क्या आज भी प्रेरित और भविष्यवक्ता होते हैं?

आज संसार में अनेक ऐसे अगुवे पाए जाते हैं, जो स्वयं को प्रेरित या भविष्यवक्ता कहते हैं। वे कहते हैं कि जैसे प्रेरित और भविष्यवक्ता लोगों ने आरम्भिक कलीसिया में कार्य किए थे, वैसे ही आज हम कलीसिया के लिए कार्य कर रहे हैं। यद्यपि अनेक विद्वानों का मानना है कि आधुनिक संसार में आरम्भिक कलीसिया के समान प्रेरित और भविष्यवक्ता नहीं होते हैं। फिर भी कुछ लोगों का मानना है कि आज भी परमेश्वर अपनी सेवा के लिए प्रेरित और भविष्यवक्ता, दोनों पदों को बनाए हुए है। आइए हम नये नियम व कलीसिया इतिहास के आधार पर प्रेरितों तथा भविष्यवक्ताओं के कार्य और उनके समयकाल (अवधि) पर विचार करें कि, क्या सच में आज हमें प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं की आवश्यकता है?

प्रेरित

वर्तमान समय में अनेक अगुवे आज भी स्वयं को प्रेरित और भविष्यवक्ता कहते हैं। क्योंकि इनका मानना है कि जो कुछ आरम्भिक कलीसिया में हुआ था वह सब कुछ वर्तमान की कलीसिया में होना तथा उसका अनुभव किया जाना चाहिए। एक प्रसिद्ध अगुवे डेविड डू प्लेसिस ने अपने एक लेख में इस प्रकार कहा था कि “नया नियम पहली शताब्दी में हुई बातों का प्रलेख नहीं, परन्तु यह उस कार्य का नमूना है जो ख्रीष्ट के आगमन से पहले प्रत्येक शताब्दी में होना चाहिए”।[1]

प्रेरितों को आरम्भ में इसलिए चुना गया था जिससे कि वे सुसमाचार का प्रचार करते हुए सामर्थी कार्यों के द्वारा परमेश्वर के राज्य की महिमा को प्रकट करें। प्रेरित कलीसिया की स्थापना करके उसे ख्रीष्ट की शिक्षाओं में बढ़ा रहे थे। प्रेरितों ने स्वयं कलीसिया की नींव रखने के कार्य को किया, परन्तु यह पद/कार्यभार दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित नहीं किया। उन्होंने भविष्य में कलीसिया के संचालन के लिए प्रेरितों को नहीं, परन्तु अध्यक्षों या प्राचीनों और डीकनों की नियुक्ति की थी (प्रेरितों 14:23, 20:28)। अतः कलीसिया की स्थापना के बाद प्रेरितों की आवश्यकता न रही जिसके कारण यह पद समाप्त हो गया।  

भविष्यवक्ता

भविष्यवक्ता शब्द का अनुवाद यूनानी भाषा के प्रोफेटेस (προφήτης) शब्द से किया गया है, जिसका अर्थ है ‘वह जो किसी के स्थान पर बोलता है’। यद्यपि ये भविष्यवक्ता परमेश्वर के प्रवक्ता थे जो उसके वचनों को लोगों तक पहुंचाते थे। फिर भी नये नियम में पौलुस भविष्यवक्ताओं को प्रेरितों के बाद रखता है (1 कुरिन्थियों 12:28, इफिसियों 2:20, 3:5, 4:11)। ऐसा करना सम्भवतः इस बात का संकेत है कि भविष्यवक्ता प्रेरितों के बाद दूसरे स्थान पर थे।

पुराने नियम के समान ही नये नियम के भविष्यवक्ता भी भविष्यवाणी करने से अधिक परमेश्वर के सन्देश को पहुँचाते थे। वे पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से परमेश्वर के लोगों को शिक्षा देते तथा विश्वास में दृढ़ करते थे (प्रेरितों के काम 15:32)। भविष्यवक्ता शिक्षकों के समान थे जो लोगों की आत्मिक उन्नति करते थे (प्रेरितों 13:1-2, 1 कुरिन्थियों 14:31)। और परमेश्वर ने इनका प्रबन्ध कलीसिया की नींव के डालने हेतु तब तक के लिए किया था, जब तक कि लिखित ख्रीष्टीय शिक्षा (नया नियम) नहीं आ गई थी।   

प्रेरित होने की योग्यता

नये नियम के अनुसार प्रेरित होने के लिए सबसे पहले प्रेरितों को ख्रीष्ट के पुनरुत्थान के आंखों देखे गवाह होना चाहिए (प्रेरितों के काम 1:22, 10:39-41, 1 कुरिन्थियों 15:7-8)। दूसरा, उन्हें व्यक्तिगत रूप से ख्रीष्ट के द्वारा नियुक्त किया जाना चाहिए (मरकुस 3:14, लूका 6:13, प्रेरितों के काम 1:2, 24, 10:41)। तीसरा, उन्हें अपनी प्रेरिताई को अद्भुत चिन्हों के द्वारा प्रमाणित करना चाहिए (मत्ती 10:1–2, प्रेरितों के काम 1:5–8, 2:43, 4:33, 5:12, 8:14)। वर्तमान समय के प्रेरितों के लिए इन सभी योग्यताओं को पूरा कर पाना असम्भव है।

प्रेरित और भविष्यवक्ताओं की आवश्यकता

कलीसिया की नींव एक बार प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं के द्वारा पड़ जाने के बाद अब इनकी आवश्यकता समाप्त हो गई है। जिस प्रकार किसी भी भवन की नींव निर्माण कार्य के आरम्भ में केवल एक ही बार डाली जाती है उसके बाद सिर्फ भवन का निर्माण होता रहता है। उसी प्रकार कलीसिया की नींव भी आरम्भ में एक बार पड़ चुकी है जिसे अब पुनः डालने की आवश्यकता नहीं है।

इसके साथ ही कलीसियाई पिताओं में से पॉलीकार्प, आइरेनियश, आगस्तीन आदि ने केवल प्रेरितों की शिक्षाओं का पालन किया जो मौखिक या लिखित रूप में उनके पास थी। पहली तीन शताब्दी तक किसी भी कलीसियाई पिता को कभी प्रेरित नहीं कहा गया, जबकि उनके पास पूर्ण बाइबल (कैनन) का संकलन भी नहीं था। कलीसियाई पिताओं को प्रेरित न कहा जाना इस बात की पुष्टि करता है कि प्रेरित और भविष्यवक्ता केवल आरम्भिक कलीसिया की स्थापना के लिए ही थे। जिनको कलीसिया में दान के रूप में दिया गया था जिससे कि कलीसिया उन्नति कर सके। कलीसिया की नींव पड़ने के बाद सुसमाचार प्रचारकों, पास्टरों-शिक्षकों के द्वारा कलीसिया को आगे बढ़ाया गया।

आधुनिक विद्वानों के विचार

मार्टिन लॉयड जोन्स कहते हैं कि जब एक बार नया नियम लिख दिया गया तो कलीसिया को प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं की आवश्यकता नहीं रही।[2] जॉन मैकार्थर अपनी पुस्तक स्ट्रेंज फायर में लिखते हैं कि “ऐतिहासिक प्रोटेस्टेन्टवाद अपने इस दृढ़ विश्वास पर आधारित है कि कैनन बन्द हो चुका है। अब हमें किसी भी नये प्रकाशन की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि पवित्रशास्त्र पूरा होने के साथ ही सम्पूर्ण रूप से पर्याप्त भी है।”[3] प्रोटेस्टेन्ट कलीसियाओं के लिए अब किसी भी नये प्रेरित या भविष्यवक्ता के द्वारा दिए गए प्रकाशन को स्वीकार करना प्रोटेस्टेन्ट विश्वास के सिद्धान्त ‘सोला स्क्रिप्चरा’ अर्थात् केवल पवित्रशास्त्र का विरोध करना है (2 तीमुथियुस 3:16)।

अतः हमें बाइबल की शिक्षाओं के साथ ही चलते हुए उन सिद्धान्तों को थामे रहना चाहिए जिन पर कलीसिया आरम्भ से ही टिकी हुई है। हमें वचन को उसके सही सन्दर्भ में समझते हुए सीखना और सिखाना चाहिए। इसके साथ ही हम इस बात का ध्यान रखें कि हम अपने नाम के लिए नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिए सेवा कर रहे हैं। हमें मनुष्यों से प्रशंसा पाने के लिए नहीं, परन्तु परमेश्वर से प्रतिफल पाने के लिए कार्य करना चाहिए।


[1] David du Plessis, “Pentecost Outside Pentecost,” pamphlet, 1960, 6

[3] D. Martyn Lloyd-Jones, Christian Unity (Grand Rapids: Baker, 1987), 189–91.

[4] John Macarthur, Strange fire: The danger of offending the Holy Spirit with counterfeit, Part-2, Chapter 6

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