ख्रीष्टीय जीवन में किन बातों से पश्चात्ताप करें?

हम सब पापमय संसार में रहते हैं। हम सब प्रतिदिन पाप से संघर्ष करते हैं और यह संघर्ष हमारे जीवन की अन्तिम सांस तक चलता रहेगा। यद्यपि प्रभु यीशु ख्रीष्ट के क्रूस पर किए गए कार्य के द्वारा हमारा उद्धार हो गया है। उसने हमारे भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्य के पापों को क्षमा कर दिया है, परन्तु हम अभी भी पापी संसार में हैं। हम पाप के प्रभाव में हैं। इसलिए हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम प्रतिदिन जान-बूझकर तथा अनजाने में किए गए पापों को परमेश्वर के सम्मुख लाएं और उनसे पश्चात्ताप करें। इस लेख में हम जीवन के चार मुख्य क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए पापों से पश्चात्ताप करने के विषय में बात करेंगे।

आत्मिक जीवन में आलस्य के पाप से- प्रायः हमारे साथ ऐसा होता है कि जब हम विश्वास में आते हैं, तो बहुत उत्साहित रहते हैं, परन्तु धीरे-धीरे हम में से अधिकाँश लोग अपने आत्मिक जीवन के प्रति सचेत नहीं रहते हैं। हमें प्राय: परमेश्वर के वचन का अध्ययन न करने, परमेश्वर को धन्यवाद न देने, प्रार्थनापूर्ण जीवन न व्यतीत करने के पापों से पश्चात्ताप करने की आवश्यकता है। 

जीवन के गुप्त पापों से- हम मसीही आत्मिक युद्ध में हैं। हम प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के प्रलोभनों और परीक्षाओं का सामना करते हैं। हमारा हृदय पाप से भरा हुआ हुआ है। हो सकता है कि हम बाहरी रीति से बहुत ही अच्छे हों, हम लोगों के मध्य बहुत आत्मिक हों, परन्तु हम जब अकेले में होते हैं तब हमारा जीवन कैसा होता है? मसीही जीवन में हमें अपने हृदय को जाँचते रहने की आवश्यकता है। “आप जो गुप्त में हैं, वास्तव में आप वही हैं”- (जॉन ओवेन)।

हमारी सृष्टि इसलिए हुई है कि हम कठिन परिश्रम करने के द्वारा परमेश्वर को आदर और महिमा दें।

चाहे आप किसी भी आयु वर्ग के हों, आप किसी भी स्थिति में हों, किसी भी कार्य-क्षेत्र में हों, चाहे आप घर में रहने वाली माताएं हों, चाहे आप किसी के अधीन रहकर बाहर कार्य करते हों, चाहे आप के अधीन कार्य करने वाले लोग हों। अपने लिए कुछ समय निकालिए और अपने हृदय को जाँचिए। देखिए कि कहीं हमारे हृदय में- कुविचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या परस्त्रीगमन, लोभ और दुष्टता के काम तथा छल, कामुकता, ईर्ष्या, निन्दा, अहंकार और मूर्खता ने स्थान तो नहीं बनाया हुआ है (मरकुस 7:21-22)। हम जो बाहर दिखते हैं, क्या जब हम अकेले में हैं तब वैसे ही हैं, या अकेले में हमारा जीवन पूर्णतया भिन्न है!

क्या हम हृदय में किसी के लिए घृणा लिए हुए तो जीवन नहीं जी रहे हैं! क्या हम अश्लील विचारों, चलचित्रों को गुप्त में देखने या मंथन करने की लत में तो नहीं पड़े हुए हैं! क्या हम धन को अपने हृदय में परमेश्वर का स्थान तो नहीं दे रहे हैं? कहीं हम विवाह से पहले तथा विवाह से बाहर किसी यौन सम्बन्धी पाप में चुपचाप जीवन तो नहीं व्यतीत कर रहे हैं! यदि हम और आप कोई भी ऐसा कार्य कर रहे हैं जो परमेश्वर को अप्रिय हैं और उन पापों को छुपा कर जीवन जी रहे हैं, तो हमें परमेश्वर के सम्मुख पापों को अंगीकार करने की आवश्यकता है। सह-ख्रीष्टीय भाई-बहनों से बात करने की आवश्यकता है।

ख्रीष्ट की महिमा हेतु कठिन परिश्रम न करने के पाप से
हमारी सृष्टि इसलिए हुई है कि हम कठिन परिश्रम करने के द्वारा परमेश्वर को आदर और महिमा दें। जब हम कार्य करते हैं तो हम अपने बनाए जाने के उद्देश्य को परमेश्वर के लिए पूरा करते हैं (उत्पत्ति 1:28; 2:15)। तो जहाँ कहीं भी परमेश्वर ने आपको रखा है, जो कार्य सौंपा है यदि हम उन कार्यों के प्रति गम्भीर नहीं हैं या कार्यों को नहीं करते हैं तो हम कार्य न करने के पाप में हैं। एक मसीही होने के नाते, यीशु के सच्चे शिष्य होने के नाते हमें प्रत्येक कार्य को परमेश्वर की महिमा के लिए करना है। चाहे हमारे पास कोई भी कार्य का उत्तरदायित्व हो, हमें आवश्यकता है कि हम उसे परमेश्वर का समझकर अपने पूरे मन से तथा प्रभु की महिमा के लिए परिश्रम से करें। यदि हमें लगता है कि हमने अपने उत्तरदायित्व या कार्यों को ठीक से नहीं किया है तो हमें पश्चात्ताप करने की आवश्यकता है। हमें अपने समय के प्रति लापरवाह होने, समय का सही उपयोग न करने के पापों से पश्चात्ताप करना है।

दूसरों के साथ ख्रीष्टीय व्यवहार न करने के पाप से
हम पापमय संसार में हैं, और हम विभिन्न प्रकार के लोगों से मिलते हैं। परिवार में पति-पत्नी के मध्य, माता-पिता और बच्चों के मध्य, स्वामी और दास के मध्य, मित्रों के साथ, पड़ोसियों तथा सम्बन्धियों आदि के साथ हम प्रायः ख्रीष्ट के स्वभाव को प्रदर्शित करने में चूक जाते हैं। हम स्वयं दूसरों से अच्छा व्यवहार चाहते हैं, परन्तु हम इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि हम एक मसीही होने के नाते दूसरों के साथ व्यवहार अच्छा व्यवहार नहीं करते हैं।

कलीसिया में एक-दूसरे ख्रीष्टीय भाई-बहनों के साथ हम कैसा व्यवहार करते हैं? क्या हम अन्य ख्रीष्टियों को उनकी आर्थिक, सामाजिक, शिक्षा आदि के अनुसार उनके साथ व्यवहार करते हैं? क्या हम सब से एक समान व्यवहार करते हैं या हम पक्षपात के साथ कलीसिया में व्यवहार करते हैं? क्या हम केवल स्वार्थ के कारण दूसरों से प्रेम करने का पाखण्ड करते हैं?

यदि हमारे हृदय में किसी के प्रति कुड़कुड़ाहट, जलन, क्रोध, ईर्ष्या, या नीचा दिखाने, कम समझने, नीची दृष्टि से देखने, का व्यवहार है तो हमें अपने व्यवहार के प्रति सावधान होना है और पश्चात्ताप करना है। हमें आवश्यकता है कि हम परस्पर अपने पापों को मान लें और एक दूसरे के लिए प्रार्थना करें (याकूब 5:16)

पश्चात्ताप हमारे नम्र और सच्चे हृदय को प्रकट करता है। दाऊद के जीवन से हम देख सकते हैं कि वह किस प्रकार से परमेश्वर के सम्मुख अपने पापों को मानता है। दाऊद पश्चात्ताप की प्रार्थना करता है। वह परमेश्वर से विनती करता है कि वह अपनी करुणा के अनुसार उस पर अनुग्रह करे, अपनी बड़ी दया के अनुसार उसके अपराधों को मिटा दे। वह अपने पाप से शुद्ध करने के लिए प्रार्थना करता है। वह अपने अपराधों को मान लेता है (भजन 51:1,2,3)।

यदि आज हमारे और आपके जीवन में कोई भी ऐसा पाप है, जिससे हमने पश्चात्ताप नहीं किया है तो हमें परमेश्वर के सम्मुख आना चाहिए । यह प्रभु की दया है कि यद्यपि वह हमारे हृदय के प्रत्येक विचार, गुप्त में किए गए कार्य, तथा हमारे वास्तविक जीवन को जानता है, फिर भी हमें जीवन प्रदान करता है। वह चाहे तो कभी भी हमें मार दे, परन्तु वह चाहता है कि हम अपने पापों से पश्चात्ताप करें और उसके लिए जीवन जिएं। इसलिए हमें जॉन ओवेन के इन शब्दों को ध्यान रखना चाहिए “पाप को नाश करो, नहीं तो पाप तुम्हें नाश कर देगा”।