स्वयं को दीन करो और उपवास करो

घमण्ड को भेदने हेतु परमेश्वर का न भानेवाला उपहार 

क्या मैं दीन हूँ?  इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। पहली बात, दीन लोग स्वयं के विषय में सोचने में अधिक समय नहीं व्यतीत करते हैं, विशेष रीति से अपनी दीनता के बारे में। परन्तु पूछे जाने के लिए समय-ब-समय यह प्रश्न निर्माणात्मक हो सकता है। और तब क्या होगा जब आप अगला आत्म-मूल्यांकन यह पूछने के द्वारा आरम्भ करें कि “पिछली बार मैंने कब उपवास किया था?” 

उपवास रखना, बाइबलीय रीति से बात करें तो, यह आत्म-दीनता का एक कार्य है। प्रार्थना, हम कह सकते हैं कि आत्म-दीनता का सर्वोत्कृष्ट कार्य है, जब हम परमेश्वर से अपनी अक्षमता को अंगीकार करते हैं और परमेश्वर को निर्णायक सामर्थ्य के लिए श्रेय देते हैं। यद्यपि, प्रार्थना में कुछ तीव्रता, जो असामान्य निराशा के दिनों में उत्पन्न होती है, विशेष रूप से आत्म-दीनता ला सकती है। और इस प्रकार की प्रार्थनाएं, पवित्रशास्त्र में, प्राय:  उपवास के साथ पायी जाती हैं। 

इसलिए, बिना सटीक मापने वाली छड़ी हुए, उपवास निस्संदेह वास्तविक दीनता का एक अच्छा संकेतक हो सकता है। आत्म-दीनता के कार्य के रूप में आप चाहे उपवास के बारे में नए सिरे से या पहली बार विचार कर रहे हों, पुराने नियम के उन चार खण्डों को पुनः देखना मूल्यवान हो सकता है जिन्हें प्रायः अनदेखा किया गया है, जो स्पष्ट रूप से उपवास को आत्म-दीनता से जोड़ते हैं। 

इतना दुष्ट कोई नहीं
पहला खण्ड सबसे आश्चर्यजनक स्थान में आता है, इस्राएल के सम्पूर्ण समय काल में सबसे निकृष्टम लोगों में से एक के जीवन में: अहाब, जिसका नाम ही दुष्टता के लिए लोक प्रसिद्ध हो गया था। इस्राएल के इतिहास में कुछ ही अगुवे इस प्रकार की भृष्टता की गहराई में उतरे थे। 1 राजा 21 में, राजा अहाब ने नाबोत नाम के एक व्यक्ति की दाख की बारी को पाने की इच्छा की, क्योंकि यह उसके महल के पास था। जब नाबोत ने उसे बेचने से मना कर दिया, तो अहाब की दुष्ट पत्नी ईज़ेबेल, नाबोत पर झूठा आरोप लगवाती है और उसका पत्थरवाह करवा देती है। जब वह मर जाता है, तो अहाब उसकी दाख की बारी पर अधिकार जमा लेता है। 

इसके बाद परमेश्वर अहाब से बात करता है, राजा के मुख्य विरोधी, एलिय्याह नबी के द्वारा: 

यहोवा यह कहता है, “क्या तू ने हत्या की और अधिकार भी कर लिया? . . . देख, मैं तुझ पर विपत्ति डालूंगा और तुझे पूरी रीति से मिटा डालूंगा और अहाब के घर के प्रत्येक लड़के को अर्थात् इस्राएल के बंधुवों और स्वतंत्र दोनों को नाश करूंगा।” (1 राजा 21:19,21) 

वर्णनकर्ता हमें स्मरण दिलाता है कि, जब हम अहाब के प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करते हैं, “सचमुच अहाब के समान और कोई न था जिसने अपने आप को वह काम करने के लिए बेच डाला जो यहोवा की दृष्टि में बुरा था” (1 राजा 21:25)। हम सोच सकते हैं कि इतना दुष्ट राजा, उद्दण्डता का ऐसा जीवन, निश्चित रूप से, वह इस न्याय को अनदेखा देगा। हो सकता है कि वह नबी के चेहरे पर भी थूक भी दे, या उसकी हत्या करने का प्रयत्न भी करे।

इतना दयालु कोई नहीं 
इसके विपरीत, वह हुआ जिसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता था। “जब अहाब ने इन वचनों को [एलिय्याह से] सुना तो उसने अपने वस्त्र फाड़े और टाट ओढ़ कर उपवास किया और टाट ओढ़े ही पड़ा रहने लगा और दबे पांव चलने लगा” (1 राजा 21:27)। अहाब ने स्वयं को दीन किया और परमेश्वर के सामने उपवास रखा। और जितना कि इस दुष्ट राजा की दीनता अनपेक्षित हो सकती है, परमेश्वर की प्रतिक्रिया और भी अधिक आश्चर्यजनक होती है। परमेश्वर एलिय्याह से पुन: बात करता है, 

क्या तू ने देखा है कि अहाब मेरे सामने कैसा दीन बन  गया है? क्योंकि उसने मेरे सामने अपने आप को दीन बनाया  है, इसलिए मैं वह विपत्ति उसके जीवनकाल में उस पर न डालूंगा, परन्तु मैं उसके घराने पर उसके पुत्र के दिनों में वह विपत्ति डालूंगा। (1 राजा 21:29)

निश्चित रूप से, एक नपा-तुला हुआ वचन, किन्तु फिर भी एक चौंकाने वाली दया। राजवंश से विपत्ति हटाई नहीं जाती है, किन्तु यह अहाब के लिए है। दया दिखाने के लिए हमारा परमेश्वर कितना तत्पर है, यहाँ तक उस पर भी जिसने इतना बुरा किया था जितना कि किसी और ने नहीं किया था। परमेश्वर ने अहाब की आत्म-दीनता  को देखा, जो उपवास के माध्यम से प्रकट हुआ, और परमेश्वर ने विपत्ति को रोक दिया। 

आत्म-दीनता के रूप में उपवास रखना
उपवास, न केवल अहाब के लिए वरन सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में, आत्मिक उद्देश्य हेतु भोजन से कुछ समय के लिए अलग रहना है। हो सकता है कि कोई अन्य अभ्यासों से जो कि वैसे तो भली हैं स्वयं को अलग रखे, परन्तु भोजन से  उपवास रखना विशेष रूप से उचित है। भोजन जीवन के लिए महत्वपूर्ण है, फिर भी परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसी क्षमता से युक्त किया है कि (भले ही वह अप्रिय अनुभव क्यों न हो) वह कई दिनों तक बिना भोजन के रह सकते हैं, यहां तक कि तीन सप्ताह तक। (इसके विपरीत, हम बिना श्वास लिए कुछ ही मिनटों तक रह सकते हैं, और कुछ दिनों तक पानी के बिना रह सकते हैं।)

जिस प्रकार परमेश्वर ने हमारे शरीर को भोजन के लिए बनाया है, उसी प्रकार उसने उन्हें उपवास के लिए भी बनाया है। परन्तु उपवास करना सामान्य अवस्था नहीं है। यह उपाय अस्थायी और कभी-कभार के लिए है परमेश्वर को कुछ विशेष रीति से ढूँढने के लिए। उपवास यह घोषणा करता है, “परमेश्वर, आप दैनिक रोटी जैसी आधारभूत बात से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं—जिसको मैं त्याग रहा हूँ यह समझते हुए कि मुझे आपकी और अधिक विशेष आवश्यकता है।”

उपवास आत्म-दीनता का एक कार्य है परमेश्वर के सम्मुख अपनी आवश्यकता को उद्घोषित करने के द्वारा, और नये सिरे से यह दिखाने के द्वारा कि वास्तव में हम कितने निर्बल हैं — जब हम खाली पेट के कारण आने वाली उत्कंठा और चिड़चिड़ेपन का अनुभव करते हैं । 

उत्तरदायी उपवास 
सम्भवत: आज ख्रीष्टीय लोग साधारणतः उपवास को (यदि हम इसके विषय में सोचते भी हैं तो) एक निर्धारित अभ्यास के रूप में देखते हैं। पुरानी वाचा के नियमों के अन्तर्गत, परमेश्वर के लोगों ने पूर्वनिर्धारित उपवास का पालन किया। इसलिए, आज भी कुछ लोग (काश उनकी संख्या में वृद्धि हो जाए) साप्ताहिक या मासिक उपवास करते हैं, चाहे व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से। 

किन्तु अहाब की आत्म-दीनता का आश्चर्यजनक कार्य उपवास के विषय में विचार करने हेतु एक अन्य महत्वपूर्ण ढंग बताता है, जिसे प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है: उपवास एक प्रति-उत्तर के रूप में  करना जब परमेश्वर हमें दीन करता है। अहाब के तिथिपत्र में यह उपवास नहीं उपस्थित था। यह उसकी योजना या पहल नहीं थी। परमेश्वर बिना बुलाए आया और उसके पाप की पद्धति को बाधित किया। परमेश्वर के नबी ने उसका सामना किया, उसके पाप को उजागर किया, और न्याय की घोषणा की। सबसे पहले, परमेश्वर ने अहाब को दीन किया। उसके पश्चात, राजा ने उपवास रखने के द्वारा प्रतिउत्तर दिया। 

और, कम से कम इस क्षण में, अहाब का उपवास एक हृदय की वास्तविक नम्रता की अभिव्यक्ति थी। उसके उपवास ने परमेश्वर की दया को अर्जित  नहीं किया। इसके विपरीत, यह हृदय को अभिव्यक्त करने का एक बाहरी माध्यम था जिसने अपने पाप के विरुद्ध परमेश्वर के दीन करने वाले शब्दों को प्राप्त किया था। अहाब ने टाट ओढ़ा, और बिना भोजन के रहा, परमेश्वर के विरुद्ध अपने अपराध की गम्भीरता को अंगीकार करने के लिए तथा पश्चात्तापी हृदय को प्रदर्शित करने के लिए। और परमेश्वर ने यह देखा और इसका सम्मान किया — यहाँ तक कि अहाब जैसे व्यक्ति के लिए भी — तथा ऐसा करने के द्वारा अपनी दया की व्यापकता और तत्परता को प्रकट किया ताकि आज भी हमें उपवास हेतु प्रेरित होना चाहिए। 

तीन दिशाओं में उपवास करना
1 राजा 21 अध्याय के अतिरिक्त, तीन अन्य खण्ड स्पष्ट रूप से उपवास और आत्म-दीनता के विषय में बात करते हैं। पहला खण्ड, भजन 69:10 में पश्चात्ताप व्यक्त करने के लिए भीतरी ध्यान केन्द्रित या उन्मुखीकरण की बात की जाती है, जिस प्रकार अहाब ने उपवास किया था। दाऊद कहता है, “मैं रोया और उपवास के साथ स्वयं को दीन किया ।” यह उत्तरदायी उपवास का सबसे सामान्य और आधारभूत रूप है। परमेश्वर कुछ गम्भीर और/या लम्बे समय तक चलने वाले पाप की प्रक्रिया का एक नया बोध देता है, और इसके परिणामस्वरूप जो उपवास किया जाता है वह उस पाप, अविवेकपूर्ण कार्य या त्रुटि के लिए वास्तविक दुख को व्यक्त करता है। 

यद्यपि, भजन 69 में दाऊद का उपवास पूर्ण रूप से अहाब के नाई सरल नहीं है। दाऊद का उपवास उसके शत्रुओं से प्राप्त होने वाले उस दुर्व्यवहार पर दुःख की अभिव्यक्ति भी हो सकता है, जिन्होंने उसके पाप (और उपवास) को उसके विरुद्ध पाप करने का अवसर बना दिया (भजन 69:10-11)। यह उपवास की दूसरी बड़ी श्रेणी है, बाहरी उन्मुखीकरण के साथ, और कठिन प्रावधानों के प्रति शोक करना। ऐसा उपवास पीड़ादायक परिस्थितियों में शोक के लिए वाणी प्रदान करता है, जैसे कि शाऊल की मृत्यु के लिए सात दिन का उपवास (1 इतिहास 10:12), या जब यहूदियों को नाश करने के लिए हमान की राजाज्ञा निकली (एस्तेर 4:3; इन्हें भी देखें भजन 35:13-14; एज्रा 9:2-5)। 

परमेश्वर के अनुग्रह को खोजते हुए, उपवास की तीसरी प्रमुख श्रेणी में अग्र उन्मुखीकरण होता है। बेबीलोन से बाहर निकलने से पहले, एज्रा ने उपवास की घोषणा की, “कि हम अपने परमेश्वर के सामने अपने को दीन करें, और उस से अपने तथा अपने बाल-बच्चों तथा अपनी समस्त सम्पत्ति के लिए सुरक्षित यात्रा की विनती करें” (एज्रा 8:21)। यहां उपवास एक गहनता प्रदान करने का कार्य करता है उन “अग्रस्थ” प्रार्थनाओं के साथ जो परमेश्वर के मार्गदर्शन, यात्रा के लिए दया, और उसके अनुग्रह भरे हाथ के लिए हैं। एज्रा कहता है, “इसी बात को लेकर हमने उपवास किया और अपने परमेश्वर से विनती की, और उसने हमारी सुनी” (एज्रा 8:23)। इस प्रकार का उपवास आत्मनिर्भरता का त्याग करता है और वांछित परिणाम को उत्पन्न करने हेतु या उसके विषय में भविष्यवाणी करने में हमारी अक्षमता को स्वीकार करता है (याकूब 4:13-16)। 

उपवास इतनी शीघ्रता से नहीं 
अंत में, उपवास और आत्म-दीनता को जोड़ने वाला चौथा खण्ड यशायाह 58:3-5 है, जो हमें इस बात के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी देता है कि उपवास क्या नहीं   है। 

राष्ट्र का तीव्र गति से पतन हो रहा है, और लोगों के हृदय विभाजित हैं। परमेश्वर के प्रति उनकी भक्ति खोखला तथा एक बाहरी दिखावा बन गयी है। वे दीन हृदय को व्यक्त करने के विपरीत परमेश्वर को धूर्तता से प्रभावित करने के लिए उपवास करते हैं — और परमेश्वर इसका आदर नहीं करता है। वे परमेश्वर से पूछते हैं, “हमने क्यों उपवास किया जबकि तू ने दृष्टि की ही नहीं? हमने अपने आपको कष्ट क्यों दिया जबकि तू ने कुछ ध्यान नहीं दिया?” (यशायाह 58:3)। परमेश्वर अपने नबी के द्वारा उत्तर देता है, 

देखो, अपने उपवास के दिन तुम अपनी ही इच्छा पूरी करते हो, और अपने सेवकों को ही कष्ट देते हो. . . . जैसा उपवास तुम आजकल रखते हो उस से तुम्हारी प्रार्थना ऊपर नहीं सुनाई देगी। जो उपवास मैं चाहता हूं क्या वह यही है अर्थात् ऐसा दिन जिसमें मनुष्य स्वयं को दीन करे? (यशायाह 58:3-5)

दूसरे शब्दों में, आपका उपवास केवल स्वयं की लालसाओं की सेवा करने के लिए एक दिखावा है, न कि दीन हृदयों की सच्ची अभिव्यक्ति। दीनता के बिना, केवल बाहरी कार्य, व्यर्थ हैं। इस तरह के कार्यों से परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त नहीं किया जा सकता। वह हृदय को देखता है — जैसा कि उसने यीशु के समय में किया था, जब फरीसियों ने स्वयं को ऊंचा उठाने के लिए उपवास का उपयोग किया था (मत्ती 6:16-18)। आज भी यही होता है। 

दीन लोग उपवास करते हैं
प्रत्येक जो उपवास करता है वह दीन नहीं होता है। परन्तु दीन लोग उपवास करते हैं। वे स्वयं को निर्बल जानते हैं, और परमेश्वर को बलवान। वे स्वयं को छोटा जानते हैं, और परमेश्वर को बड़ा। वे स्वयं को हताश जानते हैं, और यह भी कि परमेश्वर अपनी महान दया के साथ उन्हें सम्भालने के लिए इतना तत्पर रहता है। 

कैसे ऐसे लोग — दीन लोग — उसकी सहायता की मांग नहीं करेंगे, और विभिन्न समयों पर, उस विशेष प्रार्थना-को-गहन बनाने वाले उपकरण का उपयोग नहीं करेंगे जो उसने दिया है, बहुमूल्य और न भाने वाला जैसा वह है, जिसे उपवास कहा जाता है?

जब हम जानते हैं कि हमारा परमेश्वर दया दिखाने के लिए सदैव इतना तत्पर रहता है, जैसा कि उसने अहाब जैसे दुष्ट के साथ किया, तो हम क्यों नहीं उससे मांग सकते हैं? केवल अपने प्रतिदिन की प्रार्थनाओं में ही नहीं। और अपने निर्धारित उपवास में ही नहीं। परन्तु अनायास ही। 

अगली बार जब उसका नम्र हाथ आपके ऊपर होगा, तो क्या होगा यदि आप प्रार्थना और उपवास के साथ प्रति उत्तर करें?

डेविड मैथिस desiringGod.org के कार्यकारी संपादक हैं और मिनियापोलिस/सेंट में सिटीज चर्च में पासबान हैं।
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