क्षमा हुए पाप के परिणाम

जब पीड़ा एक दण्ड नहीं है

मैं ऊरिय्याह (हत्या) और बतशेबा (व्यभिचार) के विरुद्ध दाऊद के पाप की कहानी और 2 शमूएल 11-12 में परमेश्वर के प्रतिउत्तर से पुनः भावविभोर हो गया था।

दाऊद स्वीकार करता है कि जिसने ऐसा कार्य किया है वह मरने के योग्य है (2 शमूएल 12:5), परन्तु अंत में नातान कहता है, “यहोवा ने भी तेरे पाप को दूर कर दिया है, तू नहीं मरेगा” (12:13)। यह अद्भुत अनुग्रह है। परमेश्वर पाप को भुला देता है और मृत्यु के दण्ड को दूर कर देता है।

यद्यपि पाप दूर कर दिया गया है और मृत्यु का दण्ड हटा दिया गया है, नातान कहता है, “फिर भी अपने इस कार्य के द्वारा तू ने यहोवा के शत्रुओं को निन्दा करने का अवसर दिया है। इसलिए तेरा यह पुत्र भी, जो उत्पन्न हुआ है, निश्चय मर जाएगा” (12:14)। पाप क्षमा के होने पर भी, पाप के कारण कुछ “दण्ड” शेष रहता है।

अनुशासन के परिणाम

मैंने दण्ड  को उद्धरण-चिन्ह में रखा है क्योंकि मैं सोचता हूँ कि हमें क्षमा किए गए पाप के परिणामों को अवश्य ही (पद 13) क्षमा न किए गए पाप के परिणामों से भेद करना चाहिए। बाद वालों (क्षमा न किए गए पाप के परिणाम) को उचित रीति से दण्ड कहा जाता है। पहले वालों (क्षमा किए गए पाप के परिणाम) को हमें सम्भवतः “अनुशासन के परिणाम” कहना चाहिए।

अर्थात, वे पाप से सम्बन्धित हैं, और वे पाप के प्रति परमेश्वर की अप्रसन्नता को दर्शाते हैं, परन्तु उनका उद्देश्य दण्ड देने वाला न्याय नहीं है। वे दण्ड की आज्ञा के कारण नहीं हैं। क्षमा हुए पाप के परिणामों का उद्देश्य न्यायपूर्ण दण्ड द्वारा माँगे गए लेखे-जोखे का भुगतान करना नहीं है।

इसी के लिए तो नरक है। एक ऐसा न्याय है जिसका उद्देश्य बुराई को बदला देने के द्वारा सत्य को न्यायसंगत ठहराना है, और इस प्रकार निष्पक्षता को परमेश्वर की धार्मिकता के राज्य में स्थापित करता है। यह क्रूस पर उन लोगों के लिए किया जाता है जो मसीह में हैं, और यह नरक में उन लोगों के लिए किया जाता है जो मसीह में नहीं हैं।

यदि हम उस पर विश्वास करते हैं तो क्रूस पर वह श्राप जिसके हम योग्य थे मसीह पर आया (गलातियों 3:13), परन्तु यदि हम उस पर विश्वास नहीं करते हैं तो यह श्राप नरक में हमारे स्वयं के सिर पर आता है (मत्ती 25:41)। “प्रभु कहता है कि बदला लेना मेरा काम है, बदला मैं दूँगा” (रोमियों 12:19)। यदि वह पापों को भुला देता है और उनके साथ वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा कि उसने दाऊद के साथ किया, जैसे मानो कि वे दण्ड के योग्य नहीं हैं, तो यह बदला चुकाने में केवल एक दयापूर्ण विलम्ब ही है। या तो इसे क्रूस पर सही ठहरा दिया जाएगा, जैसा कि पौलुस रोमियों 3:25 में स्पष्ट रूप से कहता है, अथवा यह “परमेश्वर के प्रकोप के दिन के लिए और उसके सच्चे न्याय के प्रकट होने” पर चुकाया जाएगा (रोमियों 2:5)।

परन्तु परमेश्वर द्वारा क्षमा हुए पाप के परिणामों का उद्देश्य न्याय के दण्ड द्वारा माँगे गए लेखे-जोखे का भुगतान करना नहीं है। क्षमा हुए पाप के परमेश्वर द्वारा भेजे गए परिणामों के उद्देश्य हैं (1) पाप की अत्यधिक बुराई को प्रदर्शित करना, (2) यह दिखाना कि परमेश्वर जब अपने दण्ड को लागू नहीं करता है तब भी वह पाप को हल्के में नहीं लेता है, (3) क्षमा किए गए पापी को नम्र और पवित्र करने के लिए।  

शुद्ध करना, न कि दण्डित करना 

इब्रानियों 12:6 सिखाता है “क्योंकि प्रभु जिस से प्रेम करता है उसकी ताड़ना भी करता है, और जिसे पुत्र बना लेता है, उसे कोड़े भी लगाता है।” इसका उद्देश्य दण्ड देना नहीं है, परन्तु शुद्ध करना है। “वह हमारे भले के लिए ताड़ना करता है, कि हम उसकी पवित्रता में सहभागी हो जाएं। सब प्रकार की ताड़ना कुछ समय के लिए सुखदायी नहीं, परन्तु दुखदायी प्रतीत होती है, फिर भी जो इसके द्वारा प्रशिक्षित हो चुके हैं, उन्हें बाद में धार्मिकता का शान्तिदायक फल प्राप्त होता है” (इब्रानियों 12:10–11)।

ऐसा नहीं है कि परमेश्वर द्वारा ठहराए गए सभी अनुशासन के कष्ट सीधी रीति से हमारे द्वारा किए गए किसी पाप के कारण हैं, परन्तु क्षमा हुए पापियों के नाते ये सभी हमारी भलाई के लिए निर्धारित किए गए हैं। आज के ऐसे समय में यह शिक्षा देना अत्यन्त महत्वपूर्ण है जहाँ क्षमा में पिता की कड़ाई को तिरस्कार करके, क्षमा में पिता की कोमलता पर बल देने में असंतुलन पाया जाता हो। इस कारण कई लोगों के पास अपने जीवन में पापों के परिणामों को समझने के लिए कोई श्रेणियां ही नहीं हैं सिवाय इसके कि क्षमा की बहुमूल्यता को कम आँकना या फिर परमेश्वर पर एक ही पाप के लिए दो बार दण्ड देने का आरोप लगाना जिसको उसने पहले ही क्षमा कर दिया है।

सत्य की सामर्थ्य और आत्मा के द्वारा, हमें परमेश्वर के अनुग्रह, पापों की क्षमा, महिमा की आशा और प्रभु के आनन्द में उसी समय उत्सव मनाना अवश्य सीखना चाहिए जब हम सम्भवतः क्षमा हुए पाप के परिणामों से कष्ट उठा रहे हों। हमें क्षमा प्राप्ति की तुलना कष्टों की अनुपस्थिति से नहीं करना चाहिए। दाऊद का जीवन इस सत्य का एक स्पष्ट उदाहरण है। काश परमेश्वर हमें इसे सीखने और इसे जीने के लिए अनुग्रह प्रदान करे।

जॉन पाइपर (@जॉन पाइपर) desiringGod.org के संस्थापक और शिक्षक हैं और बेथलेहम कॉलेज और सेमिनरी के चाँसलर हैं। 33 वर्षों तक, उन्होंने बेथलहम बैपटिस्ट चर्च, मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक पास्टर के रूप में सेवा की। वह 50 से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं, जिसमें डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन ऑफ ए क्रिश्चियन हेडोनिस्ट और हाल ही में प्रोविडेन्स सम्मिलित हैं।
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