बच्चों से व्यवहार कैसे करें?

यह एक सामान्य बात है कि हम सब भिन्न समयों में बच्चों के साथ समय व्यतीत करते हैं, बातचीत करते हैं और उनके साथ उठते बैठते हैं। उन बच्चों से हम आयु में बड़े होते हैं, जीवन को लेकर हमारा अनुभव उनसे अधिक होता है, हमारा ज्ञान उनसे अधिक होता है। कई बार, इन कारणों से, बच्चों के साथ हमारा व्यवहार कठोर, अनुग्रह रहित, प्रेम रहित, घमण्ड से भरा, क्रोध से भरा हुआ होता है जो एक ख्रीष्टीय चरित्र को प्रदर्शित नहीं करता है। इस लेख के द्वारा हम यह देखने का प्रयास करेंगे कि बच्चों के साथ या उनके मध्य हमें कैसे व्यवहार करना चाहिए। 

हमारा व्यवहार आदरपूर्ण होना चाहिए 

यदि हम बच्चों में भेद-भाव करते हैं, तो यह उनका निरादर है। क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें भी अपने स्वरूप में रचा है और उनसे प्रेम करता है, हमें उनका आदर करना चाहिए। इस आदर को हमें अपने व्यवहार के द्वारा प्रदर्शित करना चाहिए और ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए जो अपमानजनक हो। कई बार ऐसा होता है कि हम बच्चों को कुछ ऐसा बोल देते हैं या हमारा व्यवहार उनसे इस प्रकार का होता है जिससे यह प्रतीत होता है वे तुच्छ हैं, वे हमारे सामने कुछ नहीं हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि हम यह मान लेते हैं कि ये तो बच्चे हैं और उनमें यह साहस नहीं है कि वह हमें कोई प्रतिउत्तर दे, इसलिए हम जो चाहे उन्हें बोल देते हैं या जैसा चाहे उनके साथ व्यवहार करते हैं। इस रीति से उनके साथ हमारा व्यवहार अनादरपूर्ण होता है। परन्तु इसके विपरीत, हमारा व्यवहार बच्चों के साथ आदरपूर्ण होना चाहिए और हमें तुच्छ दृष्टि से बच्चों को नहीं देखना चाहिए। यह एक सुसमाचार केंद्रित व्यवहार है। 

हमारा व्यवहार अनुग्रह भरा होना चाहिए 

यह बहुत स्वाभाविक बात है कि बड़ों की तुलना में बच्चों की समझ और बुद्धि में कमी होती है और इस कारण, कभी-कभी उनसे कुछ भूल हो जाती है, वह कुछ ऐसा कर देते हैं या कह देते हैं जो सही नहीं होता है। ऐसी परिस्थिति में हमें (बड़ों को) उनके प्रति अनुग्रह दर्शाना चाहिए; उन्हें उनकी भूल के लिए क्षमा करना चाहिए। कई बार हम ऐसा नहीं करते हैं। हम क्रोध से भर जाते हैं, हम उनकी भूल को सह नहीं पाते हैं। बच्चों का वह नासमझ व्यवहार, उनकी भूल, उनके अनुचित बातों या व्यवहार हमें अपमानजनक लगता है और हम क्रोध से भर जाते हैं। हम उनको उनकी भूल के लिए क्षमा नहीं करते, उन पर दया नहीं दिखाते और हमारा व्यवहार अनुग्रहरहित हो जाता है। हम भूल जाते हैं कि परमेश्वर ने हमारे ऊपर कितना अनुग्रह किया है। उसने हमारे असंख्य अपराधों को क्षमा किया है। इसलिए हमें भी वही क्षमा और अनुग्रह को अपने व्यवहार में प्रदर्शित करना चाहिए, बच्चों के साथ अपने व्यवहार में अनुग्रह को प्रदर्शित करना चाहिए। हमें बच्चों को डांटकर, डराकर, भय दिखाकर उन्हें हतोत्साहित नहीं करना चाहिए, वरन अनुग्रह दिखाते हुए उन्हें समझाना चाहिए, उन्हें बताना चाहिए कि वे अपनी त्रुटियों को कैसे सुधार सकते हैं। बच्चों के प्रति इस प्रकार का व्यवहार उन्हें प्रोत्साहन देगा, उन्हें अपनी भूल को समझने के लिए सहायता करेगा। यह एक सुसमाचार केंद्रित व्यवहार है। 

हमारा व्यवहार अनुशासन और प्रेम-पूर्ण होना चाहिए 

कई बार यह भी पाया जाता है कि लोग बच्चों के प्रति अपने व्यवहार में जब प्रेम दर्शाते हैं, तो वह बच्चों के जीवन में सुधार की आवश्यकता को ध्यान नहीं देते हैं। उनके व्यवहार में इतना प्रेम होता है कि वह बच्चों को सुधारना नहीं चाहते हैं और उन्हें अपने मन की हर इच्छा को पूरी करने की स्वतंत्रता दे देते हैं। ऐसा व्यवहार भविष्य में बच्चों के लिए हानिकारक बन जाता है। बड़े होकर वह कभी भी सीखना नहीं चाहते हैं, क्योंकि उनको लगने लगता है कि यदि कोई उनसे सुधार की बात करता है तो वह व्यक्ति ठीक नहीं है। इसलिए बड़ों को यह ध्यान रखना है की बच्चों के प्रति उनके व्यवहार में प्रेम हो, पर अनुशासन भी हो। बच्चों को अनुशासित करना प्रेम का ही भाग है। उन्हें आवश्यकता अनुसार अनुशासित करना प्रेम का व्यवहार है। यह बच्चों के सुधार और उन्नति के लिए है। यह अनुशासन प्रेमपूर्वक होना आवश्यक है। बच्चों के साथ अनुशासन को दर्शाने में हमें समझदारी और बुद्धि को दर्शाना होगा। हमारा अनुशासन क्रोध और आक्रात्मक नहीं होना चाहिए। अगर हम क्रोध में होकर बच्चों के साथ अनुशासन का व्यवहार करने लगे, तो यह संभव है कि हम क्रोध में आकर अपना नियंत्रण खो दें और शारीरिक हानि करें या फिर क्रोध में बच्चों के प्रति हमारे मुख से अपशब्द निकलें। इस कारण हमारा अनुसाशन भी प्रेम से भरा हुआ होना चाहिए। जिसके द्वारा बच्चों के जीवन में हम सुधार को भी ला सकें। यह एक सुसमाचार केंद्रित व्यवहार है। 

निष्कर्ष 

बच्चों के साथ व्यवहार की बात जब आती है, तो यह बड़ों से अपेक्षा की जाती है कि हम अपनी आत्मिक परिपक्वता को दर्शाएं। हमारे व्यवहार में उनके प्रति आदर, अनुग्रह, प्रेमपूर्ण अनुशासन होना चाहिए। यदि हम उनको तुच्छ, हीन, बुद्धिहीन इत्यादि समझते हैं, उनको क्रोध से भरा प्रतिउत्तर देते हैं तो फिर हम उनके सामने परमेश्वर का प्रेम भी प्रदर्शित नहीं कर सकेंगे। हमारे बुरा व्यवहार बच्चों के सामने एक सच्चे सुसमाचार का सही चित्रण नहीं होगा। 

अतः हम प्रयास करें कि बच्चों के प्रति हम अपने व्यवहार में सुधार को ला सकें और उनके प्रति अपने व्यवहार से परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित कर सकें। 

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