परमेश्वर ने सम्पूर्ण संसार को बनाया, उसने मनुष्य की सृष्टि की। उसने पहले नर और नारी, आदम-हव्वा को बनाया और उन्हें अदन की वाटिका में रखा। आदम की रचना करने के बाद परमेश्वर ने उसे अदन की वाटिका में रखा कि वह उसकी बागवानी और देख-भाल करें (उत्पत्ति 2:15)। अर्थात परमेश्वर की आरम्भ से योजना और इच्छा है कि मनुष्य काम करे। वे अपने कार्य, उत्तरदायित्वों को पूरा करने के द्वारा परमेश्वर की महिमा करें। किन्तु जब मनुष्य अपने उत्तरादायित्वों को पूरा नहीं करते, जिसके लिए परमेश्वर ने उन्हें बनाया है तो वे परमेश्वर के विरोध में पाप करते हैं। और आलस एक ऐसा पाप है जो हमें हमारे उत्तरदायित्वों को पूरा करने में बाधक है। 

किसी कार्य को करने की आवश्यकता होने पर तथा उस कार्य को करने में सक्षम होने पर भी यदि कोई व्यक्ति कार्य करने के स्थान पर विभिन्न प्रकार के बहाने बना कर उस कार्य को टालना चाहता है तो वह उसका आलस्य होता है। 

आलस्य का अर्थ- आलस्य वह स्थिति है जब एक व्यक्ति अपने कर्तव्यों या उत्तरदायित्वों को पूरा नहीं करता और कठिन परिश्रम से दूर भागता है। यह सुस्त रहने की तथा कुछ न करने की इच्छा है, जिसमें कोई परिश्रम न हो। यह निष्क्रिय बने रहने वाली स्थिति है। आलस किसी भी काम में देर करने, या उसे करने से बचने, पूरे मन से न करने, समय पर अपना कार्य न करने, तथा पूर्ण तथा सही रीति से न करना है। किसी कार्य को करने की आवश्यकता होने पर तथा उस कार्य को करने में सक्षम होने पर भी यदि कोई व्यक्ति कार्य करने के स्थान पर विभिन्न प्रकार के बहाने बना कर उस कार्य को टालना चाहता है तो वह उसका आलस्य होता है। 

आलस्य के रूप- आलस्य बाहरी रूप से दिखता है जो हमारे जीवन एवं कार्यों द्वारा प्रदर्शित होता है।सबसे विचित्र बात तो यह है कि लोग इससे परिचित ही नहीं होते हैं कि वे आलस्य के पाप से संघर्ष कर रहे हैं। बहुत लोग बिना जाने हुए प्रतिदिन के जीवन में आलस की ओर बढ़ रहे हैं, कुछ जानते हैं लेकिन वे दिखाते हैं कि वे आलसी नहीं है, जबकि कुछ इससे अनभिज्ञ हैं। अधिकाँश आलसी इस बात को आसानी से स्वीकार नहीं करते हैं कि वे आलसी हैं।

अपने व्यक्तिगत जीवन में ढ़ीले होना- आलसी व्यक्तिगत जीवन में स्वयं के प्रति सचेत नहीं रहता है। व्यक्तिगत परमेश्वर के साथ सम्बन्ध, वचन पढ़ने, प्रार्थना करने में ढ़ीला रहता है। वह अपने आत्मिक जीवन के प्रति सावधान नहीं रहता है। वह बिना उद्देश्य के जीवन व्यतीत करता है, भविष्य के लिए योजना न बनाना तथा घर में अपनी वस्तुएं अस्त-व्यस्त रखता है। चाहे वह स्वयं के स्वास्थ्य की देखभाल हो, या आत्मिक जीवन, हृदय की बात हो।

प्राय: आराम की चाह रखना- एक आलसी व्यक्ति नींद से प्रेम करता है। एक आलसी व्यक्ति की दिनचर्या प्राय: सुबह देर में उठना है, चाहे वह जितनी जल्दी सोया हो। “जिस प्रकार दरवाज़ा अपनी चूलों पर घूमता है उसी प्रकार आलसी अपने बिस्तर पर” (नीतिवचन 26:14)। एक आलसी अपनी नींद के लिए सब बातों, कार्यों को अनदेखा करता है। जब भी व्यक्ति को समय मिले तो वह जन बिस्तर पर जाकर विश्राम करने के विषय में सोचता रहता है। इसके लिए वह हर अन्य आवश्यक कार्यों से समझौता करके स्वयं के आराम को प्रार्थमिकता देते हैं और अन्य लोगों की परवाह नहीं करते। 

एक आलसी अपनी नींद के लिए सब बातों, कार्यों को अनदेखा करता है। जब भी व्यक्ति को समय मिले तो वह जन बिस्तर पर जाकर विश्राम करने के विषय में सोचता रहता है।

कार्य न करने के लिए बहाने बहाना- एक आलसी व्यक्ति समय के महत्व को नहीं समझता है, वह बड़ी मुश्किल से तो कोई काम आरम्भ करता है और यदि करता भी है तो कुछ समय बाद छोड़ देता है, और अन्य व्यर्थ की बातों पर अपना समय बर्बाद कर देता है। यदि वह काम करता भी है तो काम-चलाऊ काम करना, काम को पूरे मन से न करना, दूसरों पर कार्य को थोपना, कार्य में देरी करना और अन्तिम समय के लिए प्रतीक्षा करना आदि बातें उसके जीवन से दिखाई देती है। काम न करने के लिए आलसी बहुत बहाने बनाता है। “आलसी मनुष्य कहता है, “बाहर शेर खड़ा है, गलियों में तो मैं मारा जाऊंगा” (नीतिवचन 22:13, 26:13)। अर्थात उसको काम न करना पड़े उसके लिए वह बहुत सारी कठिनाईयों, अड़चनों को पहले से ही प्रस्तुत करता रहता है। 

स्वयं कार्य को न करना – एक आलसी व्यक्ति इच्छा रखता है कि जो कार्य उसे करना चाहिए उसे दूसरों को दिया जाए। यह इसलिए नहीं करता कि वह कर नहीं सकता बल्कि एक छोटे से काम को करने के लिए भी आलस्य आता है। कई बार लोग अपने अधिकार का गलत उपयोग करते हैं और स्वयं के कार्य को दूसरों से कराकर अपने शेखी बघारते हैं। यह वास्तव में उन्हें आलस की ओर ले जाती है। वह स्वयं कुछ नहीं करना चाहता है। “आलसी की लालसा उसकी मृत्यु का कारण होती है, क्योंकि हाथ परिश्रम करने से इनकार से इनकार करते हैं” (नीतिवचन 21:25)।

समय व्यर्थ गंवाना- एक आलसी व्यक्ति कार्य करते हुए बहुत शीघ्र ही अन्य बातों में विचलित हो जाता है। एक कार्य को समाप्त करना कठिन होता है। वह समय को बर्बाद करता है, यह इसलिए नहीं कि वह कार्य नहीं कर सकता है लेकिन इस कारण से, क्योंकि वे कार्य करना पसन्द नहीं करते हैं। नये काम सीखने से बचते हैं। आलसी व्यक्ति सदैव नए काम सीखने से बचने का प्रयत्न करता है, क्योंकि यदि उसने नया काम सीख लिया तो उसको और अधिक काम करने पड़ सकते हैं।

      क्या हमारे जीवन में प्रतिदिन हमारे जीवन में इस तरह की बातें दिखती हैं? यदि हाँ, तो ये लक्षण प्रकट करते हैं कि हम एक आलसी व्यक्ति की श्रेणी में हैं। हमें ध्यान रखना है कि आलस्य पाप है जिससे सब संघर्ष करते हैं और जो इसके दास हैं वे बर्बादी के रास्ते में हैं।

      हमें यह ध्यान रखना है कि परमेश्वर ने काम बनाया है। इसलिए, यदि जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित कार्य को नहीं करता है तो वह आलसी है और आलस्य पाप है। परमेश्वर ने हमारी सृष्टि की है कि हम कार्य करें। इसलिए आइए, हम स्वयं को जाँचे और यदि हम आलस्य से संघर्ष कर रहे हैं तो हमें प्रभु यीशु की ओर दृष्टि करने की आवश्यकता है। पश्चाताप करने की आवश्यकता है और प्रभु की महिमा के लिए अपने छोटे जीवन में कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता है। हम कार्य करने के लिए एक छोटे से जीवों से सीख लेने की आवश्यकता है। “हे आलसी, चींटी के पास जा। उसके कार्यों को ध्यान से देख और बुद्धिमान बन।” (नीतिवचन 6:6)

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