कष्टों के मध्य में भी परमेश्वर सम्प्रभु है।

यदि वास्तव में परमेश्वर सर्वसामर्थी और सभी बातों को निर्देशित करने वाला और नियंत्रित करने वाला सम्प्रभु परमेश्वर है तो संसार में क्लेश और पीड़ा क्यों पाये जाते हैं?

परमेश्वर के विषय में हमारा दृष्टिकोण हमारे जीवन को प्रभावित करता है। वह ‘परमेश्वर’ जिसे हम ख्रीष्टीय लोग हृदय और मन में चित्रित करते हैं – वह ‘परमेश्वर’ जिसे हम अपने विचारों, दृष्टिकोणों और निर्णयों को आकार देने की अनुमति देते हैं; जब वह परमेश्वर हमारे जीवन में छोटा होता जाता है, तो यह हमारे जीवन को भी प्रभावित करता है। इसलिए हमें बाइबल के परमेश्वर पर फिर से ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

हम ख्रीष्टीय लोगों को कष्ट से छुटकारा देने वाले ईश्वर, चंगाई देने वाले ईश्वर और जीवन को समृद्ध बनाने वाले ईश्वर को ढ़ूढ़ने की अपेक्षा बाइबल के परमेश्वर को देखने और जानने की आवश्यकता है। हमें ऐसे परमेश्वर की आवश्यकता है जिसने स्वयं को अपने वचन में प्रकट किया है।

जब परमेश्वर हमारे जीवन में छोटा होता जाता है, तो यह हमारे जीवन को भी प्रभावित करता है। इसलिए हमें बाइबल के परमेश्वर पर फिर से ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हमारे मनों को सर्वप्रथम परमेश्वर के वचन के द्वारा ढ़ाला जाना चाहिए या आकार लेना चाहिए। जब हमारे मनों और हृदयों में परमेश्वर छोटा हो जाता है, तो स्वतः हम लोग बड़े हो जाते हैं, इसके साथ ही साथ हमारी कठिन परिस्थितियाँ तथा अनेक प्रकार की बातें बड़ी दिखाई देने लगती हैं। इसलिए हमें परमेश्वर के वचन के द्वारा सूचित होने और उसके वचन के आधार पर हमारे हृदय व मनों को ढ़ाले जाने की आवश्यकता है। मेरा कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे जीवन में परमेश्वर बड़ा अर्थात् सर्वोपरि होना चाहिए। परमेश्वर के वचन के आधार पर ही हमें अपने ख्रीष्टीय जीवन में क्लेश, संघर्ष, दुखों हेतु एक दृढ़ नींव रखने की आवश्यकता है।

हम सभी कष्टों और संघर्षों से होकर जाते हैं। वास्तविक लोग संघर्ष करते हैं। इसलिए यह सब हमें सोचने हेतु बाध्य करता है कि अन्ततोगत्वा दुख क्यों हैं?

हमारे दुखों में भी परमेश्वर के भले उद्देश्य पाए जाते हैं। संसार में केवल भली बातों के पीछे ही परमेश्वर का हाथ नहीं है, परन्तु हम जिन कठिनाईयों में होकर जाते हैं, उन सबके पीछे भी परमेश्वर का ही हाथ है, वही समस्त बातों को नियंत्रित करता है। प्रायः परमेश्वर अपने बच्चों को आकार देने के लिए, हमें अपने पुत्र यीशु के समान बनाने के लिए कष्टों का उपयोग करता है (2 कुरि. 1:8-9, 12:7-11)।

प्रायः परमेश्वर अपने बच्चों को आकार देने के लिए, हमें अपने पुत्र यीशु के समान बनाने के लिए कष्टों का उपयोग करता है।

परमेश्वर लोगों को यीशु की ओर खींचने के लिए परमेश्वर के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए दुख का उपयोग करता है। परमेश्वर हमसे बात करने और अपने उद्देश्यों को पूरा करने और यीशु के निकट आने के लिए कष्ट और पीड़ा का उपयोग करता है (फिलि. 1:14, यूहन्ना 4:1-26, प्रेरितों के काम 8:1)। पौलुस ख्रीष्ट की देह, कलीसिया के लिए अपने दुखों में आनन्दित होता है (कुलु.1:24)।

अंत में, परमेश्वर अपने पुत्र, प्रभु यीशु मसीह के लिए महिमा प्राप्त करने के लिए कष्टों का उपयोग करता है (प्रकाशितवाक्य 5:9-12)। हमारे जीवन के कष्टों में भी परमेश्वर के भले उद्देश्य निहित होते हैं। इसलिए कष्टों और पीड़ा के मध्य भी परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च दृष्टिकोण रखें। अपने हृदय और मनों को परमेश्वर के वचन के द्वारा सूचित होने दे और आकार लेने दें। बाइबल के परमेश्वर को जानें जो प्रत्येक परिस्थितियों में भी बड़ा और सम्प्रभु है।

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