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सुसमाचार अद्भुत है।

क्या कभी यह सम्भव है कि आप उस व्यक्ति से अत्यधिक  परिचित हों जिससे आप प्रेम करते हैं? क्या कभी यह सम्भव है कि आप जिस सत्य से प्रेम करते हों उससे अत्यधिक  परिचित हो जाएं? दुख की बात है कि हम में से अधिकांश लोग स्वीकार करेंगे कि ऐसे समय होते हैं जब हम इसी प्रकार अपने प्रभु यीशु को हल्के में लेते हैं। और ऐसे समय होते हैं जब हम बाइबल के सुसमाचार को हल्के में लेते हैं। हमारा हृदय यह सोचता है कि सुसमाचार पुराना और उबाऊ है या फिर यह केवल खोजियों के लिए है। प्रायः सुसमाचार को कम समझा जाता है और हम इस वास्तविकता के विषय में रुककर सोचते भी नहीं हैं कि यीशु आप के और मेरे जैसे पापियों के लिए क्रूस पर मरे थे। यह हमारी आत्मा के लिए हानिकारक है क्योंकि यह घमण्ड की ओर ले जाता है। परन्तु, इस प्रकार के घमण्ड के लिए एक स्वस्थ प्रतिकार (एंटीडोट) पवित्रशास्त्र द्वारा स्मरण दिलाया जाना है कि हम वास्तव में कौन हैं। यह हमें अपने पूरे जीवन में सुसमाचार की अद्भुतता को थामे रहने में सहायता करता है जिससे हम कभी भी इससे बहुत अधिक  परिचित नहीं होते हैं।

जो कुछ भी हम अभी हैं वह इस पर आधारित नहीं है कि हम कौन थे या हमने क्या किया था, यह केवल इस पर आधारित है कि ख्रीष्ट ने हमारे लिए क्रूस पर क्या किया।

रोमियों के पहले 3 अध्यायों में स्पष्ट रूप से सुसमाचार की व्याख्या करने और यह दिखाने के पश्चात अध्याय 4 में विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाना सदैव से रहा है, प्रेरित पौलुस उस शान्ति, पहुंच और आनन्द के बारे में बात करता है जो 5:1-5 पद में हमें यीशु के कारण मिलता है। चाहे हम जो भी हों फिर भी पद 6 से 11 में वह बताता है कि कैसे यह आनन्द ख्रीष्ट में हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम के आधार पर स्थापित होता है। इस लेख में, हम तीन वाक्यांशों पर विचार करके अपनी अयोग्यता पर विचार करेंगे जिनका उपयोग पौलुस ने हमारी ख्रीष्ट रहित वास्तविकता का वर्णन करने के लिए किया था।

हम निर्बल थे (पद 6)
शेष पद स्पष्ट करता है कि पौलुस के मन में यह है कि हम अधर्मी थे। दूसरे शब्दों में, हम आत्मिक रूप से दृढ़ नहीं थे। हम हृदय से अच्छे नहीं थे। हम परमेश्वर के लिए लालयित नहीं थे। हम कभी निष्कपट नहीं थे। हम अधर्मी थे और स्वयं को परमेश्वर के निश्चित प्रकोप से बचाने के लिए कुछ भी करने में असमर्थ थे। परन्तु परमेश्वर की स्तुति करो कि, “अधर्मियों के लिए ख्रीष्ट ठीक समय पर मरा।” जो कुछ भी हम अभी हैं वह इस पर आधारित नहीं है कि हम कौन थे या हमने क्या किया था, यह केवल इस पर आधारित है कि ख्रीष्ट ने हमारे लिए क्रूस पर क्या किया। क्या वह अद्भुत नहीं है? निर्बल, अधर्मी लोगों के पास किस बात पर गर्व करने का अधिकार है? हम कैसे इतने अकृतज्ञ हो सकते हैं कि ख्रीष्ट की मृत्यु को गम्भीरतापूर्वक न लें?

हम पापी थे (पद 7)
पौलुस आगे कहता है कि परमेश्वर का प्रेम समझ से परे है जब हम पापी ही थे तब ख्रीष्ट हमारे लिए मरा। वह तर्क करता है कि कैसे यह विश्वास किया जाए कि एक व्यक्ति एक धर्मी या एक भले व्यक्ति के लिए मरे; परन्तु परमेश्वर अपने महान प्रेम में पापियों के लिए मरने के लिए अपने पुत्र को देने के द्वारा इस प्रेम को उण्डेल देता है। हम निर्दोष या नैतिक रूप से निष्पक्ष नहीं थे। हम थोड़े से ही  गलत नहीं थे। हम चाहे जितना सोचते हों कि हम कितने सभ्य हैं, हम परमेश्वर की धार्मिकता के स्तर से पूर्ण रीति से चूक गए थे। हम पापी थे। जैसा कि जोनाथन एडवर्ड्स कहते हैं, हमारे उद्धार के लिए हमने जो एकमात्र वास्तविक योगदान दिया, वह स्वर्ग के परमेश्वर के विरोध हमारा वास्तविक पाप था। और फिर भी, “ख्रीष्ट हमारे लिए मरा।” उसके अथाह प्रेम के लिए परमेश्वर की स्तुति करो!

हम शत्रु थे (पद 10)
पौलुस आगे कहता है कि परमेश्वर ने भूतकाल में हमारे साथ जैसा व्यवहार किया है उसके अधार पर हम भविष्य में हमारे प्रति परमेश्वर के अनुग्रह के बारे में सुनिश्चित हो सकते हैं। वह कहता है कि जब हम शत्रु ही थे तब हमारा मेल किया गया। ठहरिए और सोचिए उस शब्द और उस चित्र के बारे में जो यह चित्रित करता है – शत्रु को। हम परमेश्वर के मित्र या सहयोगी नहीं थे। हम निष्पक्ष भी नहीं थे। हम शत्रु थे। हम परमेश्वर के प्रति विद्रोह कर रहे थे। हमने परमेश्वर को क्षति पहुंचाने का प्रयास किया और उसके उद्देश्यों के विरुद्ध काम किया। हृदय से, हम परमेश्वर को सिंहासन से हटाना चाहते थे और अपने गन्तव्य के स्वामी बनना चाहते थे। हम स्वयं को अच्छे लोगों की श्रेणी में रखना पसन्द करते हैं, परन्तु वह नहीं है जो परमेश्वर ने हमारे बारे में ऐसा नहीं सोचा था। जब परमेश्वर ने हमें देखा, तो उसने शत्रुओं को देखा। ऐसे विश्वासघाती लोगों को अपना प्रेम दिखाना परमेश्वर के लिए कैसे सम्भव हो सकता है? और जबकि अब परमेश्वर के साथ हमारा मेल हो गया है, हम कैसे भूल सकते हैं कि हम क्या थे जब परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु के द्वारा हमारे साथ मेल किया?

हृदय से, हम परमेश्वर को सिंहासन से हटाना चाहते थे और अपने गन्तव्य के स्वामी बनना चाहते थे।

प्रेरित पौलुस ने पूर्ण रीति से सुसमाचार के लिए समर्पित जीवन जिया क्योंकि वह इस सत्य से कभी नहीं उबर पाया कि परमेश्वर ने उसे बचा लिया। वह सदैव सुसमाचार को उसके और उसके पाप से सम्बन्धित होने के रूप में समझता था।  कि यही कारण है वह तिमुथियुस को लिखता है: “यह विश्वसनीय और हर प्रकार से ग्रहणयोग्य बात है कि ख्रीष्ट यीशु संसार में पापियों का उद्धार करने आया जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ” (1 तीमु. 1:15)। पौलुस नाटकीय नहीं हो रहा था जब उसने स्वयं को पापियों में सबसे बड़ा कहा। वह समझ गया कि स्वर्ग के पवित्र परमेश्वर के विरुद्ध उसके पाप उसकी अभक्ति और शत्रुता के चिन्ह थे। और क्योंकि उसने अपने पाप की गहराई और वास्तविकता को समझ लिया था, वह अनुग्रह के सुसमाचार से कभी नहीं भटका।

परमेश्वर हमें यह सोचने से बचाए कि हम बचाए जाने के योग्य हैं। हम सदैव स्मरण रखें कि यह परमेश्वर का अनुग्रह है, जो मेरे और आप जैसे जघन्य अपराधी को बचाता है। परमेश्वर हमें यह भूलने से बचाए कि हम कभी निर्बल थे, परमेश्वर के पापी शत्रु थे जो कि परमेश्वर की अनुग्रहपूर्ण उपस्थिति से अनन्तकाल के लिए दूर होने के योग्य थे। परमेश्वर प्रतिदिन हमारी सहायता करे कि हम अद्भुत सुसमाचार में प्रसन्न और आनन्दित हो सकें और अनुग्रह द्वारा बचाए गए पापियों के रूप में अपना जीवन जीएं। और हम इस महिमा से पूर्ण परमेश्वर के अद्भुत सुसमाचार को उन लोगों तक फैलाएं जो अभी भी निर्बल हैं, परमेश्वर के पापपूर्ण शत्रु हैं।


यह लेख ‘एक्विप इण्डियन चर्चस’ पर प्रकाशित लेख से अनुवादित किया गया है, जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं:https://equipindianchurches.com/blog/the-wonder-of-the-gospel/

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