ख्रीष्टीय जीवन सन्तुष्टि भरा जीवन है।

“जो मुझे सामर्थ्य देता है, उसके द्वारा मैं सब कुछ कर सकता हूँ” फिलिप्पियों 4:13

हममें से अधिकाँश लोग इस पद से भली-भाँति परिचित होंगे। कई बार हमने इस पद का उपयोग सम्भवत: यह कहते हुए सुना होगा कि- ‘परमेश्वर सामर्थी है,  उसकी सामर्थ्य के द्वारा मैं सब कुछ कर सकता हूँ। कुछ भी कार्य मेरे बस से बाहर का नहीं है। मैं परमेश्वर की सामर्थ्य से अपने प्रत्येक सपने को पूरा कर सकता हूँ। जो मैंने ठाना है, उसको मैं प्रभु की सामर्थ्य से पक्का कर पाऊँगा। हम तो निर्बल हैं, किन्तु परमेश्वर जो सामर्थ्य देता है उसके द्वारा मैं बड़े-बड़े काम कर सकता हूँ। उसकी सामर्थ्य से चंगाईयाँ कर सकता हूँ, व्यापार में बड़ा नाम कमा सकता हूँ।’ यह बात केवल हमने सुनी ही नहीं होगी किन्तु सम्भवता हमने भी इस पद को लेकर दृढ़कथन किया होगा। 

किन्तु ठहरिए और विचार कीजिए, यह पद जो विश्वासियों के मध्य बहुत उपयोग किए जाने वाला पद है, क्या इसमें पौलुस वास्तव में क्या कह रहा है? क्या यह पद सफलता पाने, जीतने एवं प्रेरित करने वाला पद है? क्या हम परमेश्वर की सामर्थ्य से सब कुछ कर सकते हैं?

हमारी निर्बलता में परमेश्वर अपनी सामर्थ्य को प्रकट करता है कि हम उसमें बने रहें।

यह सत्य है कि परमेश्वर अपनी महिमा के लिए अपने सामर्थ्य के द्वारा हमारे जीवन में बड़े-बड़े कार्य करता है। किन्तु इस खण्ड में बात कुछ और ही है। आइये सन्दर्भ के अनुसार इस पद को समझने का प्रयास करें। 

पौलुस फिलिप्पियों की पत्री फिलिप्पी की कलीसिया को लिख रहा है, जो सुसमाचार की उन्नति में पौलुस के साथ सहभागी हैं। वे उसके लिए प्रार्थना करने, व्यवाहारिक रीति से सहायता करने और मुख्य रुप से आर्थिक सहयोग करने के द्वारा सुसमाचार में साझेदारी कर रहे हैं (फिलिप्पियों 1:5)। वह कैद में भी सुसमाचार की उन्नति में लगा हुआ है। 

पौलुस बन्दीगृह में है, और वह इस इस को सम्भवत: समझ रहा है कि बन्दीगृह में उसकी मृत्यु हो सकती है (फिलिप्पियों 1:20–21; 2:17)। उसी समय उसने संतुष्ट रहने का रहस्य सीखा। उसने यह अनुभव किया कि सन्तुष्टि का किसी विशेष वातावरण या स्थिति से सीधा सम्बन्ध नहीं है। हमारी परिस्थितियाँ निरन्तर बदलती रहती हैं, परन्तु परमेश्वर कभी नहीं बदलता। पौलुस अपनी परिस्थितियों के मध्य शांत था क्योंकि उसने परिस्थितियों पर आशा नहीं रखी किन्तु उसका भरोसा परमेश्वर पर था। बन्दीगृह में दुख सहते हुए भी आनन्दित होना और सन्तुष्ट होना पवित्र आत्मा का कार्य है। यदि हम सृष्टिकर्ता परमेश्वर को छोड़ सृष्टि में सन्तुष्टि ढ़ूँढ़ते हैं तो हम शीघ्र ही निराश हो जाएँगे।

परमेश्वर जो सामर्थ्य का स्रोत है, उसके द्वारा, वह दृढ़, सामर्थी, सक्षम, और प्रबल हो सकता है। पौलुस यह नहीं कह रहा है कि ख्रीष्ट के माध्यम से वह जो चाहे वह सब कुछ कर सकता है किन्तु यह कह रहा है कि वह ख्रीष्ट और उसके सामर्थ्य पर भरोसा करके किसी भी परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर सकता है। 

ख्रीष्ट हमें अपनी सामर्थ्य देता है कि हम कठिन परिस्थितियों में उसमें सन्तुष्ट रहें।

जब पौलुस “प्रत्येक परिस्थिति” में लिखता है, तो वह विशेष रूप से उन सभी परिस्थितियों के विषय में बात करता है जिनका वह सामना करता है – उनमें से कुछ अच्छी और कुछ अत्यन्त कठिन परिस्थितियाँ हैं। पौलुस जिस भी स्थिति में था, उसमें कैसे संतुष्ट रहा? पौलुस अपने सामर्थ्य से सन्तुष्ट नहीं हो रहा है किन्तु ख्रीष्ट ने अपने सामर्थ्य उसे दी है कि वह उन परिस्थिति में सन्तुष्ट रहे। हम विश्वासियों में वास करने वाली ख्रीष्ट की आत्मा हमें परीक्षाओं के बीच भी विजयी होने की शक्ति देती है। 

सन्तुष्ट होने की आशीष पीड़ा, दुख, भ्रम, अपमान, सताव, तिरस्कारे जाने, अकेलपन, गरीबी, बिमारी सब परिस्थितियों में प्रभु की दया के कारण ही आती है। पौलुस कहता है कि उसने सन्तुष्ट रहना सीख लिया है। यह रातों-रात नहीं हुआ किन्तु सुसमाचार को जितना अधिक वह समझता रहा, यीशु का अनुसरण करता रहा, वह इस बात को पा रहा है कि परमेश्वर उसको सन्तुष्ट होना सीखा रहे हैं। 

ख्रीष्टीय जीवन में सन्तुष्टि बहुत महत्वपूर्ण बात है। यह दिखाता है कि सुसमाचार हमारे लिए पर्याप्त है। यीशु में हमारी परिपूर्णता, सन्तुष्टि, आनन्द पाया जाता है। 

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नीरज मैथ्यू
नीरज मैथ्यू
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