झूठे शिक्षकों के विषय में चौंकाने वाला सच

प्रश्न यह नहीं है कि क्या आप कभी झूठे शिक्षकों की आवाज़ सुनते हैं। वह तो आप सुनते ही हैं — सम्भवतः प्रतिदिन। प्रश्न यह है कि क्या आप भेद कर सकते हैं कि कौन से सन्देश झूठे हैं।

यदि आप थोड़ा भी टेलीविज़न देखते हैं, या थोड़ा भी रेडियो या पॉडकास्ट को सुनते हैं, और समाचार को सुनते हैं अथवा आधुनिक समाज में किसी के भी साथ गहराई से वार्तालाप करते हैं, तो आप किसी न किसी प्रकार की झूठी शिक्षा के प्रति उजागर हो रहे हैं। यदि आप किसी भी वाणी को झूठ के रूप में नहीं पहचान सकते हैं जिनको कि आप सुन रहे हैं, तो यह इसलिए नहीं है कि आप उनके प्रति उजागर नहीं हो रहे हैं, परन्तु इसलिए कि आप किसी न किसी रीति से उन पर विश्वास कर ले रहे हैं। 

अधिकांश कलीसियाई इतिहास में, जनसाधारण को प्रभावित करने के लिए आसाधारण ऊर्जा और प्रयास करना पड़ा। संदेशों की हाथ से प्रतिलिपि बनानी पड़ती थी, और शिक्षकों को पैदल या घोड़े की पीठ पर यात्रा करनी पड़ती थी। कोई भी कार व वायुयान नहीं थे, और कोई मुद्रण-यंत्र (प्रिंटिग प्रेस), वेबसाइट या फेसबुक पेज नहीं थे। परन्तु आज सम्भवत: प्रत्येक झूठे शिक्षक के पास ट्विटर अकाउंट है।

तो फिर, हमारे जैसे संसार में झूठे शिक्षकों से सच्चों को कलीसिया कैसे पहचानती है, जहां झूठी शिक्षा को फैलाना पहले से कहीं अधिक सरल है?

यदि आप किसी भी वाणी को झूठ के रूप में नहीं पहचान सकते हैं जिनको कि आप सुन रहे हैं, तो यह इसलिए नहीं है कि आप उनके प्रति उजागर नहीं हो रहे हैं, परन्तु इसलिए कि आप किसी न किसी रीति से उन पर विश्वास कर ले रहे हैं। 

झूठे शिक्षक उठ खड़े होंगे
हम न केवल झूठी शिक्षा की सम्भावना को स्वीकार करते हुए आरम्भ करते हैं, परन्तु इसकी निश्चितता को भी स्वीकार करते हैं। आज कलीसिया में झूठी शिक्षा देखकर हमें आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। यीशु और उसके प्रेरित बहुत ही स्पष्ट हैं कि झूठे शिक्षक उठ खड़े होंगे। उन्होंने इसकी प्रतिज्ञा की थी। जैसा कि यीशु कहता है,

 “झूठे ख्रीष्ट और झूठे नबी उठ खड़े होंगे, और चिन्ह और अद्भुत काम दिखाएंगे कि यदि सम्भव हो तो चुने हुओं को भी भटका दें। परन्तु सावधान रहना; देखो, मैंने पहिले ही तुम्हें सब कुछ बता दिया है।” (मरकुस 13:22-23; मत्ती 24:24 को भी देखें)

इसी प्रकार, पौलुस इफिसियों के अगुवों को (प्रेरितों के काम 20:29-31) और अपने शिष्य तीमुथियुस (2 तीमुथियुस 4:3-4) को चेतावनी देता है कि झूठी शिक्षा अवश्य ही आएगी (1 तीमुथियुस 4:1 और 2 तीमुथियुस 3:1-6 को देखें)। यदि हमें इस बात पर कोई संदेह था, तो पतरस इसी बात में एक अन्य वाणी को जोड़ देता है कि: “तुम्हारे मध्य भी झूठे शिक्षक होंगे ” (2 पतरस 2:1)।

इसलिए, हमें अचम्भित नहीं होना चाहिए कि सम्पूर्ण कलीसियाई इतिहास में झूठे शिक्षक उठ खड़े हुए हैं और सम्भवतः हमारे दिन में भी अनेकों पाए जाते हैं।

उनकी शिक्षा — और जीवन पर ध्यान दो
हमें आश्चर्य हो सकता है — यीशु और उसके प्रेरित दोनों से — कि झूठे शिक्षकों के प्रतिदिन के जीवन उनके झूठ को कैसे प्रकट करते हैं। वे केवल अपनी शिक्षाओं में ही झूठे  नहीं हैं, परन्तु वे अपने प्रतिदिन के जीवन में भी झूठे हैं।

उनकी सैद्धान्तिक त्रुटि के नीचे, चाहे वह कितनी ही सूक्ष्म और भ्रामक क्यों न हो, हम नैतिक समझौता पायेंगे और वे प्रायः रात भर में ही नहीं आ जाते हैं; वे समय लेते हैं। परन्तु वे अवश्य आयेंगे। यहां मत्ती 7:15-20 में यीशु हमें तैयार करते हैं:

“झूठे नबियों से सावधान रहो जो भेड़ों के वेश में तुम्हारे पास आते हैं, परन्तु भीतर से वे भूखे फाड़-खाने वाले भेड़िए हैं। उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे। क्या कंटीली झाड़ियों से अंगूर या कांटों से अंजीर तोड़े जाते हैं? इसी प्रकार प्रत्येक अच्छा पेड़ अच्छा फल देता है, परन्तु निकम्मा पेड़ बुरा फल देता है। अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं दे सकता और न ही निकम्मा पेड़ अच्छा फल दे सकता है। प्रत्येक पेड़ जो अच्छा फल नहीं देता, काटा और आग में झोंक दिया जाता है। अतः तुम उनके फलों से उन्हें पहचान लोगे।” (लूका 6:43-44 भी देखें)

यीशु इसे दो बार कहते हैं, ताकि हम इसे भूल न जाएं: उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे।  उसकी चेतावनी पहली बार में स्पष्ट और सरल लग सकती है, परन्तु जैसा हम सब जानते हैं कि पेड़ रात-भर में फल नहीं लाते हैं। अन्ततः, तथापि, फल (या उसका अभाव) प्रकट होगा। और ऐसा नैतिक समझौते के साथ भी होता है। जो कुछ भीतर के कमरे में मात्र फुसफुसाहट के रूप में आरम्भ होगी वह शीघ्र ही छत पर से प्रचार किया जाएगा (लूका 12:3)। और इसलिए पौलुस अगुवों को निर्देश देता है कि वे न केवल अपने लोगों और उनकी शिक्षा पर सावधानीपूर्वक ध्यान दें, किन्तु अपने स्वयं के जीवन पर भी ध्यान दें (प्रेरितों का काम 20:28; 1 तीमुथियुस 4:16)। 

इसमें कोई संदेह नहीं है, कि झूठे शिक्षकों को उसी क्षण में  पहचानना कठिन हो सकता है। यदि हमारे पास उनके व्यक्तिगत जीवन तक की पहुंच नहीं है, या उनके सैद्धान्तिक समझौते अभी तक उनके व्यवहार में सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं हुए हैं, तो हमें यह जानना कठिन हो सकता है कि क्या वे सही हैं। परन्तु समय बताएगा। वे अपने फल से जाने जाएंगे — सेवकाई की मात्रा और संख्या के फल से नहीं, किन्तु गुणवत्ता और स्थिरता के द्वारा — और अन्ततः उनके स्वयं के जीवन की योग्यता के द्वारा।

धन, यौन और शक्ति का आकर्षण
विशेष रूप से, 2 पतरस अध्याय 2 उल्लेखनीय है कि कैसे यह झूठी शिक्षा के फल के विषय में यीशु की चेतावनी को व्यक्त करता है। समझौता की गई शिक्षा के विषय में कहने के लिए पतरस के पास बहुत कम है, परन्तु वह समझौता किए गए जीवन के बारे में विवरणों की सूची देता है।

झूठे शिक्षक केवल अपनी शिक्षाओं में ही झूठे  नहीं हैं, परन्तु वे अपने प्रतिदिन के जीवन में भी झूठे हैं।

पद 1 और 3 “विनाशक विधर्मिताओं” और “झूठे शब्दों” की सामान्यताओं का वर्णन किया गया है — जो वास्तव में शिक्षा से सम्बन्धित हैं — परन्तु फिर, इस अध्याय में आगे कुछ भी उनकी शिक्षा पर केन्द्रित नहीं है। शेष सब उनके जीवन के विषय में है। 

हम इसे तीन महत्वपूर्ण श्रेणियों में सारांशित कर सकते हैं — और तीनों ही चरित्र और आचरण के बारे में हैं, न कि शिक्षा के बारे में। 

  • घमण्ड, और अवहेलना करने वाला अधिकार (पद 10) — पद 1: वे अस्वीकार करते हैं “उस स्वामी को जिसने उन्हें मोल लिया है” (पद 12-13 और 18 भी देखें)।
  •  कामुकता, जिसका अर्थ विशेष रीति से यौन पाप है — पद 2: “बहुत से लोग उनकी विषय-वासना का अनुसरण करेंगे” (10,12-14, और 19 पद भी)।
  • लालच, धन भौतिक लाभ और  के लिए — पद 3: “वे अपने लोभ में आकर तुमसे अनुचित लाभ उठाएंगे” (14-15 पद भी)।

बार-बार, पतरस का वर्णन लालच, कामुकता, और घमण्ड — अथवा धन, यौन, और शक्ति से सम्बन्धित है। जिस एक बात में समान रीति से सम्पूर्ण इतिहास में झूठे शिक्षक साझी हुए हैं, वह उनकी सैद्धांतिक त्रुटि की विशिष्ट प्रकृति नहीं है, किन्तु इन तीन सामान्य क्षेत्रों में से एक में नैतिक समझौते की निश्चयता है।

इसे देखने का एक और ढंग यह है कि उनका झूठ उनके विरुद्ध, दूसरे के विरुद्ध, या परमेश्वर के विरुद्ध पाप में सामने आता है। अपने लालच में, वे भौतिक लाभ के लिए विश्वासियों को लूटते हैं। या अपनी वासना में, वे यौन समझौता करते हैं (चाहे परस्त्रीगमन, व्यभिचार, या समलैंगिकता, जिसके बारे में 2 पतरस 2 बताता है)। अथवा अपने घमण्ड में, वे “प्रभुता को तुच्छ जानते” हैं (2 पतरस 2:10)। और सबसे बड़ी प्रभुता, जो समस्त प्रभुता को थामे हुए है, वह परमेश्वर स्वयं है।

आप सभी खोटी बातों का अध्ययन नहीं कर सकते हैं
यदि झूठी शिक्षा है केवल इस बारे में नहीं है कि हमारे अगुवे क्या कहते और लिखते हैं, किन्तु यह भी है कि वे कैसे जीवन जीते हैं, तो कलीसिया को आज झूठी शिक्षा को कैसे पहचानना और उजागर करना होगा? किसी की शिक्षा को ऑनलाइन या बड़े सम्मेलन में सुनना आसान है, परन्तु हम कैसे जान सकते हैं कि उनका जीवन सच्चा है?

झूठी शिक्षा के विरुद्ध सबसे बड़ा बचाव एक स्थानीय कलीसिया का समुदाय है जो परमेश्वर के वचन को जानता है, उसमें आनन्दित होता है, और उसमें जीवन जीता है — और अपने अगुवों को उत्तरदायी रखता है। यदि कुछ भी किया जा सकता है उन अगुवों को उत्तरदायी ठहराने के लिए जो बहुत दूर हैं तो वह बहुत थोड़ा ही होगा, किन्तु स्थानीय कलीसिया के जीवन में बहुत कुछ यथार्थवादी और कार्यवाही करने योग्य होना चाहिए। 

हमें ऐसे चरवाहों की आवश्यकता है जो पहले मुख्यतः स्वयं को भेड़ के रूप में जानते हों, और केवल द्वितीयक रूप से अगुवे और शिक्षक के रूप में।

हमारे अगुवों को उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए, और उन्हें इतने उच्च सम्मान में नहीं रखना चाहिए कि हम उनके सामान्य मसीही जीवन को अन्देखा कर दें। पास्टरों को लोगों के साथ होना चाहिए। चरवाहों से भेड़ के समान गंध आनी चाहिए, क्योंकि वे भेड़ों के बीच रहते हैं और उनके मध्य में चलते हैं, और वे झुण्ड से अलग नहीं हैं। हमें ऐसे पास्टरों की आवश्यकता है जो पहले मुख्यतः स्वयं को भेड़ के रूप में जानते हों, और केवल द्वितीयक रूप से अगुवे और शिक्षक के रूप में —ऐसे पास्टर जो स्पष्ट रूप से अपने नाम को स्वर्ग में लिखे जाने के लिए अधिक उत्साहित हैं इसके विपरीत कि वे सामर्थपूर्ण सेवकाई में पात्रों के रूप में उपयोग किया जाएं (लूका 10:20)।

यीशु अपनी कलीसिया को बचाएगा
परन्तु क्या आप जानते हैं? हमारे पास उत्तरदायी ठहराने की अपनी प्रणाली हो सकती है (और हमारे पास होना भी चाहिए), और हम अपने अगुवों के जीवन और शिक्षा दोनों को देखने का पूर्ण प्रयास कर सकते हैं (और हमें करना भी चाहिए), परन्तु अन्त में कोई भी अभेद्य मानवीय प्रणाली या प्रयास नहीं है। इसलिए 2 पतरस 2:9, झूठी शिक्षा पर इस अध्याय का शीर्ष-बिन्दु है, जो मधुर आश्वासन के रूप में कार्य करता है — “प्रभु भक्तों को परीक्षा में से निकालना जानता हैं।”

इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता है कि शिक्षा कितनी विकृत है, इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता है कि अनैतिक अगुवों को उजागर करने पर कलीसिया को सार्वजनिक रूप से कितना लज्जा का आभास हो सकता है, इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता है कि दिन कितने ही अन्धकारमय हो जाएं, इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता है कि हम सुसमाचार के सिद्धान्त की रक्षा करने और सुसमाचार-योग्य जीवन को संरक्षित करने में कितना असहाय होने का अनुभव करते हों, हमारे पास यह बड़ी सम्भालने वाली आशा है कि: यीशु जानता है कि कैसे भक्त को बचाना है

यीशु न केवल सबसे महान और सबसे सच्चा शिक्षक है जो कभी जिया था, परन्तु वह महान बचाने वाला भी है, जिसने हमें पाप से छुड़ाया है और जो सच में उसके हैं, उन्हें प्राण-घातक त्रुटि से बचाए रखेगा। इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि कलीसिया कितनी अल्पसंख्यक हो जाती है, और चाहे हम कितना ही दुर्बल क्यों न अनुभव करें, वही जो दोनों सच्ची शिक्षा का विषय और सच्चे जीवन का आदर्श है, वह हमारे जीवन-और-प्राण का संरक्षक भी है।

जैसे परमेश्वर ने नूह को संरक्षित रखा (2 पतरस 2:5) और लूत को बचाया (2 पतरस 2:7), तो वैसे ही प्रभु यीशु अपने सच्चे लोगों को झूठी शिक्षा — और झूठे शिक्षकों की —  झूठी जीवनशैली से बचाएगा। 

डेविड मैथिस desiringGod.org के कार्यकारी संपादक हैं और मिनियापोलिस/सेंट में सिटीज चर्च में पासबान हैं।
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