जब प्रत्येक व्यक्ति आपको त्याग देता है

जब प्रत्येक व्यक्ति आपको त्याग देता है

पहली बार मेरे पक्ष के समर्थन में किसी ने भी मेरा साथ नहीं दिया, परन्तु सब ने मुझे त्याग दिया था। काश, उनको इसका लेखा न देना पड़े! परन्तु प्रभु मेरे साथ खड़ा हुआ और उसने मुझे सामर्थ्य दी कि सुसमाचार का मेरे द्वारा पूरा पूरा प्रचार हो जिस से सब अन्यजातियां सुनें। मैं तो सिंह के मुंह से छुड़ाया गया। प्रभु मुझे प्रत्येक दुष्कर्म से छुड़ाएगा और अपने स्वर्गीय राज्य में सुरक्षित पहुंचाएगा। उस की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन। (2 तीमुथियुस 4:16-18)

आज सवेरे मैं इन भव्य और हृदय विदारक वचनों पर ठहरा हुआ था। पौलुस रोम में बंदी है। जहाँ तक हम जानते हैं, वह कभी भी मुक्त नहीं किया गया। उसके अन्तिम पत्र का समापन इस प्रकार से होता है।

विचार कीजिए और चकित होइए !

वह त्यागा हुआ है: “किसी ने भी मेरा साथ नहीं दिया।” वह एक वृद्ध व्यक्ति है। एक विश्वासयोग्य सेवक है। घर से बहुत दूर एक पराए नगर में। शत्रुओं से घिरा हुआ। मृत्यु के संकट में। क्यों? उत्तर: इसलिए ताकि वह इस बहुमूल्य वाक्य को हमारे निरुत्साहित, या भयभीत या एकल प्राणों के लिए यह लिख सके: “परन्तु प्रभु मेरे साथ खड़ा रहा !”

ओह, मैं उन वचनों से कितना प्रेम करता हूँ! जब आप घनिष्ठ मित्रों द्वारा त्याग दिए जाते हैं, तो क्या आप परमेश्वर के विरुद्ध दुहाई देते हैं? क्या आपके जीवन में जो लोग हैं, क्या वास्तव में, वे आपके ईश्वर हैं? या आप इस भव्य सत्य में साहस पाते हैं: “मैं युग के अन्त तक, सदैव तुम्हारे साथ हूं” (मत्ती 28:20) — चाहे कोई भी आपको त्यागे? क्या आप इस अटल शपथ से अपने हृदय को दृढ़ करते हैं: “मैं तुझे कभी न छोड़ूंगा और न ही कभी त्यागूंगा” (इब्रानियों 13:5)?

तो आइए हम कहें, “प्रभु मेरे साथ खड़ा रहा!”

प्रश्न: 2तीमुथियुस 4:18 में क्या संकट में पाया गया? उत्तर: कि सम्भवतः पौलुस प्रभु के स्वर्गीय राज्य को प्राप्त नहीं कर पाएगा! परन्तु संकट के विरुद्ध पौलुस दुहाई देता है कि, “प्रभु मुझे . . . अपने स्वर्गीय राज्य में सुरक्षित पहुंचाएगा।”

प्रश्न: पौलुस का स्वर्गीय राज्य को पाना कैसे संकट में था? उत्तर: “दुष्कर्म।” “प्रभु मुझे प्रत्येक दुष्कर्म  से  छुड़ाएगा और अपने स्वर्गीय राज्य में सुरक्षित पहुंचाएगा।”

प्रश्न: पौलुस के स्वर्गीय राज्य की प्राप्ति में कैसे दुष्कर्म संकट डाल सकता है?

उत्तर: उसको प्रलोभन में डालकर कि वह अनाज्ञाकारिता के द्वारा मसीह के प्रति अपनी निष्ठा को त्याग दे।

प्रश्न: क्या यह प्रलोभन “सिंह का मुंह” था जिससे वह छुड़ाया गया था? उत्तर: हाँ। “तुम्हारा शत्रु शैतान गर्जने वाले सिंह की भांति इस ताक में रहता है कि किसको फाड़ खाए। विश्वास में दृढ़ रहकर उसका विरोध करो”(1 पतरस 5:8–9)।

प्रश्न: तो महिमा किसको प्राप्त होती है कि पौलुस इस शैतानी प्रलोभन के अधीन नहीं हुआ, परन्तु विश्वास और आज्ञाकारिता में अन्त तक बना रहा? उत्तर: “उसी की  [प्रभु] की महिमा और अधिकार युगानुयुग हैं” (1 पतरस 5:10)। “उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन” (2 तीमुथियुस 4:18)।

प्रश्न: क्यों? क्या यह पौलुस नहीं था जो दृढ़ खड़ा रहा? उत्तर: “प्रभु  मेरे साथ खड़ा रहा और उसने मुझे सामर्थ्य दी!”

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