क्या परमेश्वर वास्तव में हमें केवल विश्वास के द्वारा बचाता है?

मार्टिन लूथर, जॉन कैल्विन, और उलरिख़ ज़्विंग्ली जैसे प्रथम महान धर्मसुधारकों ने कभी भी अपनी शिक्षाओं को उन पाँच संक्षिप्त वाक्यांशों में सारांशित नहीं किया जिन्हें हम अब पाँच सोला  के नाम से जानते हैं। जैसे जैसे समय बीतता गया ये सोला  रोमी कैथोलिक कलीसिया के साथ हुए विवाद में धर्मसुधार के सार को समझाने के लिए एक उपाय के रूप में विकसित हुए।

सोला  “केवल” या “मात्र” के लिए लतीनी शब्द है। ये पाँच सोला निम्नलिखित हैं सोला ग्राटिया (केवल अनुग्रह के द्वारा), सोलो ख्रिस्टो (केवल मसीह के आधार पर), सोला फीडे (केवल विश्वास के माध्यम से), सोली डेयो ग्लोरिया (केवल परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ महिमा के लिए), सोला स्क्रिप्चुरा (यह केवल पवित्रशास्त्र के द्वारा सिखाया गया जिसमें अंतिम और निर्णायक अधिकार है)

केवल धर्मीकरण
मैं सोचता हूँ ये सोला अमूल्य रीति से ज्ञानवर्धक हो सकते  हैं, दोनों धर्मसुधार के मूल बिन्दु और स्वयं मसीही सुसमाचार के मूल सार हेतु, जो कि निस्सन्देह विवाद का केन्द्र था। मैं कहता हूँ वे सहायक हो सकते  हैं क्योंकि पाँच पूर्वसर्गिक वाक्यांश जो बिना किसी वाक्य को प्रभावित किए हवा में लटके हुए हैं इस बात को स्पष्ट करने के लिए उपयोगी नहीं हैं कि धर्मसुधार का बड़ा विवाद क्या था, न ही वे सच्चे मसीही सुसमाचार के मूल सार को स्पष्ट करते हैं।

सुसमाचार के मूल सार तथा धर्मसुधार की मुख्य बात को अद्भुत रीति से स्पष्टीकरण प्रदान करने के कार्य हेतु जो उपवाक्य इन प्रभावित करने वाले पूर्वसर्गिक वाक्यांशों को अनुमति देता है, वह है: हम परमेश्वर के समक्ष धर्मी ठहराए जाते हैं . . . या परमेश्वर के समक्ष धर्मीकरण है . . . 

धर्मी ठहराने वाला केवल विश्वास कभी भी अकेला नहीं होता है, परन्तु सर्वदा परिवर्तन का फल लाता है।

वे पाँच पूर्वसर्गिक वाक्यांश, सब प्रकार के गैर-बाइबलीय मिश्रण से सुसमाचार को परिभाषित करने और उसकी रक्षा करने के लिए केवल धर्मीकरण  के बाद ही आ सकते हैं और अपने अद्भुत कार्य को कर सकते हैं। हम परमेश्वर द्वारा धर्मी ठहराए गए हैं  केवल अनुग्रह  के द्वारा; केवल मसीह  के लहू और उसकी धार्मिकता के आधार पर; केवल विश्वास  के माध्यम से, या साधन के द्वारा; केवल परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ महिमा  के लिए; यह केवल पवित्रशास्त्र के द्वारा सिखाया गया जिसमें अंतिम और निर्णायक अधिकार है।

ये सभी पाँच वाक्यांश परमेश्वर के धर्मीकरण  के कार्य को समझाने हेतु कार्य करते हैं—कि कैसे पापी मनुष्य परमेश्वर के सम्मुख सही स्थिति प्राप्त करते हैं जिससे कि वह सौ प्रतिशत हमारे पक्ष में हो न कि हमारे विरुद्ध हो।

सोलाओं के साथ प्रतिस्थापन न करें
यदि आप “हम धर्मी ठहराए जाते हैं . . .” को छोड़कर अन्य किसी वाक्य को रखेंगे जैसे कि “हम पवित्र किए जाते  हैं” या “या हम अन्तिम न्याय के समय अन्ततः बचाए  जाएंगे” तो पवित्रशास्त्र के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने के लिए इन पूर्वसर्गिक वाक्यांशों में से कुछ के अर्थ को परिवर्तित किया जाना होगा। उदाहरण के लिए,

  • धर्मीकरण  में, विश्वास एक ऐसे पूरा किए गए कार्य को ग्रहण करता जिसे मसीह ने हम से बाहर  किया और जो हमारे लिए गिना जाता है—हमें अभ्यारोपित किया जाता है।
  • पवित्रीकरण  में, विश्वास मसीह से एक ऐसी अविरत सामर्थ्य ग्रहण करता है जो हमारे भीतर  व्यावहारिक पवित्रता के लिए कार्य करता है।
  • अन्तिम उद्धार  में जो अन्तिम न्याय के समय होगा, विश्वास की पुष्टि की जाती है उस पवित्र करने वाले फल के द्वारा जिसे उसने उत्पन्न किया, और हम उस फल और उस विश्वास के द्वारा बचाए जाते हैं। जैसा कि पौलुस 2 थिस्सलुनीकियों 2:13 में कहता है, “परमेश्वर ने आरम्भ ही से तुम्हें चुन लिया है कि आत्मा के द्वारा पवित्र बन कर और सत्य पर विश्वास करके  उद्धार पाओ।”

हम अन्ततः कैसे बचाए जाते हैं?
विशेषकर जब अन्तिम उद्धार की बात होती है, हम में से बहुत लोग भ्रान्ति के कोहरे में रहते हैं। याकूब ने अपने दिन में उन लोगों को देखा जो “केवल विश्वास” के साथ ऐसा व्यवहार कर रहे थे मानो कि वह एक ऐसे सिद्धान्त है जो यह सिखाता था कि आप ऐसे विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जा सकते हैं जो भले कार्य उत्पन्न नहीं करता हो। और उसने दृढ़ता से ऐसे विश्वास के विषय में कहा, नहीं।

  • बिना कार्य का विश्वास मृतक है (याकूब 2:17)।
  • यह ऐसा शरीर के समान है जिसमें आत्मा नहीं है (याकूब 2:26)।
  • यह ऐसी ऊर्जा के समान है जिसका कोई प्रभाव न हो (याकूब 2:20), और जो सिद्ध नहीं होता है (याकूब 2:22)।
  • यदि धर्मी ठहराने वाला विश्वास है, तो उसमें कार्य होंगे (याकूब 2:17)।

इसलिए, वह कहता है, “मैं अपना विश्वास तुम्हें अपने कार्यों द्वारा दिखाऊँगा ” (2:18)। कार्य विश्वास से आएंगे।

केवल विश्वास  का अर्थ एक ही नहीं होता है जब धर्मीकरण, पवित्रीकरण, और अन्तिम उद्धार पर लागू किया जाता है।

पौलुस इस सब की पुष्टि करता था क्योंकि उसने गलातियों 5:6 में कहा, “मसीह यीशु में न ख़तने का कुछ महत्त्व है और न ख़तनारहित होने का, पर केवल विश्वास का जो प्रेम द्वारा होता है ।” केवल विश्वास धर्मी ठहराए जाने के लिए गिना जाता है जो प्रेम को उत्पन्न करता है—जो प्रेम का फल लाता है। धर्मी ठहराने वाला केवल विश्वास कभी भी अकेला नहीं होता है, परन्तु सर्वदा परिवर्तन का फल लाता है। इसलिए, जब याकूब इन विवादास्पद शब्दों को कहता है, “मनुष्य केवल विश्वास से नहीं, वरन् कर्मों से धर्मी ठहराया जाता है” (याकूब 2:24), मैं समझता हूँ कि इसका अर्थ है ऐसे विश्वास से नहीं जो अकेला है, परन्तु ऐसा जो स्वयं को कार्यों में दिखाता है।

पौलुस विश्वास के इस प्रभाव या फल या प्रमाण को “विश्वासपूर्ण कार्य” (1 थिस्सलुनीकियों 1:3; 2 थिस्सलुनीकियों 1:11) और “विश्वास से आज्ञाकारिता” (रोमियों 1:5; 16:26) कहता है। ये विश्वासपूर्ण कार्य, और यह विश्वास से आज्ञाकारिता, ये आत्मा के फल जो विश्वास के द्वारा आते हैं, हमारे अन्तिम उद्धार के लिए आवश्यक हैं। पवित्रता नहीं, तो स्वर्ग नहीं (इब्रानियों 12:14)। इसलिए हमें केवल विश्वास के द्वारा स्वर्ग जाने की बात ऐसे नहीं करना चाहिए जिस रीति से हम केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने के विषय में बात करते हैं।

मसीही जीवन के लिए अनिवार्य तथा अन्तिम उद्धार के लिए आवश्यक है पाप को घात करना (रोमियों 8:13) और पवित्रता का पीछा करना (इब्रानियों 12:14)। पाप को घात करना, पवित्रता में पवित्रीकरण। परन्तु क्या है जो इसको सम्भव तथा परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला बनाता है। हम पाप को घात करते हैं और पवित्रता का पीछा करते हैं एक धर्मी ठहराई गई अवस्था से जहाँ परमेश्वर सौ प्रतिशत हमारे पक्ष में है—पहले ही से—किन्तु केवल विश्वास के द्वारा।

पहला बाइबलीय, फिर धर्मसुधारवादी (रिफार्म्ड)
इस प्रकार केवल विश्वास  का अर्थ एक ही नहीं होता है जब धर्मीकरण, पवित्रीकरण, और अन्तिम उद्धार पर लागू किया जाता है। आप देख सकते हैं कि पाँच सोलाओं का प्रयोग करते हुए पवित्रशास्त्र के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने के लिए अत्यधिक ध्यान और सटीकता की आवश्यकता है। और क्योंकि “केवल  पवित्रशास्त्र” हमारा अन्तिम तथा निर्णायक अधिकार है, पवित्रशास्त्र के प्रति विश्वासयोग्य होना ही लक्ष्य है। हमारा उद्देश्य है कि पहले बाइबलीय हों—और धर्मसुधारवादी तभी हों यदि यह पवित्रशास्त्र से निकलकर आता है।
पाँच सोला धर्मसुधार के मूल बिन्दु तथा सुसमाचार के मूल केन्द्र के विषय में अद्भुत स्पष्टता प्रदान करते हैं, यदि  ये पाँच पूर्वसर्गिक वाक्यांश इस उपवाक्य को प्रभावित कर रहे हों “परमेश्वर के समक्ष धर्मीकरण है . . .।” परमेश्वर के समक्ष धर्मीकरणकेवल अनुग्रह के द्वारा  है, बिना किसी भी प्रकार के मोल लिए गए कृपा के; केवल मसीह पर आधारित, नींव के रूप में अन्य कोई बलिदान या धार्मिकता नहीं; केवल विश्वास के माध्यम से, बिना किसी भी मानवीय कार्यों के सम्मिलित किए; इस अन्तिम लक्ष्य की ओर कि सब बातें अन्ततः केवल परमेश्वर की महिमा  की ओर आगे बढ़ें; जैसा कि यह केवल पवित्रशास्त्र  के द्वारा सिखाया गया जिसमें अंतिम और निर्णायक अधिकार है।