क्या बाइबल परमेश्वर की ओर से है?

साधारण अर्थ में, बाइबल 66 किताबों का संग्रह है जिसे हम परमेश्वर के द्वारा प्रेरित मानते हैं। इसका अर्थ यह है कि इन पुस्तकों के लेखकों ने अपनी व्यक्तिगत विचारधारा के आधार पर नहीं लिखा, परन्तु पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर उन्होंने इन पुस्तकों को लिखा है। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे बाइबल सम्पूर्ण रूप से ईश्वरीय है और कैसे यह मनुष्यों के द्वारा लिखी गई है।  

बाइबल सम्पूर्ण रूप से ईश्वरीय है
जब हम इस पर विचार करते हैं तो कुछ प्रश्न स्वाभाविक रूप से हमारे मन में आते हैं। बाइबल किस प्रकार से या फिर क्यों ईश्वरीय है? क्या बाइबल के कुछ भाग उसे ईश्वरीय बनाती है या फिर यह कुछ विशेष लोगों को कई तरीके से और विशेष जगह पर दी गई या कोई विशेष जगह पर लिखी गई, जिसके कारण यह ईश्वरीय है? इनमें से कोई भी कारण ऐसा नहीं है जो बाइबल को ईश्वरीय बनाती हो। 

1. सम्पूर्ण पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है
बाइबल स्वयं इस बात का दावा करती है कि उसमें की प्रत्येक बातें परमेश्वर की प्रेरणा के द्वारा हैं, अर्थात् परमेश्वर का वचन अनूठे तौर पर उसका प्रकाशन है। जब हम कहते हैं कि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र से मेरा तात्पर्य उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक की पुस्तकों से है। परमेश्वर के उद्धार की योजना का सन्देश है जो सभी के लिए है। ऐसा नहीं है कि बाइबल के कुछ ही भाग या विचार ही परमेश्वर की प्रेरणा से जुड़े हुए हैं। और इसलिए क्योंकि पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है उसमें अधिकार है। 

बाइबल ईश्वरीय है, क्योंकि बाइबल में लिखी गई हर एक बात परमेश्वर के ज्ञान से और उसकी इच्छा से उत्पन्न हुई है। 

साथ ही साथ, 1 कुरिन्थियों 2:7 में प्रेरित पौलुस इसे परमेश्वर के ज्ञान के रूप में संबोधित करता हैं और कहता हैं कि इसे परमेश्वर ने सनातन से हमारी महिमा हेतु ठहराया है। परमेश्वर ने अपनी बातें हमें अपने पवित्र आत्मा के द्वारा दिया है और समझाया है। बाइबल ईश्वरीय है क्योंकि बाइबल में लिखी गई हर एक बात परमेश्वर के ज्ञान से और उसकी इच्छा से उत्पन्न हुई है। 

2. मनुुष्य परमेश्वर की ओर से बोलते थे।
2 पतरस 1:20 में लिखा है कि, “… पवित्रशास्त्र की कोई भी भविष्यवाणी व्यक्तिगत विचारधारा का विषय नहीं है।” परमेश्वर का वचन स्पष्ट करता है कि मनुष्य ने परमेश्वर के वचन में कुछ भी नहीं जोड़ा है। ऐसा नहीं हुआ है कि मनुष्यों ने अपने विचारों को परमेश्वर के वचन में डाल दिया हो। मनुष्य परमेश्वर के वचन का स्रोत नहीं है स्वयं परमेश्वर है। आगे 21 पद में देखते हैं कि पतरस और अधिक स्पष्ट करता है कि, “लोग पवित्र आत्मा की प्रेरणा द्वारा परमेश्वर की ओर से बोलते थे।” यीशु मसीह स्वयं लूका 24 अध्याय में इस बात को स्पष्ट करते हैं कि पवित्र शास्त्र की बातें उन्हीं के बारे में हैं। परमेश्वर ही है जिसके द्वारा वचन आया है तो हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि हम सदैव उसके वचन के द्वारा उसकी को सुनें। परमेश्वर का वचन अपने गुणों, मनुष्य से अपने लिए मांगों, मनुष्य के उद्धार की योजना को प्रकट करता है। ये बातें मनुष्य की क्षमता और कल्पना से बाहर हैं। सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की ओर से दिया गए वचन हैं। बाइबल का लेखक ईश्वरीय और मानवीय लेखक दोनों हैं।

बाइबल ईश्वरीय निर्देशन में मनुष्यों के द्वारा लिखी गई है
परमेश्वर का वचन न केवल सम्पूर्णता से ईश्वरीय है परन्तु साथ ही साथ मानवीय है अर्थात् मनुष्यों के द्वारा लिखी गई है। बाइबल को लगभग 40 लेखकों के द्वारा लगभग 1600 वर्षों के अन्तराल में लिखा है। पवित्रशास्त्र यह बताता है कि पूर्व युग में परमेश्वर अनेकों प्रकार से भविष्यद्वक्ताओं से बातें की है (इब्रानियों 1:1) और भक्त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्वर की ओर से बोलते थे (2 पतरस 1:21) अर्थात् बाइबल सम्पूर्ण रूप से ईश्वरीय होने के साथ साथ मनुष्यों के द्वारा लिखी  गई है। जब परमेश्वर के आत्मा ने उनकी अगुवाई की और उन्हें प्रेरित किया तब उन्होंने परमेश्वर की बातों को लिखा। 

पवित्रशास्त्र में हम पाते हैं कि विभिन्न लेखकों ने परमेश्वर की सच्चाई को बिना बदले या परिवर्तित किए विभिन्न दृष्टिकोण से उसे प्रकट किया है। परमेश्वर ने लेखकों  को जो सच्चाई बताई, और जिन बातों को पवित्र आत्मा के द्वारा उभारा गया उसे उन विभिन्न लेखकों ने अपने दृष्टिकोण से बिना कुछ बदले लिखा। उन्होंने उस सच्चाई को नहीं बदला जो उन पर प्रकट की गई थी और न ही उन्होंने उस सत्य के साथ समझौता किया, और न ही उन्होंने कुछ अपनी मन से जोड़ा और घटाया। जो परमेश्वर के द्वारा प्रेरित वचन उनके पास पहुँचा था उसमें बिना फेर-बदल नहीं किए उन्होंने उन बातों को लिखने के द्वारा अपना योगदान दिया। यह बाइबल की सुन्दरता है और उसके सन्देश की एकता है। यदि हम पवित्रशास्त्र को देखें तो इस बात को पाएंगे कि सम्पूर्ण सृष्टि नई सृष्टि की ओर बढ़ रही है। परमेश्वर मानवीय लेखकों का उपयोग करता है कि ऐसी बातों को प्रकट करने के लिए। 

निष्कर्ष 
जब इन बातों पर हम ध्यान देते हैं तो हमें बाइबल की अद्भुत सुन्दरता दिखती है। परमेश्वर ने किस प्रकार अपनी योजना को पूर्ण रूप से विभिन्न लेखकों के द्वारा बाइबल के माध्यम से प्रकट किया। विभिन्न स्थान, समयकाल, पृष्ठभूमि, व्यक्तित्व के होने के पश्चात भी परमेश्वर ने इन लेखकों को उपयोग किया, उनसे विभिन्न प्रकार से बातें की और अपनी सच्चाई को इन सभी लेखकों के मध्य से प्रकट किया।

अतः हम देख सकते हैं कि, परमेश्वर का वचन ईश्वरीय प्रेरित वचन है, जिसको परमेश्वर ने मनुष्यों के द्वारा लिखवाया है। हम इस वचन पर पूर्ण रीति से भरोसा कर सकते हैं और इसकी अधीनता में जीवन जी सकते हैं। यह वचन हम विश्वासियों को शिक्षा देने में,और ताड़ना में, और सुधार में, और धार्मिकता की शिक्षा के लिए उपयोगी है, जिससे कि परमेश्वर का भक्त भले कार्य के लिए कुशल और तत्पर हो जाए (2 तीमुथियुस 3:16-17)।