ने परमेश्वर के लोगों को नाश करने का प्रयास किया परन्तु पौलुस दिखाता है कि “जिन विरोधी शक्तियों ने परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ना चाहा था और उन्हें लगा भी कि वे यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के द्वारा वे अपनी योजना में सफल भी हो गए (परन्तु पुनरुत्थान से पता चला कि वे तो परमेश्वर की योजना को पूरा कर रहे थे।) यहाँ पर परमेश्वर का वह ज्ञान जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी, प्रकट हुआ।”[2] परमेश्वर ने कलीसिया की स्थापना करके शैतान का खुल्लम-खुल्ला तमाशा बना दिया। कलीसिया परमेश्वर के रहस्य का मूर्त प्रकटीकरण है।

यदि हमने परमेश्वर के इस उद्देश्य को नहीं समझा है तो हमने कलीसिया के उद्देश्य को नहीं समझा है। परिणामस्वरूप, हम कलीसिया में सहभागी होने के सौभाग्य को नहीं समझेंगे। न ही हम हर्षित हृदय से परमेश्वर की महिमा तथा बड़ाई के लिए प्रेरित होंगे। यदि आप मसीही हैं तो मैं आपको यह सत्य स्मरण दिलाकर उत्साहित करना चाहता हूँ कि यीशु मसीह ने कलीसिया के लिए मृत्यु को चूम लिया। जब हम और आप कलीसिया को देखते हैं तो हमें विस्मय से भर जाना चाहिए कि परमेश्वर का विभिन्न प्रकार का ज्ञान कितना अद्भुत है।


[1] Barth, Markus. Ephesians: Introduction, Translation, and Commentary on Chapters 1–3. Vol. 34. New Haven; London: Yale University Press, 2008. Print. Anchor Yale Bible.

[2] Clinton E. Arnold, Ephesians, First Edition edition (Grand Rapids, Mich: Zondervan Academic, 2010), 197.