यीशु ने क्यों कहा कि दोष न लगाओ? 

प्रायः आपने सुना या अनुभव किया होगा कि लोग घरों या कारखानों में धारदार यंत्रों का उपयोग करते समय स्वयं को ही घायल कर लेते हैं। ऐसा तब होता है जब लोग सावधानी से इन यंत्रों का उपयोग नहीं करते हैं। इसी प्रकार परमेश्वर का वचन जीवित, अटल और किसी भी दोधारी तलवार से भी तेज़ है। यदि हम वचन का उपयोग सावधानी से न करें तो इससे हम अपना ही विनाश कर सकते हैं। आज दुःख की बात यह है कि बहुत से ख्रीष्टीय जाने या अनजाने में बाइबल का त्रुटिपूर्ण रूप से उपयोग करके अपने साथ ही दूसरों का आत्मिक जीवन भी नष्ट कर रहे हैं। आइए हम बाइबल के एक ऐसे पद को देखें जिसकाे अनेक ख्रीष्टीय त्रुटिपूर्ण रीति से सन्दर्भ में उपयोग करते हैं और यह पद मत्ती 7:1 है।

मत्ती  7:1 दोष न लगाओ जिस से तुम पर भी दोष न लगाया जाए।   

इस पद को सम्भवत: हमने कई बार अपने लिए या फिर दूसरों के लिए उपयोग होते हुए सुना होगा। प्रायः अनेक लोग इस पद का उपयोग अपने पापों की रक्षा करने के लिए करते हैं। इतना ही नहीं वे दूसरों को भी अपने पापों के विरोध में बोलने से रोकने के लिए इस पद को अपनी ढाल के रूप में उपयोग करते हैं। प्रायः अनेक ख्रीष्टीय इस पद के सन्दर्भ की सही समझ न रखने के कारण चाहते हुए भी पाप में पड़े लोगों को चेतावनी नहीं देते हैं। वे सोचते हैं कि यदि हम दूसरों पर दोष लगाएंगे तो हम पर भी दोष लगाया जाएगा। जबकि वास्तव में यह पद हमें ऐसी शिक्षा नहीं देता है।

इस पद का सन्दर्भ 

यह पद पहाड़ी उपदेश में पाया जाता है, जहाँ यीशु के पीछे चलने वालों के लिए निर्देश दिए जा रहे हैं। इस पद को जब हम इसके सन्दर्भ में देखते हैं तो हम पाते हैं कि यीशु यहाँ पर विश्वासियों की धार्मिकता के उच्च नैतिक स्तर की बात कर रहे हैं। वह कहते हैं कि पाखण्डियों के समान मत बनो क्योंकि वे जिन बातों के लिए दूसरों पर दोष लगाते हैं उन्हें स्वयं नहीं करते हैं (मत्ती 9:11, 12:1-2 तुलना करें मत्ती 23:2-4)। यदि हम इस पद के वास्तविक सन्दर्भ पर ध्यान दें तो यह पद वास्तव में किसी के पाप या त्रुटिपूर्ण व्यवहार के विरोध में बोलने से हमें नहीं रोकता है। और न ही यह हमें आपस में उत्तरदायी होना और नैतिक उत्तरदायित्व को पूरा करने से नहीं रोकता है। यह पद हमें झूठी धार्मिकता तथा घमण्ड करने से रोकता है। यदि इस पद का अर्थ कभी किसी के पापों के विरोध में बोलना न होता, तो यीशु और उसके चेले दूसरों को पापों में देखने के बाद भी उन्हें दोषी न ठहराते (मत्ती 23:13-28, 1 कुरिन्थियों 5:12-13)। 

इस पद का अर्थ

दोष लगाने का अर्थ है किसी में कमी ढूंढना। दूसरों में सदैव कमी खोजते रहना और उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास करना ही दोष लगाना है। मन्दिर में प्रार्थना करने वाला फरीसी भी इसका एक उदाहरण है जो स्वयं को इसी प्रकार धर्मी ठहराते हुए चुंगी लेने वाले पर दोष लगाता है (लूका 18:11)। हमारे लिए यह आसान है कि दूसरों के पापों को देखकर उनकी निन्दा करें और उन पर दोष लगाएं। यीशु कहता है कि यदि हम ऐसा करते हैं तो हम अपने भाई की आँख का तिनका खोजते हैं और अपनी आँख का लट्ठा नहीं देखते हैं। हमें पाखण्ड तथा बाहर से धर्मी दिखाने वाले कार्यों से बचना चाहिए।

प्रायः दूसरों पर दोष लगाने वाला स्वभाव रखने वालों को दूसरों की कमी खोजना अच्छा लगता है। ऐसा स्वभाव परमेश्वर की ओर से नहीं परन्तु झूठ के पिता और दोष लगाने वाले शैतान की ओर से है (प्रकाशितवाक्य 12:10)। ऐसे लोग दूसरों से प्रेम नहीं करते हैं और न ही दूसरों को सुधारकर उनका निर्माण करना चाहते हैं। हमें पापी पर नहीं परन्तु उसके पाप पर दोष लगाना चाहिए। हमें उसे प्रेमपूर्वक उसके पापों को दिखाना चाहिए जिससे कि वह अपने पापों से पश्चाताप करे। यह कार्य हमें नम्रतापूर्वक करना है न कि उस पर दोष लगाकर उसे नीचा दिखाने की भावना से। अतः हमें अपने जीवन के साथ ही दूसरे विश्वासियों के जीवन पर भी ध्यान रखते हुए उन्हें चेतावनी देना चाहिए, जिससे कि वे पापों से बच सकें (1 तीमुथियुस 5:20)।  

इस पद का उपयोग

प्रिय मित्रों, परमेश्वर ने हमें अंधकार की सांसारिक शक्तियों तथा दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से लड़ने के लिए अपना वचन दिया है। इसी वचन के द्वारा हमारे प्रभु यीशु ने संसार के सबसे शक्तिशाली शत्रु शैतान का सामना किया था (मत्ती 4:1-11)। हम भी परमेश्वर के वचन को सही सन्दर्भ में सच्चाई से उपयोग करें। हम शैतान के समान बाइबल के पदों को बुरी मंशा से न उपयोग करें। हमें चाहिए कि हम न ही उसमें कुछ जोड़े और न घटाएं, क्योंकि हमारा अंतिम गन्तव्य इसी पर निर्भर है (प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। अतः हमें लोगों को बिना नीचा दिखाए उन्हें सच्चाई से अवगत कराना चाहिए, जिससे कि लोग पापों को छोड़कर आत्मिक परिपक्वता में बढ़ सकें।

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