सताव के मध्य एक-दूसरे को कैसे सान्त्वना दें?

सामान्य रीति से कोई भी सताव की परिस्थितियों में से होकर नहीं जाना चाहता। किन्तु एक ख्रीष्टीय के जीवन में सताव का आना सामान्य बात है। यह हम ख्रीष्टीयता के आरम्भ से देखते आए हैं। यीशु के आरम्भिक चेले सताव में से होकर गए, कलीसियाएँ सताव में से होकर गईं और वर्तमान में भी ख्रीष्टीय भाई-बहन विभिन्न प्रकार के सताव का सामना कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में हम कैसे एक-दूसरे को सान्त्वना प्रदान कर सकते हैं? आइये हम तीन बातों पर विचार करें –

1. स्मरण दिलाएँ कि सताव के मध्य प्रभु में हमारी सुरक्षा है। 

जब विश्वासी होने के कारण हम पर विभिन्न प्रकार से क्लेश आते हैं, तो हमारा जीवन संकट में होता है। किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे विरोधों के मध्य में भी परमेश्वर अपनी दया में होकर हमें बचाए रखता है। उसने हमारी मुृत्यु का जो समय और दिन नियुक्त किया है, हम केवल उसी दिन मरेंगे, उससे पहले कोई भी आक्रमण, पीड़ा, क्लेश व सताव हमारे प्राण को हमसे नहीं छीन सकते हैं। सताव के मध्य परमेश्वर के सामर्थ्य द्वारा हमारी रक्षा होती है (1 पतरस 1:5) परमेश्वर अपने सामर्थ्य के द्वारा ऐसी परिस्थितियों में हमें मृत्यु से बचाता है और उसी आशा में हम विरोध का सामना करते हैं कि वह भविष्य में भी हमें बचाए रखेगा (2 कुरिन्थियों 1:10)। 

2. स्मरण दिलाएँ कि यीशु के लिए सताव सहना सौभाग्य की बात है।

ख्रीष्टीय जीवन इस संसार में विश्राम जीवन नहीं है। जब हम यीशु के कारण अपने अविश्वासी पति या पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन, परिवार के लोग, रिश्तेदार, मित्रों तथा समाज के लोगों द्वारा तिरस्कृत होते हैं, तो यह कठिन समय होता है। जब लोग हमारी अपमान करते हैं, विभिन्न प्रकार से सताते हैं। यहाँ तक कि मारते-पीटते हैं, प्रतिदिन लड़ाई करने के लिए आते हैं, और यहाँ तक कि एक दिन वे हमें मार भी दें, तब भी हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी। यीशु के चेले जब यीशु के नाम से कोड़े खाते हैं, अपमानित होते हैं तो वे कहते हैं कि वे इस योग्य तो ठहरे कि ख्रीष्ट के नाम से मार खाएँ (प्रेरित 5:41)। 

3. स्मरण दिलाएँ कि सताव सहने के पश्चात् अन्ततः विश्राम अवश्य ही मिलेगा।

यीशु ख्रीष्ट ने हम विश्वासियों को आश्वासन दिया है। जब हम सताव में से होकर जाते हैं तो हम धन्य हैं, आशीषित हैं, प्रसन्न व्यक्ति हैं। जब यीशु के नाम के कारण हमारा निरादर होता है, लोग हमारी निन्दा करते हैं, ताना मारते हैं, यातना देते हैं, गाली देते हैं, हमारे विरुद्ध झूठ बोल बोलकर सब प्रकार की बाते करते हैं। ऐसे समय में हम यदि संसार की ओर देखेंगे तो निराश, दुःखी और अवसाद से ग्रसित हो जाएँगे। इसके विपरीत यीशु कहते हैं कि हम जब ऐसी स्थितियों का सामना करें तो हमें आनन्दित और मग्न होना है। क्योंकि स्वर्ग में हमारा प्रतिफल महान है। (मत्ती 5:10-11) एक दिन हमारी आँखो से सब आँसू पोछ डाले जाएँगे (प्रका. 21:4)। इस संसार में हम दुख उठाएँगे किन्तु एक दिन हमें विश्राम मिलेगा (2 थिस्स.1:7)।

वर्तमान में जब हम और आप सताव में से होकर जाते हैं तो हमें प्रभु की ओर देखने की आवश्यकता है। परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखें। कलीसिया इतिहास में सताव में गए लोगों की ओर देखिए। कलीसिया के भाई-बहनो के साथ प्रार्थना कीजिए। 

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नीरज मैथ्यू
नीरज मैथ्यू
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