शान्त मनन क्या है?

शान्त मनन हमारे ख्रीष्टीय जीवन का एक अभिन्न अंग है, जो हमारे जीवन में आत्मिक उत्साह को भरता है और हमें प्रतिदिन परमेश्वर के वचन में परमेश्वर के मुख को देखने तथा उसके साथ संगति करने के लिए प्रेरित करता है।

शान्त मनन के बारे में बहुत सी भ्रम पाए जाते हैं, इसलिए हम ख्रीष्टीय लोगों को इस बात से अवगत होना चाहिए और अपने आप से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि शान्त मनन क्या नहीं है और क्या है और हमारे मसीही जीवन में इसके क्या लाभ होते हैं। यह लेख इन्हीं तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों का संक्षिप्त उत्तर प्रदान करेगा –

परमेश्वर के वचन को समझने और उसे जीवन में लागू करने और उन वचनों के आधार पर परमेश्वर से प्रार्थना करने के उद्देश्य से पवित्रशास्त्र में प्रगट सत्यों पर गहन विचार करना ही मनन कहलाता है।

शान्त मनन क्या नहीं है?

जैसे कि मैं पहले कह चुका हूँ कि हमारे मसीही समाज में शान्त मनन को लेकर कई भ्रम पाए जाते हैं। इसलिए हमारे लिए यह आवश्यक हो जाता है कि हम शान्त मनन के विषय में प्रश्न को पूछें कि शान्त मनन क्या नहीं है?

यदि हम बाइबल के आधार पर शान्त मनन के बारे में विचार करें, तो इस बात को जानने पाएंगे कि शान्त मनन प्रति सुबह योगा करना नहीं है या अपने मस्तिष्क को खाली करना नहीं है। शान्त मनन करना परमेश्वर का अनुग्रह कमाना नहीं है। हमारे मन में स्वतः यह प्रश्न उठता है कि अन्ततोगत्वा  शान्त मनन है क्या?

शान्त मनन क्या है?

परमेश्वर के वचन को समझने और उसे जीवन में लागू करने और उन वचनों के आधार पर परमेश्वर से प्रार्थना करने के उद्देश्य से पवित्रशास्त्र में प्रगट सत्यों पर गहन विचार करना ही शान्त मनन कहलाता है। सामान्य रूप से, प्रति भोर एक शिष्य के भांति परमेश्वर की आवाज़ को सुनना अर्थात् उसके वचनों विचार करना शान्त मनन है (यशायाह 50:4)। शान्त मनन वह समय है, जब हम परमेश्वर के साथ सहभागिता व संगति करते हैं। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर उस पर मनन करते हैं। वचन के आधार पर परमेश्वर से प्रार्थना के द्वारा बातचीत करना है।

अन्तत: शान्त मनन परमेश्वर की व्यवस्था अर्थात् वचन में आनन्दित होना और उस पर मनन या विचार करना है (भजन संहिता 1:2)। अपने आप को परमेश्वर के वचन का प्रचार करना और उसके अनुसार जीवन व्यतीत करना है। अपने व्यक्तिगत जीवन में परमेश्वर को प्राथमिकता देने के द्वारा परमेश्वर की आराधना करना है।

मानवीय दृष्टिकोण से जब हम कोई काम करते हैं, तो हम प्रायः इस बात को जानने की उत्कण्ठा होती है कि इससे लाभ क्या होगा? क्यों हम इसे करें? यदि हम शान्त मनन ही करें तो इससे हमें क्या लाभ होगा? आइए हम जानें शान्त मनन के लाभों को –

शान्त मनन के लाभ:

ख्रीष्टीय जीवन में शान्त मनन के अनेकों लाभ पाए जाते हैं –

ख्रीष्ट के जैसे बनने में सहायक: शान्त मनन में जितना अधिक हम परमेश्वर की आवाज को उसके जीवित वचन को पढ़ने के द्वारा सुनते हैं, मनन करते हैं, उतना ही अधिक हम परमेश्वर के गुणों को जानते जाते हैं और अपनी भ्रष्टता व पापपूर्ण स्थिति से अवगत होते हैं। शान्त मनन हमारी सहायता करता है स्वयं को समझने और स्वयं का मूल्यांकन करने या जांचने हेतु (यिर्मयाह 17:9-10)। परमेश्वर पवित्र आत्मा उन वचनों को लेकर हमारे हृदय को हमारे पापों के प्रति कायल करता है।

परमेश्वर का वचन और परमेश्वर पवित्र आत्मा हमारी सहायता करता है कि हम उन पापों पर विजय को प्राप्त करें और ख्रीष्ट के जैसे पवित्र होते जाएं अर्थात् ख्रीष्ट के स्वभाव में निरन्तर बढ़ते जाएं। पवित्र आत्मा उन्हीं वचनों को लेकर हमारे जीवन में सामर्थ्य के साथ कार्य करता है और हमें परिवर्तित करता जाता है। इसलिए शान्त मनन अर्थात् परमेश्वर के वचन पर निरन्तर मनन करना चाहिए।

आत्मिक उन्नति में सहायक: शान्त मनन का दूसरा मुख्य लाभ यह है कि यह हमारे सम्बन्ध को परमेश्वर के साथ दिन प्रतिदिन तरो-ताज़ा व स्वस्थ बनाता है। हमें आत्मिक आनन्द करता और हमारे मन को हरा-भरा कर देता है (भजन संहिता 19:8-8)। इसलिए मैं आपको उत्साहित करना चाहूंगा कि परमेश्वर के वचन को नियमित रूप से पढ़िए और उस पर मनन कीजिए।

हमें परमेश्वर के निकट लाता है। हमें पाप के प्रति संवेदनशील बनाता है। हमें पाप से दूर रखता है, क्योंकि जितना अधिक हम परमेश्वर के साथ समय व्यतीत करते हैं, उतना ही अधिक हम पाप से दूर रहते हैं। इस संदर्भ में एक प्रभु के सेवक न कहा कि “या तो परमेश्वर का वचन तुम्हें पाप से दूर रखेगा या फिर पाप तुम्हें परमेश्वर के वचन से दूर रखेगा”।

ख्रीष्ट यीशु में, प्रिय भाई बहनो, हमें भजनकार भजन 119:9-11 में अवगत कराता है कि हम पाप से विजय कैसे पाएंगे, अपनी चाल को कैसे शुद्ध रख सकते हैं? कैसे हम पाप से बच सकते हैं? उत्तर यह है कि परमेश्वर के वचन के अनुसार चलने के द्वारा उसके वचनों अपने हृदय में संचित करने के द्वारा। इसलिए, मैं आपको उत्साहित करना चाहूँगा नियमित रूप से परमेश्वर के वचन को अवश्य पढ़ें और विचार करें। जिससे शान्त मनन के माध्यम से हम आत्मिक रूप से उन्नति करते जाएं और बलवान होते जाएं और ख्रीष्ट के जैसे नित्य अंश अंश करके परिवर्तित होते जाएं।

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