क्या वास्तव में बाइबल परमेश्वर का वचन है?

हमारे आधुनिक व बहु-साम्प्रदायिक समाज में, प्रायः यह प्रश्न पूछा जाता है कि क्या वास्तव बाइबल परमेश्वर का वचन है? क्या हम बाइबल पर वास्तव पर भरोसा कर सकते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर देने तथा बाइबल के बचाव में अनेकों पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। एक प्रभु के सेवक चार्ल्स स्पर्जन ने बाइबल के विषय में यह कहा कि “परमेश्वर का वचन सिंह के समान है। आपको सिंह की रक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। आपको बस इतना करना है कि सिंह को छोड़ दें, और सिंह अपनी रक्षा स्वयं करेगा।” इसलिए, मैं सोचता हूँ कि प्रत्येक विश्वासी को बाइबल की विश्वसनीयता के सन्दर्भ में विभिन्न प्रमाणों से आश्वस्त होना चाहिए कि यह परमेश्वर का वचन है,बाइबल विश्वासयोग्य है।

इस लेख हम इस बात को देखने का प्रयत्न करेंगे कैसे बाइबल परमेश्वर का वचन है? इस बात को जानने के लिए हमें किसी और के पास जाने आवश्यकता नहीं है। परन्तु इसका उत्तर बाइबल से ही पूछने की आवश्यकता है कि क्या तुम विश्वसनीय हो? क्या तुम परमेश्वर का वचन हो? सम्पूर्ण बाइबल स्वयं इस प्रश्न का सर्वश्रेष्ठ उत्तर देती है, आइए हम विस्तार से देखें:

पुराना नियम परमेश्वर का वचन होने का दावा करता है। 

बाइबल परमेश्वर का वचन है और यह सदाकाल के लिए अटल है। इस बात का दावा स्वयं पुराना नियम करता है कि “घास तो सूख जाती, और फूल मुर्झा जाता है; परन्तु हमारे परमेश्‍वर का वचन सदैव अटल रहेगा” (यशायाह 40:8)। पुराना नियम परमेश्वर का वचन है। भजन संहिता 19 में परमेश्वर हमसे दो प्रकार से बात करता है – पहला अपनी सृष्टि के माध्यम से (भजन 19:1-6),  दूसरा, अपने वचन (बाइबल) के माध्यम से (भजन 19:6-11)। परमेश्वर अपने लोगों से अपने वचनों के द्वारा बात करता है और बाइबल परमेश्वर का वचन है। यहोवा की व्यवस्था (लिखित वचन) खरी है। यहोवा के नियम (लिखित वचन) विश्वासयोग्य हैं। 

हमें परमेश्वर के लिखित वचन (बाइबल) की आवश्यकता है, जो परमेश्वर को और हमारे जीवन को जानने के लिए पर्याप्त है।

सृष्टि के द्वारा प्राप्त ज्ञान पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यह सीमित ज्ञान देता है। हमें परमेश्वर के विशेष प्रकाश की आवश्यकता है, हमें लिखित वचन की आवश्यकता है जो परमेश्वर और हमारे जीवन को जानने के लिए पर्याप्त है। पवित्रशास्त्र बाइबल परमेश्वर द्वारा दिया गया वचन है जो हमारे जीवन के सभी पहलुओं के लिए पर्याप्त है (2 तीमुथियुस 3:15-17)।

यह बाइबल परमेश्वर द्वारा दिए गए वचन हैं और जिसे मनुष्यों के द्वारा प्रलिखित किया गया है। और नये नियम के लेखकों में से प्रेरितों ने पुराने नियम को “परमेश्वर के वचन” के रूप में स्वीकार करते हैं (रोमियों 3:2)। यहाँ तक कि यीशु ख्रीष्ट ने भी अपनी शिक्षाओं के द्वारा पुराने नियम को परमेश्वर के वचन के रूप में प्रमाणित किया और पुराना नियम उनके विषय में होने दावा किया (लूका 24:44, मत्ती 22:29, मत्ती 5:17-18)। 

नया नियम पुराने नियम की तरह ही परमेश्वर का वचन होने का दावा करता है।

नया नियम पुराने नियम के जैसे ही आधिकारिक है। इस बात को निम्न स्थलों में देख सकते हैं – 1 कुरिं.14:37, 1थिस्स। 2:13, 2 पत. 3:16, 1 पत. 1:12, प्रका. 1:2,11-19। नया नियम प्रेरितों और प्रत्यक्षदर्शी द्वारा पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के द्वारा लिखा गया।  क्योंकि यीशु ने अपने शिष्यों से पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा की थी जो उन्हें उसके वचनों की याद दिलाता है और लेखकों ने उन्हीं बातों को नये नियम में लिखा (यूहन्ना 14:26, यूहन्ना 15:26-27, यूहन्ना 16:13)। यीशु ख्रीष्ट के वचन सदाकाल के लिए रहेंगे, क्योंकि ये ईश्वरीय वचन हैं। यीशु ख्रीष्ट ने स्वयं इस बात को कहा कि “आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, परन्तु मेरे वचन कभी न टलेंगे” (मत्ती 24:35)। अत: पुराने नियम के साथ ही नया नियम भी परमेश्वर का वचन है।

वचन (यीशु) और वचन (लिखित वचन – पवित्रशास्त्र) दोनों पूर्ण ईश्वरीय हैं।

जिस प्रकार यीशु ख्रीष्ट पूर्ण रूप से मनुष्य और पूर्ण रूप से परमेश्वर हैं, उसी प्रकार से परमेश्वर का लिखित वचन (बाइबल) भी पूर्ण रूप से मानवीय है और पूर्ण रूप से ईश्वरीय है। परमेश्वर के लिखित वचन के दो एक ही साथ दो लेखक हैं मानवीय लेखक और ईश्वर लेखक, इसका तात्पर्य यह है कि परमेश्वर ने मानवीय लेखकों को पवित्र आत्मा के द्वारा प्रेरित किया ताकि वे परमेश्वर के वचनों को प्रलेखित करें।

यूहन्ना 1:1-3,14 में यूहन्ना ने यीशु ख्रीष्ट को “वचन” के रूप में वर्णित किया है। परमेश्वर ने अपने पुत्र द्वारा बोला है जो अपने सामर्थी वचन के द्वारा सभी चीजों को बनाए रखता है (इब्रा.1:1-3)। यीशु परमेश्वर का सटीक प्रतिनिधित्व है। परमेश्वर ने स्वयं को यीशु में प्रकट कर दिया है, जिसे बाइबल में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र यीशु के के विषय में साक्षी देते हैं (यूहन्ना 5:39) इस अर्थ में वचन (लिखित वचन) वचन (यीशु) को इंगित करता है।

यीशु ख्रीष्ट (वचन) पूर्ण रूप से मनुष्य हैं और पूर्ण रूप से परमेश्वर हैं वैसे ही वचन (लिखित वचन – बाइबल) भी पूर्ण रूप से मानवीय और पूर्ण रूप से ईश्वरीय है। परमेश्वर के वचन (यीशु) का मनुष्यत्व हर पृष्ठ पर स्पष्ट है। साथ ही, पवित्र आत्मा ने प्रत्येक लेखक में यह सुनिश्चित करने के लिए कार्य किया कि जो वचन लिखे जा रहे हैं वे पूरी तरह से सत्य हैं। प्रकाशितवाक्य 21:5 बताता है कि यीशु ने कहा – “… इसे लिख, क्योंकि ये वचन विश्वासयोग्य और सत्य हैं”। परमेश्वर ने सुनिश्चित किया है कि उसके वचन लिखित रूप में सुरक्षित रहें क्योंकि वे अनन्त जीवन और अनन्त मृत्यु के विषय हैं (यूहन्ना 6:68-69)। यीशु के पास अनन्त जीवन के वचन हैं। और परमेश्वर ने हमारे लिए अपने वचन को सुरक्षित रखा है।

एक ख्रीष्टीय होना किसी पुस्तक को जानने के विषय में नहीं है, किन्तु एक व्यक्ति को जानने के बारे में है कि यीशु कौन है। हम यीशु को बाइबल के अलावा नहीं जान सकते हैं, क्योंकि स्वयं यीशु कहते हैं, सम्पूर्ण बाइबल यीशु के विषय में साक्षी देती है। परमेश्वर वास्तव में परमेश्वर है, और बाइबल वास्तव में उसका वचन है। यह पुराना नहीं है, यह आज भी वैसे ही नया है। परमेश्वर का वचन हमारे लिए सदैव सत्य और प्रासंगिक है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि उसने हमारे लिए अपने वचन को सुरक्षित रखा है। इसलिए परमेश्वर के वचन बाइबल पर भरोसा रखे और उसे पढ़ें तथा परमेश्वर के वचन (यीशु) को जानें और उसमें बढ़ते जाएं।

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