कैसे हम कलीसिया में एक-दूसरे की चिन्ता कर सकते हैं?

हम ख्रीष्टीय कलीसिया में जोड़े गए हैं और आत्मिक परिवार के सदस्य हैं। इसलिए हमारा उत्तरदायित्व है कि हम कलीसिया में एक-दूसरे की देखभाल करें और एक दूसरे को सम्भालें। हम इस बात को समझते हैं कि हमें कलीसिया में एक दूसरे की चिन्ता करनी है और इसके लिए हम प्रयत्नशील रहते हैं। किन्तु विचार करें कि कहीं हम वास्तव में कलीसिया के विश्वासियों के साथ, चाहे वे अमीर हों या गरीब, पढ़े-लिखे हों या अनपढ़, गाँव के हों या शहर के, ज्यादा गुणवान हैं या कम गुणवान, अविवाहित हो या विवाहित, या उनकी स्थिति के अनुसार उन पर ध्यान देते हैं? क्या वास्तव में हम और आप कलीसिया में लोगों की चिन्ता करते हैं या अपनी आवश्यकता के समय, या किसी को दिखाने के लिए चिन्ता करने का दिखावा करते हैं, जबकि हमारा हृदय उन लोगों से दूर होता है! आइये हम अपने जीवन पर विचार करें कि क्या हम वास्तव में लोगों की चिन्ता करते हैं!

एक-दूसरे से यीशु के समान त्यागपूर्ण प्रेम करें और यीशु का अनुसरण करने में एक-दूसरे की सहायता करें।

एक-दूसरे से ख्रीष्ट के जैसा वास्तव में प्रेम करिए: हमारी प्रवृत्ति है कि हम स्वयं से प्रेम करने में बहुत अच्छे हैं। स्वयं की चिन्ता करने के लिए हमें अधिक सोचना नहीं पड़ता। किन्तु जब बात दूसरे की आती है तो हमारे लिए प्रेम करना कठिन होता है। तो चाहे हम कलीसिया में पास्टर हों, डीकन हों, बाइबल का प्रशिक्षण ले रहे हों, गृहणी हों, वृद्ध हों, युवा हों, स्त्री हो या पुरूष हों, हमें आवश्यकता है कि हम कलीसिया के लोगों के जीवन की चिन्ता करें। हम दूसरों से अपने समान प्रेम करें।

हम ख्रीष्ट के लोगों के साथ जैसा व्यवहार करते हैं तो हम वास्तव में ख्रीष्ट से वही व्यवहार करते हैं (मत्ती 25:40)। कलीसिया के विश्वसियों को अपने आत्मिक परिवार का सदस्य केवल रविवार के दिन के लिए ही मत समझिए वरन् उनसे वास्तव में प्रेम करें और यह प्रकट करें कि आप सप्ताह के मध्य भी उन्हें अपने आत्मिक परिवार का सदस्य समझते हैं और उनकी चिन्ता करते हैं! आइये हम एक-दूसरे के प्रति दयालु और करुणामय बनें और एक दूसरे के अपराध क्षमा करें (इफिसियों 4:32)। हम अपने जीवन के द्वारा यीशु के प्रेम को प्रकट करें।

एक-दूसरे को ख्रीष्ट के स्वभाव में बढ़ने में सहायता करें: स्मरण रखें कि ख्रीष्टीय जीवन अकेले का जीवन नहीं है! परमेश्वर ने हमें कलीसिया में जोड़ा है जिससे कि हम एक-दूसरे को ख्रीष्ट के समान बनने में सहायता करें। हम आत्मिक परिवार में लोगों के साथ वचन पढ़ने, प्रार्थना करने, सुधार करने, चेतावनी देने, समझाने के द्वारा एक-दूसरे को यीशु के स्वभाव में बढ़ने में सहायता करते हैं। यदि हम वास्तव में ख्रीष्ट के स्वभाव में बढ़ रहे होंगे तब हम दूसरों को भी यीशु के समान बनने में सहायता कर पाएंगे। प्राय: हम रविवार को जब आराधना के लिए विश्वासियों के साथ इकट्ठा होते हैं तो हम एक-दूसरे को ख्रीष्ट में बढ़ने, बने रहने तथा ख्रीष्ट के जैसे आचरण करने के विषय में बात करते हैं। किन्तु सप्ताह के मध्य क्या हम वास्तव में कलीसिया के विश्वासियों के विषय में सोचते हैं? विशेषकर उन लोगों के विषय में जो पद, योग्यता, व्यक्तित्व, व्यवहार, सम्मान तथा ज्ञान के सम्बन्ध में हमसे कम हो‍!

यदि हम स्वयं को ख्रीष्ट का शिष्य बोलते हैं किन्तु हमारे शब्द, हमारा व्यवहार, हमारे कार्य दूसरों को ख्रीष्ट के स्वभाव में बढ़ने तथा आत्मिक जीवन की बढ़ोत्तरी के लिए उपयोगी नहीं है, तो हमें स्वयं के जीवन को जाँचने की आवश्यकता है। इसलिए कल की प्रतीक्षा न करें वरन् आज जब परमेश्वर ने हमें यह समय दिया है तो उसका उपयोग हम दूसरों को प्रेम करने, उत्साहित करने, क्षमा करने वाले शब्द कहें एवं जीवन सम्बन्धित महत्वपूर्ण बातों के विषय में बात करें (इब्रानियों 3:13)। वह कौन सा समय था जब आपने निराश व्यक्ति को केवल नीचा दिखाने तथा उसके विषय में गपशप करने के स्थान पर उसे ख्रीष्ट में बने रहने के लिए वास्तव में सहायता की हो? विचार करिए, क्या हम इस क्षणिक जीवन में स्वयं को दूसरों से बेहतर समझने, दूसरों को नीचा दिखाने, दूसरों का केवल मज़ाक उड़ाने, दुर्व्यवहार करते हैं या दूसरों की चिन्ता करते हुए उन्हें यीशु के स्वभाव में बढ़ाने के लिए कठोर परिश्रम कर रहे हैं?

हमें अपने शब्दों एवं आचरण पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि हमारे शब्द और आचरण कैसे दूसरों को ख्रीष्ट में बढ़ने में सहायक हैं!

एक-दूसरे को ख्रीष्ट में अपने शब्दों एवं कार्यों द्वारा प्रोत्साहित करें: वह अन्तिम समय कब था जब आपने किसी विश्वासी के आत्मिक जीवन में उन्नति को देखते हुए आपने प्रभु की वास्तव में प्रशंसा की हो, और उस उसे प्रभु में बने रहने के लिए उत्साहित किया हो! कई बार हमारे प्रोत्साहन के शब्द लोगों की पृष्ठभूमि, योग्यता, भौतिक स्थिति के आधार को देखते हुए निकलते हैं। अपने शब्दों का उपयोग दूसरों को ख्रीष्ट के समान बनने में करें। कई बार हम लोगों को उत्साहित न कर पाने से संघर्ष करते हैं।

कई बार हम दूसरों को प्रोत्साहित करने का साहस नहीं जुटा पाते, क्योंकि हम सदैव दूसरों की त्रुटियाँ निकालने में व्यस्त रहते हैं, इसलिए प्रोत्साहन के शब्द बोलना हमारे लिए बहुत ही कठिन होता है। हम दूसरों के सराहनीय कार्य पर भी उसे उत्साहित करने में इस बात की चिन्ता करते हैं कि वह घमण्डी हो जाएगा, किन्तु अपने शब्दों से उनके विषय में नकारात्मक बात करने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते हैं! हमें अपने शब्दों एवं आचरण पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि हमारे शब्द और आचरण कैसे दूसरों को ख्रीष्ट में बढ़ने में सहायक हैं! जब हम स्थानीय कलीसिया में हैं, तो हमारा प्राथमिक उत्तरदायित्व है कि हम एक-दूसरे को ख्रीष्ट में प्रोत्साहित करें (इब्रानियों 10:25)। क्या हम और आप कभी किसी को उत्साहित करते हैं या केवल दूसरों की निर्बलताओं को ढूँढ़ने के ही अभ्यस्त हैं?

आइये हम स्वयं के जीवन को जाँचे कि जब हमारे मुँह से शब्द निकलते हैं तो क्या वास्तव में दूसरों का निर्माण होता है या उन्हें निराशा की ओर ले जाता है! जब हम बोलते हैं तो क्या हमारे शब्द अनुग्रहमयी, नम्रता, धैर्य, करुणा तथा प्रेम से भरे होते हैं? जब हम बोलते हैं तो हमें अपने शब्दों और व्यवहार को जाँचने की आवश्यकता है। हम में से प्रत्येक को एक-दूसरे के द्वारा प्रोत्साहन की आवश्यकता है। सुसमाचार के द्वारा लोगों को उत्साहित कीजिए। केवल वर्ष में एक बार या कुछ महीने में जब आपका मन करे तब नहीं, वरन् जब वास्तव में उत्साहित करने का कारण हो अवश्य ही हमें अपने शब्दों का उपयोग उत्साहित करने के लिए करना चाहिए। अत: प्रभु को प्रसन्न करने की इच्छा से लोगो की वास्तव में चिन्ता करिए।

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