प्रार्थना क्या है?

यह बात तो स्वतः स्पष्ट है कि संसार में अधिकतर लोग किसी न किसी ईश्वर पर विश्वास करते हैं। ईश्वर में विश्वास रखने वाले ऐसे लोग प्रार्थना द्वारा अपनी बात उस तक पहुँचाना चाहते हैं। क्योंकि उनका विश्वास है कि प्रार्थना एक प्रकार से ईश्वर तक अपनी बात को पहुँचाने का अलौकिक साधन है। इसलिए, कुछ लोग ईश्वर से या तो कुछ प्राप्त करने के लिए (चंगाई, धन, समृद्धि इत्यादि) या फिर उसकी उपस्थिति (मुक्ति, शान्ति, कृपा इत्यादि) को अनुभव करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

बाइबल जो परमेश्वर का वचन है, हमें बताती है कि प्रार्थना के माध्यम से, हम परमेश्वर से बातचीत करते हैं, उसकी आराधना करते हैं, परमेश्वर के सम्मुख अपने पापों के लिए क्षमा मांगते हैं और अपने निवेदनों को उसके सम्मुख लाते हैं। प्रार्थना के द्वारा हम परमेश्वर पर अपनी निर्भरता और भरोसे को भी दिखाते हैं। आइए, हम प्रार्थना के सन्दर्भ में तीन प्रमुख बातों को देखें –

1. प्रार्थना परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध को दर्शाता है

इस विषय में हमें यह ध्यान रखना है कि अन्य सम्बन्धों से बढ़कर परमेश्वर के साथ हमारा विशेष सम्बन्ध है। यद्यपि वह सृष्टिकर्ता परमेश्वर है और हम मनुष्य उसकी सृष्टि हैं। वह सम्प्रभु राजा है और हम उसकी प्रजा हैं। पाप और विद्रोह के कारण परमेश्वर से हमारा सम्बन्ध टूट गया था और हम उससे दूर हो गए थे। परन्तु मसीह के कारण अब हमारा परमेश्वर से मेल हो गया है। मसीह में हम परमेश्वर को ‘हे अब्बा! हे पिता!’ कह कर पुकार सकते हैं और उससे प्रार्थना कर सकते हैं (रोमियों 8:15)। हम उसके पास मसीह यीशु के कारण साहस के साथ आ सकते हैं (इब्रानियों 10:19)। क्योंकि अब हमारा परमेश्वर के साथ सम्बन्ध है हम उसके साथ प्रार्थना में समय व्यतीत कर सकते हैं।  

2. प्रार्थना परमेश्वर से बातचीत करना है

हमारा सम्बन्ध परमेश्वर के साथ है। इसलिए, परमेश्वर हमारे साथ अपने वचन के द्वारा बातचीत करता है और हम अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा उससे बातचीत करते हैं। परमेश्वर स्वयं चाहता है कि हम अपनी प्रार्थना के द्वारा उससे बात करें। परमेश्वर का वचन प्रार्थना करने की मांग करता है, “आशा में आनन्दित रहो, क्लेश में स्थिर रहो, प्रार्थना में लवलीन रहो” रोमियों 12:12। 1 थिस्सलुनीकियों 5:17 में पौलुस कहता है कि, “निरन्तर प्रार्थना करते रहो।” इसलिए प्रार्थना मसीह जीवन के लिए वैकल्पिक नहीं है, परन्तु हमारे मसीही जीवन में प्रार्थना अनिवार्य होना चाहिए। हम परमेश्वर के साथ अपनी बातचीत में उसकी आराधना करते हैं, उससे पापों के लिए क्षमा मांगते हैं, उसको धन्यवाद देते हैं और अपने निवेदनों को उसके पास लाते हैं। हम अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति कृतज्ञता को भी दिखाते हैं।

परमेश्वर हमारे साथ अपने वचन के द्वारा बातचीत करता है और हम अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा उससे बातचीत करते हैं। परमेश्वर स्वयं चाहता है कि हम अपनी प्रार्थना के द्वारा उससे बात करें।

3. प्रार्थना परमेश्वर पर भरोसा रखना है

हमारा परमेश्वर भरोसेमन्द है। वह विश्वासयोग्य और धर्मी है (1 यूहन्ना 1:9)। जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं तो हम निश्चित रूप से जानते हैं कि परमेश्वर हमारी प्रार्थना को सुनता है। हम अपने जीवन की जटिल समस्याओं में, परिक्षाओं में, दुखों में, और विरोध आदि किसी भी परिस्थिति में परमेश्वर के पास इस भरोसे के साथ आ सकते हैं कि मसीह में हमारी प्रार्थना सुनी जाएगी। क्योंकि हम यीशु के नाम में प्रार्थना करते हैं, इसलिए हमारे पास एक दृढ़ भरोसा है कि हमारी प्रार्थना सुनी जाएगी। यीशु मसीह का जीवन, हमारे बदले उसकी मृत्यु, उसका पुनरुत्थान, स्वर्ग में उसका उठाया जाना, ये सब बातें हमारे लिए एक निश्चयता को लाती हैं कि मसीह के नाम में हमारी प्रार्थना परमेश्वर तक पहुँचती है। क्योंकि यीशु मसीह स्वयं हमारे लिए निवेदन करता है, “…मसीह यीशु ही है जो मरा, हां, वरन् वह मृतकों में जिलाया गया, जो परमेश्वर के दाहिनी ओर है, और हमारे लिए निवेदन भी करता है” रोमियों (8:34)। इसलिए हमारे पास और अधिक भरोसा है कि हम परमेश्वर के सिंहासन के निकट आ सकते हैं और परमेश्वर से निवेदन कर सकते हैं। 

क्योंकि हम यीशु के नाम में प्रार्थना करते हैं, इसलिए हमारे पास एक दृढ़ भरोसा है कि हमारी प्रार्थना सुनी जाएगी।

अन्त में, प्रार्थना परमेश्वर के द्वारा दिया गया एक प्रावधान है, जो उसने हम विश्वासियों को दिया है कि हम मसीह में नियमित रीति से अपने स्वर्गीय पिता के साथ सहभागिता में बढ़ते चले जाएं। इसलिए हमें प्रार्थना करने के एक निश्चित समय के साथ-साथ किसी भी समय प्रार्थना करने की आदत बनाना चाहिए। उदाहरण के लिए: चाहे आप हम पैदल चल रहे हों, चाहे स्कूल, कालेज, या कार्यालय में हों, चाहे खाना बना रहे हों, चाहे बच्चों को सम्भाल रहे हों, चाहे घर की सफाई कर रहे हों आदि स्थितियों में हम कभी भी प्रार्थना कर सकते हैं। हम जितना अधिक प्रार्थना करेंगे उतना अधिक परमेश्वर के साथ सम्बन्धों की घनिष्ठता में बढ़ेंगे और प्रार्थना करना सीखेंगे।