जब परमेश्वर हमारा गढ़ है तो भयभीत क्यों होना?

आज, कोरोना वायरस की महामारी हमारे देश पर कहर ढा रही है। अनगिनत लोग वायरस से संक्रमित हो रहे हैं और हर दिन मृत्यु दर बढ़ रही है। यह दुखद और हृदय तोड़ने वाली बात है। यह दर्शाता है कि हम वास्तव में अपनी सारी उपलब्धियों के बाद भी कितने असहाय हैं। परन्तु, यह महामारी शारीरिक रूप से जितनी क्षति पहुँचा रही है, उससे अधिक लोग हैं जिनको भय और घबराहट ने जकड़ लिया है। दुर्भाग्य वश, कुछ समाचार चैनल भय फैलाने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर रहे हैं। अनगिनत लोग टेलीविजन से चिपके होने के कारण जो देखते हैं उससे नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रहे हैं। क्योंकि वे लगातार भीषण दृश्यों को देख रहे हैं, वे इस भय के साथ जी रहे हैं कि जो वे देख रहे हैं वही उनके साथ भी होगा। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हमें वास्तविकता से अनभिज्ञ होना चाहिए या दुःख के प्रति सहानुभूति नहीं होनी चाहिए। परन्तु उससे कहीं अधिक बढ़कर, हम ख्रीष्टियों को उन सब की सहायता करनी चाहिए जो वर्तमान समय में आवश्यकता में हैं। परन्तु, नकारात्मक सूचना के भय-भ्रामक प्रकार के आदि होने से प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न होता है।

यीशु अपनी मानवता में व्यथित था कि क्रूस पर उसके साथ क्या होने वाला है और प्रार्थना में पिता के पास गया।

इसके सम्बन्ध में हमारा मस्तिष्क कैसे कार्य करता है, इसके बारे में थोड़ा विस्तार से बताता हूँ। हमारा दिमाग एक विचित्र चीज़ है। यह एक प्रकार की निर्माणशाला है जो सभी प्रकार की भावनाओं और प्रतिक्रियाओं का उत्पादन करता है। कुछ अच्छे हैं और कुछ बुरे हैं। इस बात पर निर्भर करता है कि आप क्या देखते हैं और किन बातों को जान रहे हैं, उसके आधार पर, आपके पास एक समान प्रतिक्रिया होती है जो आपके मस्तिष्क के भीतर होती है। उदाहरण के लिए, यदि आप सुन्दर दृश्य देखते हैं, तो उस पर अविलम्ब और स्वाभाविक प्रतिक्रिया उत्तेजना के भाव में प्रतिक्रिया करना है। यदि आप किसी व्यक्ति को लहू से लत-पथ लेटे हुए देखते हैं, तो आप भय और विभीषक प्रतिक्रिया ही देंगे। जब आप 10 साल की उस लड़की के बारे में सुनते हैं, जिसका कुछ पुरुषों ने मिलकर बलात्कार किया और फिर हत्या कर दी थी तो आप का खून उबल पड़ता है। यदि आप कंप्यूटर पर पोर्नोग्राफ़ी देखने में लग गए हैं, तो यह समझने के लिए  कोई कठिन बात नहीं होगी कि आपका मस्तिष्क सभी प्रकार की कामुकता की लालसा के विचारों से भरा है। इन सभी स्थितियों में, आपने जो देखा और सुना है, उसके आधार पर आपके मस्तिष्क में उसी के अनुरूप प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इसलिए, यदि आप लगातार ऐसे समाचार चैनल देख रहे हैं जो केवल मरने वाले लोगों के दृश्य दिखाते हैं, तो स्वाभाविक है कि आपका मन भय से ग्रसित हो जाएगा।

जब भय हमें जकड़ लेता है, तो यह लगभग वैसा ही है जैसे कि उसने हमारा गला पकड़ लिया हो और जो  हमारी सोचने की क्षमता को कम कर देता है। जब हम भय के कारण हिला दिए जाते हैं, तो हम मानसिक रूप से असक्षम हो जाते हैं। जब भय हमारे मन पर प्रबल हो जाता है, तब हम सतर्क नहीं होते हैं। हम निराश हो जाते हैं। अंतत: भय ही विजयी होता है और हम उससे उत्पीड़ित व्यक्ति बन जाते हैं।

तो, स्वर्ग और पृथ्वी के सम्प्रभु परमेश्वर को मानने वाले ख्रीष्टियों को कैसे हमारे चारों ओर की स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया देना चाहिए? मैं आपको चार सुझाव दूँगा:

1. अपने भय को स्वीकार कीजिए
यह स्मरण दिलाया जाना उत्साहजनक है कि जिस परमेश्वर की हम आराधना करते हैं, वह कोई काम कराने वाला कठोर नियुक्त मुखिया नहीं है, जो अपने नियमों का पालन करने में विफल हो जाने  वालों को दण्डित करने के लिए सदैव तत्पर रहता है। वह अवश्य ही प्रसन्न होता है जब उसकी सन्तानें उसके पद चिन्हों (उसकी आज्ञाओं) पर चलती हैं और जब वे नहीं चलती हैं तो वे अनुशासित की जाती हैं (इब्रानियों 12: 5-6)। परन्तु, वह अपनी सन्तानों के प्रति अत्यधिक प्रेम के कारण सब कुछ करता है।

स्मरण रखिए कि यीशु ने अपने शिष्यों को यहोवा का परिचय कैसे दिया। वह परमेश्वर को ‘हमारे पिता’ के रूप में सम्बोधित करता है (मत्ती 6:9)। हमारा परमेश्वर हमारा पिता है। इसलिए, हम साहसी दिखने के बदले उसके सम्मुख अपने भय और चिन्ताओं की सभी परतों को खोल कर रख सकते हैं।

पुराने नियम में, कई बार हमने भजनकारों को परमेश्वर से स्पष्ट रूप से अपने भय, चिन्ताओं और समस्याओं के बारे में बात करते हुए देखा है (भजन 10, 13, 22, 38, 63, 64, 74)। इसलिए, मेरे मित्र, यदि आप कोरोना वायरस के कारण भयभीत हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। यह केवल तब समस्याग्रस्त हो जाता है जब आप अपने भय को प्रभु के पास नहीं लाते हैं। हमें परमेश्वर के सम्मुख यह प्रत्यक्ष करने की आवश्यकता नहीं है कि हम कितने साहसी और निर्भय हैं। हम असहाय हो सकते हैं और परमेश्वर के सम्मुख अपने भय को स्वीकार कर सकते हैं। हमारी आशा और विश्वास है कि अन्त में परमेश्वर हमारी सहायता करेगा। यही उसके साथ हमारे सम्बन्ध की सुन्दरता है। याद रखिए कि परमेश्वर हमारा स्वर्गीय पिता है!

यहाँ तक ​​कि यीशु ने क्रूस पर जाने से पहले, गतसमनी के बगीचे में प्रार्थना किया, “मेरा मन बहुत उदास है, यहाँ तक कि मैं मरने पर हूँ…” (मरकुस 14:34)। मरकुस 14:33 में मरकुस का अभिलेख है कि यीशु अत्यधिक व्यथित और परेशान था। यदि मनुष्य का पुत्र, यीशु ख्रीष्ट स्वयं क्रूस पर परमेश्वर के क्रोध को दूर करने के लिए अपने पिता के समक्ष अपना हृदय प्रकट कर सकता है, तो आप और मैं परमेश्वर के सम्मुख ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं? यीशु अपनी मानवता में व्यथित था कि क्रूस पर उसके साथ क्या होने वाला है और प्रार्थना में पिता के पास गया। हम भी वही कर सकते हैं।

2. भयभीत मत होइए
हमारा स्वर्गीय पिता नहीं चाहता कि हम भय की चपेट में आएं। कोरह-वंशियों ने लिखा है, “परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट के समय तत्पर सहायक। इसलिए हम नहीं डरेंगे…” (भजन 46: 1-2)। भजन 46 के दूसरे पद में छोटा सा शब्द ‘इसलिए’ परमेश्वर में उनके आत्मविश्वास के बारे में प्रमाण देता है। ‘शरणस्थान’ एक ऐसा स्थान है जहाँ आप अपने शत्रुओं द्वारा प्रहार किए जाने पर छिप जाते हैं। उन दिनों, राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए, कभी-कभी शरण देने वाले लोग अचानक अपना विचार बदल देते थे और अपने शत्रुओं के साथ मिलकर दूसरों को धोखा दे देते थे। परन्तु उस तरह की बात हमारे परमेश्वर के साथ कभी नहीं होगी (यशायाह 54:10)। क्योंकि वह वाचा को रखने वाला परमेश्वर है जो हमें कभी नहीं छोड़ेगा, न ही हमें त्यागेगा और न ही हमें धोखा देगा। इसलिए, भजनकारों का विश्वास एक ऐसे परमेश्वर के प्रति विश्वास से उत्पन्न हुआ है, जो अटल और अपरिवर्तनीय है। जबकि हम उस ही परमेश्वर पर विश्वास करते हैं तो हमें किसी भी बात से भयभीत नहीं होना चाहिए, चाहे वह कोरोना वायरस ही क्यों न हो।

यीशु ने कहा, “उनसे न डरो जो शरीर को घात करते हैं पर आत्मा को घात नहीं कर सकते, वरन् उस से डरो जो आत्मा और शरीर दोनों को नरक में नाश कर सकता है” (मत्ती 10:28)। यीशु असमान रूप से कह रहे हैं कि मृत्यु से भयभीत होने का कोई अर्थ नहीं है। यदि मैं इस पद के पीछे के सिद्धान्त को हमारे वर्तमान संकट के लिए लागू कर सकता हूँ, तो कोरोना वायरस हमारे साथ क्या कर सकता है उससे भय करने का कोई अर्थ नहीं है। हमें इस बात की अधिक चिन्ता होनी चाहिए कि मृत्यु के पश्चात हमारा क्या होगा। यदि मृत्यु से परे कुछ भी नहीं है, तो यीशु पर भरोसा करने का कोई अर्थ नहीं है (1 कुरिन्थियों 15:19)। परन्तु यदि है तो हमें इसके बारे में विचार करते रहना चाहिए। यीशु एक अन्तहीन(अनन्त) जीवन की प्रतिज्ञा करता है कि परमेश्वर के साथ एक ऐसे स्थान का आनन्द लिया जाए जो हमारी समझ से परे हो।

3. सुसमाचार बांटिए
भय और आतंक से जूझ रहे किसी व्यक्ति में हम साहस और विश्वास कैसे उत्पन्न करते हैं? उन्हें और स्वयं को यीशु की ओर संकेत करने के द्वारा, जो मर गया और मृतकों में से फिर से जी उठा। सुसमाचार को बांटने के द्वारा, हम आशाहीन लोगों को आशा दे सकते हैं और असहाय की सहायता कर सकते हैं। प्रेरित पौलुस,  यह जानते हुए कि उसकी मृत्यु निकट है (2 तीमुथियुस 4:6), अपने सहकर्मी, तीमुथियुस को एक प्रचारक का काम करने के लिए कहता है (2 तीमुथियुस 4:5)। यीशु मसीह के सुसमाचार से अधिक महत्वपूर्ण, तत्कालिक और जीवन-रक्षक कुछ भी नहीं है।

यह आश्चर्यजनक है कि लोग कितना अधिक सकारात्मक सुनने के लिए तैयार होंगे, विशेष रीति से जब वे भयभीत हों। जब मैं अस्वस्थ लोगों से मिलने जाता हूँ तो मैंने एक बात पर ध्यान दिया है कि वह पहले की अपेक्षा मुझसे अभी सुनने के लिए अधिक तत्पर रहते हैं। मेरा मानना है कि सुसमाचार से उत्तम कोई सन्देश नहीं है। वर्तमान समय से अधिक सुसमाचार को बांटने का उचित समय नहीं होगा। यदि आप इसे करने को तत्पर हैं, तो इसे करने के कई माध्यम हैं। उस पर विचार कीजिए!

यीशु मसीह के सुसमाचार से अधिक महत्वपूर्ण, तत्कालिक और जीवन-रक्षक कुछ भी नहीं है।

4. पवित्रशास्त्र पर मनन कीजिए
अपने ध्यान को उन बातों की ओर आकर्षित कीजिए जो न्यायसंगत, पवित्र, मनभावनी और प्रशंसनीय हैं (फिलिप्पियों 4:8)। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था, कि हमारा मस्तिष्क जानकारी ले सकता है और आन्तरिक और बाह्य रूप से विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है, हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे मस्तिष्क भले, प्रेमी और शुद्ध बातों के प्रति उजागर हो। दूसरे शब्दों में, हमें विचारपूर्वक चुनना चाहिए कि हमें अपने समय के साथ क्या करना है। उदाहरण के लिए, टीवी पर समाचारों को देखने के स्थान पर आप बाइबल को पढ़ने का चुनाव कर सकते हैं, सन्देशों को सुनिए, वचन पर आधारित अच्छे संगीत सुनिए, अपने परिवार के साथ एक अच्छी फिल्म देखिए, अपने बच्चों के साथ खेलिए, कुछ उत्पादक कार्य कीजिए या अपनी आत्मा को पोषण देने के लिए आत्मिक पुस्तक को पढ़िए।

अंततः, इस तरह की स्थिति में, यह परमेश्वर ही जो अपने वचन के माध्यम से हमसे बात करता है, जो हमें भय से मुक्त करेगा और हमें उसकी आत्मा के द्वारा इतने संकट के बीच उस पर भरोसा करने में सक्षम करेगा। इसलिए मैं आप सब  को प्रोत्साहित करता हूँ कि, समाचारों में कम समय बिताएं और परमेश्वर के वचन में अधिक समय बिताएं।

हम जो कुछ भी करते हैं, हम परमेश्वर की महिमा करते हैं और अपने सभी भय को पीछे छोड़ते हैं और अपने सामने निर्धारित दौड़ को दौड़ते हैं। स्मरण रखें, हमारा दुःख क्षणिक है और मसीह में हमारा आनन्द चिरस्थायी है!


यह लेख ‘एक्विप इण्डियन चर्चस’ पर प्रकाशित लेख से अनुवादित किया गया है, जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं: Why Fear When God Is Our Fortress? – Equip Indian Churches