ख्रीष्टीय जवान कैसे स्वयं को पवित्र रख सकते हैं?

युवाओं के जीवन में विभिन्न प्रकार की परीक्षाएं, प्रलोभन एवं संघर्ष हैं। प्रतिदिन के जीवन में ख्रीष्ट के साथ ख्रीष्टीय चाल चलना ख्रीष्टीय युवाओं के लिए कठिन प्रतीत होता है। अधिकाँश युवा वर्तमान की चकाचौंध संसार में अशुद्धता की ओर बहुत ही शीघ्रता से खींचे चले जाते हैं। प्राय: युवा इस प्रश्न को लेकर आते हैं कि चारों ओर पाप, अपवित्रता व्याप्त है, तो कैसे ख्रीष्टीय युवा स्वयं को पवित्र रख सकते हैं? आईये कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा करें जो जवानी के दिनों में पवित्रता में बने रहने और बढ़ने में सहायक हैं। 

परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में प्राथमिकता दें- 
वर्तमान आधुनिक समय में इतनी व्यस्तता और व्यस्त दिनचर्या के कारण प्राय: हम परमेश्वर के वचन का प्रतिदिन अध्ययन करने, मनन करने में समय नही निकाल पाते हैं। धीरे-धीरे लम्बा समय होने पर, हम वचन के प्रति उदासीन होने लगते हैं। हमारा परमेश्वर पवित्र है और वह हमसे पवित्रता की मांग करता है। और उसने अपनी इच्छा, योजना को अपने वचन के माध्यम से प्रकट किया है कि हम पवित्रशास्त्र से जानें कि हमें कैसा जीवन जीना है! परमेश्वर का वचन युवाओं को अपना जीवन शुद्धता में जीने के लिए स्पष्ट परामर्श देता है कि और स्पष्ट करता है कि ‘एक जवान अपनी चाल को परमेश्वर के वचन के अनुसार चलने से शुद्ध रख सकता है’ (भजन 119:9)।

परमेश्वर ने हमारा उद्धार करके, हमें कलीसिया में जोड़ा है, ताकि हम और आप पवित्रता में और ख्रीष्ट यीशु के स्वभाव बढ़ सकें।

जब हम वचन को प्राथमिकता देते हैं, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा हमारे हृदय, हमारे शब्दों, हमारे कार्य और हमारे सम्पूर्ण जीवन को अपने वचन के द्वारा परिवर्तित करता है। प्राय: हमारे पास यह बहाना होता है कि वचन न पढ़ने का कारण हमारी व्यस्तता है। किन्तु हमें स्वयं को स्मरण दिलाना है कि वचन हमारे जीवन का आधार है और परमेश्वर हमारा जीवन है, उसके बिना हम कुछ भी नहीं हैं, भले ही हम इस संसार में सब कुछ क्यों न प्राप्त करे लें! हम अपने जीवन को जाँच सकते हैं कि क्या हम वास्तव में परमेश्वर के वचन के लिए लालायित रहते हैं या यह हमारे जीवन में सबसे अन्तिम स्थान पर है। डी.एल.मूडी ने ऐसा कहा, “या तो परमेश्वर का वचन आपको पाप से दूर रखेगा; या पाप आपको परमेश्वर के वचन से दूर रखेगा।”

स्थानीय कलीसियाई संगति में निरन्तर बने रहें- 
परमेश्वर ने हमारा उद्धार करके, हमें कलीसिया में जोड़ा है, ताकि हम और आप पवित्रता में और ख्रीष्ट यीशु के स्वभाव बढ़ सकें। कलीसिया निरन्तर हमारे आत्मिक जीवन पर ध्यान दे, कलीसिया के विश्वासी एक-दूसरे की चिन्ता करें, एक दूसरे को उत्साहित करें, एक- दूसरे को चिताएं और एक दूसरे को सम्भाले। स्थानीय कलीसिया, जहाँ पर हम निरन्तर सप्ताह में और सप्ताह के मध्य भी, एक-दूसरे से मिलते हैं तो हम अपने संघर्ष, ख्रीष्टी जीवन की चाल के विषय में बात करते हैं। लोग हमारे प्रभु के साथ प्रतिदिन के जीवन के विषय में पूछते हैं, आत्मिक जीवन की वास्तविकता के विषय में पूछते हैं, चिताते हैं और उत्साहित करते हैं। रविवारीय आराधना में परमेश्वर के वचन के प्रचार के माध्यम द्वारा नियमित रीति से हम वचन की शिक्षा में बढ़ते हैं और वचन हमें हमारे पापों को प्रकट करता है। जो हमारे आत्मिक जीवन व पवित्रता में बढ़ने मे सहायक सिद्ध होता है। 

अधिकाँश जवान अपना जीवन अपनी इच्छानुसार जीना चाहते हैं, इसलिए कलीसिया की संगति से बचते हैं, कलीसियाई सदस्यता से भागते हैं, लोगों के प्रश्नों से भागते हैं, सन्देश तथा बाइबल की बातों के विषय में रूचि नहीं लेते हैं। जो वास्तव में उनके आत्मा और जीवन के लिए हानिकारक है। किन्तु मेरे युवा भाई/बहनों, वास्तव में पवित्रता में बढ़ने के लिए कलीसियाई संगति अति आवश्यक है। कलीसियाई संगति हमें हमारे पास विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के साथ बातचीत करने और उनसे सीखने का अच्छा समय होता है, क्योंकि कलीसिया के अगुवे तथा अनुभवी, परिपक्व लोग हमारी बात को सुनते हैं और जीवन के हर एक क्षेत्र पहलुओं से सम्बन्धित बातों को समझते हैं, परामर्श देते हैं और हमारे लिए प्रार्थना करते हैं। स्मरण रखिए चाहे आप अविवाहित युवा हों, या विवाहित, हम सबको स्थानीय कलीसिया की आवश्यकता है। जो वास्तव में पवित्रता में बढ़ने में बहुत सहायक है। इसलिए, मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि कृपया कलीसियाई संगति को गम्भीरतापूर्वक लें। 

हमारे जीवन में कुछ ऐसे लोग होने चाहिए जो हमारे जीवन पर ध्यान दें, और यीशु के स्वभाव में बढ़ने में हमारी सहायता करें। इसलिए उन लोगों को अपना घनिष्ठ मित्र बनाईये जो प्रभु से प्रेम करते हैं और प्रभु के पीछे चलते हैं।

कलीसिया के कुछ घनिष्ठ लोगों के प्रति अपने व्यक्तिगत जीवन के विषय में जवाबदेही रहें – 
ख्रीष्ट ने हमें पाप के दासत्व से छुड़ाया है, लेकिन हम पाप करने के लिए अब स्वतन्त्र नहीं हैं। अविवाहित तथा विवाहित युवा, प्राय: वासना, लोभ, मूर्तिपूजा, घमण्ड, ईर्ष्या, झूठ, तथा अन्य पापों से संघर्ष करते हैं। वे अपने हृदय, वचन और कार्य से परमेश्वर के अनुसार जीवन न जीने के कारण अशुद्धता में पड़ जाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हमारे जीवन में कुछ विश्वासयोग्य तथा परिपक्व लोग हों, जिनके प्रति हम ईमानदार हों, जिनसे हम अपने जीवन और जीवन के समस्त संघर्षों को बांट सकें।  

यह आवश्यक नहीं है कि आप कलीसिया में सभी लोगों के पास जाकर अपने पापों और संघर्षों को बताते फिरें, किन्तु मेरे कहने का तात्पर्य है कि हमारे जीवन में कुछ ऐसे लोग होने चाहिए जो हमारे जीवन पर ध्यान दें, और यीशु के स्वभाव में बढ़ने में हमारी सहायता करें। इसलिए उन लोगों को अपना घनिष्ठ मित्र बनाईये जो प्रभु से प्रेम करते हैं और प्रभु के पीछे चलते हैं। कलीसिया में अच्छे मित्र बनायें जो आपको परमेश्वर के वचन तथा ख्रीष्ट के स्वभाव में बढ़ने में सहायता करें। प्रभु के दास जे.सी.रायल जवानों को इस प्रकार से परामर्श देते हैं, “कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति को अपना घनिष्ठ मित्र न बनाएं, जो परमेश्वर का मित्र न हो।” हमारे जीवन में ऐसे मित्र होने चाहिए जो हमसे कठिन प्रश्न पूछें और हमारे पापों को उज़ागर करें, और हमारी इस बुलाहट के अनुसार जीवन जीने में सहायता करें कि हम ‘जवानी की अभिलाषाओं से भागें और… धार्मिकता, विश्वास प्रेम और शान्ति का अनुसरण करें’ (2 तीमुथियुस 2:22)।

पापों से संघर्ष करते हुए निराश न हों किन्तु अपनी पहचान ख्रीष्ट यीशु में पायें- 
ख्रीष्टीय युवा जब विभिन्न प्रकार की अभिलाषाओं में पड़कर संघर्ष करते हैं और उससे बाहर आने का प्रयत्न करते हैं तो कई बार हम हताश और निराश हो जाते हैं। और अपने विश्वास और ख्रीष्टियत पर सन्देह करने लगते हैं कि- क्यों मैं बार-बार इन पापों में पड़ जाता हूँ। और वे स्वयं को असहाय और आशाहीन समझने लगते हैं। ऐसे संघर्ष और सन्देहपूर्ण स्थिति में हमें स्वयं को स्मरण दिलाना चाहिए कि विश्वास के द्वारा अब हम ख्रीष्ट में हैं। हम यीशु के द्वारा ‘परमेश्वर की सन्तान हैं’ (यूहन्ना 1:12)। हमारा जीवन ख्रीष्ट में छिपा हुआ है। और कुछ भी हमें परमेश्वर के प्रेम से, उसके अनुग्रह से अलग नहीं कर सकता। और यह बात हमें पाप से लड़ने के लिए नित्य उत्साहित करती है। 

हो सकता हो कि आप मन की अशुद्धता, व्यभिचार, मूर्तिपूजा (अर्थात हृदय में निर्मित मूर्तियाँ), अश्लीलता, या मस्तिष्क के बुरे विचार, वासनायुक्त कल्पनाओं से संघर्ष कर रहे हों, या मुँह से बुरे-बरे शब्द बोलते हो, जो एक ख्रीष्टीय को शोभा नहीं देता। हो सकता है कि आप कलीसिया में केवल विश्वासी होने का पाखण्ड करते हों या लोगों की बुराई करते हों, परमेश्वर को तथा स्वयं को धोखा दे रहे हों। हो सकता है कि आप वचन सिखाते हों, भविष्य की सेवा के लिए स्वयं को प्रशिक्षित कर रहे हों, या लोगों को शिष्यता में बढ़ा रहे हैं, और फिर भी अनेक पापों से संघर्ष कर रहे हों। और वे बातें आपको ख्रीष्टीय जीवन की चाल चलने में रूकावट बन रही हों, और आपको ग्लानि, लज्जा तथा निराशा की ओर ले जा रही हों। 

किन्तु प्रिय पाठकों, स्मरण रखिए कि हमारी पास केवल ख्रीष्ट में जीवित आशा है। 1 यूहन्ना 2:2 हमें स्मरण दिलाता है कि “यदि कोई पाप करता है तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात यीशु ख्रीष्ट जो धर्मी है।” इसलिए प्रत्येक परीक्षाओं, संघर्ष के समयों में यीशु के पास आइये। उससे पश्चाताप करिए और उससे प्रार्थना करिए कि परमेश्वर पवित्र आत्मा हमारी सहायता करे। 

अत: यह आवश्यक है कि हम अपने जवानी कि दिनो में अपने सृजनहार को स्मरण रखें (सभो. 12:1)। अपने जीवन के किसी भी पाप को हल्के में न लें। हमारे शब्द हमारे हृदय के विचार को प्रकट करते हैं, इसलिए अपने हृदय में ख्रीष्ट के वचन को बहुतायत से बसने दें क्योंकि वचन हमें पाप से लड़ने में मार्गदर्शन प्रदान करता है, निराशा में आशा प्रदान करता है और पवित्रता में बने रहने के लिए सामर्थ्य प्रदान करता है। परमेश्वर की इच्छा है कि ‘हम पवित्र बने’ (1 थिस्स 4:3) इसलिए आइये हम उसके वचन को अपने जीवन में प्रथम स्थान दें, नियमित कलीसियाई संगति में बने रहें, लोगों के साथ पारदर्शिता एवं जवाबदेही का जीवन जियें और पापों से संघर्ष करते हुए ख्रीष्ट में अपनी पहचान को स्मरण रखते हुए पवित्रता में बढ़ते जाएं। 

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